एनआईए का 83 वर्षीय स्टेन से शर्मनाक सलूक

हमारी जिदंगी बहुत अजीबो-गरीब होती है। कई बार हमारी जिदंगी में कुछ ऐसा हो जाता है जिसे लेकर हमारे दिल व दिमाग में संघर्ष शुरू हो जाता है। हम यह तय नहीं कर पाते हैं कि अपने दिल की बात मानें या फिर दिमाग की। हाल ही में एक ऐसा मामला देखने सुनने में आया जिसके कारण यही स्थिति पैदा हो गई। हुआ यह कि महाराष्ट्र की तलोजा जेल में बंद एक वयोवृद्ध कैदी को कुछ वकीलो ने पानी पीने वाला सिपर व स्ट्रा भेजी ताकि वह तरल पदार्थ खा-पी सके।

बात यह थी कि तलोजा जेल में बंद यह 83 वर्षीय कैदी स्टेन स्वामी को केंद्र सरकार की एजेंसी ने गिरफ्तार किया हुआ है। जांच एजेंसी के अनुसार उसका भीमा कोरेगांव कांड में हाथ होने का शक है। यह बुजुर्ग कैदी परकिंसन नामक बीमारी से पीडि़त है व ज्यादा आयु में ज्यादातर होने वाली इस बीमारी के कारण उसके हाथ पैर बुरी तरह से कांपने लगते हैं व इस कारण उसके लिए पानी का गिलास तक थाम पाना मुश्किल हो जाता है व इसका रोगी कागज के स्ट्रा या सिपर की मदद से ही तरल पदार्थ पी पाता है।

उसे यह सामान भेजने वाले वकीलों ने अपने पत्र में जेल प्रशासन को लिखा कि हम लोगों का मानना है कि जेल प्रशासन को कैदियो के साथ मानवीय व्यवहार करना चाहिए। अतः हम लोगों का मानना है कि आप लोग जेल मैनुएल के मुताबिक ऐसे कैदियो के लिए समुचित प्रबंध करें जिन्हें कि विशेष मदद की जरूरत है। उन्हें कम-से-कम सम्मान के साथ पानी पीने की व्यवस्था तो की जानी चाहिए। हमें नहीं लगता कि कागज की स्ट्रा व सिपर पर जेल के कानून में किसी तरह की रोक लगाई गई होगी।

वहीं जेल के अधिकारियों का दावा है कि उन्हें जेल भेजने के बाद सिपर व स्ट्रा आदि उपलब्ध करा दी गई थी। कुछ दिन पहले ही स्वामी के वकील ने अदालत में अर्जी देकर उन्हें स्ट्रा, सिपर व जाड़े के लिए गरम कपड़े दिए जाने की मांग की थी। वकील का कहना था कि नेशनल इनवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) ने उन्हें गिरफ्तार करते समय उनकी स्ट्रा व सिफर भी जब्त कर लिया था। जबकि एनआईए का कहना था कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया था।

अब यह जानना जरूरी हो जाता है कि पूरा मामला क्या है। भीमा कोरागांव कांड राष्ट्रीय स्तर का चर्चित मामला है। पूणे के पास एक छोटा-सा गांव भीमा कोरेगांव है। जब देश आजाद नहीं हुआ था जब 1 जनवरी 1818 को यहां तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना व बाजीराव द्वितीय के बीच जमकर लड़ाई हुई थी। तब बाजीराव के साथ युद्ध करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी की महार रेजीमेंट पुणे की और जा रही थी। इस रेजीमेंट में 875 महार सैनिक थे। महाराष्ट्र में महार दलितो की क्षेणी में आते हैं व उनका काम चमड़े के सामान तैयार करना होता है।

इस संघर्ष में महार रेजीमेंट की जीत हुई। हालांकि उसके 75 सैनिक मारे गए व उनकी याद में बाद में अंग्रेजों ने वहां एक स्मारक बना दिया। देश के आजाद होने के बाद हर साल 1 जनवरी को इस कांड की याद में दलित एकत्र होकर जश्न मनाते है। मगर 3 साल पहले 31 दिसंबर को इस कांड के 200 साल पूरे हाने के लिए आयोजित एक सम्मेलन के एक दिन पहले वहां आने वाले लोगों व कुछ स्थानीय लोगों के बीच जमकर संघर्ष हो गया व इस हिंसा में एक युवक मारा गया व पांच लोग घायल हो गए।

इस कांड में कई मानवाधिकार एक्टिविस्ट, माओवादियो से जुड़े होने के कारण उन्हे दोषी बनाया गया। इनमें गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबड़े के साथ-साथ स्वामी भी शामिल थे। इस 83 वर्षीय वयोवृद्ध व्यक्ति का पूरा नाम फादर लार्डस स्वामी है व उन्हें आमतौर पर स्टेन स्वामी के नाम से जाना जाता है। वे एक रोमन कैथलिक ईसाई पुजारी है व कई दशको से आदिवासियों के इलाके में काम करते आए हैं। उनके कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के साथ संबंध रहे हैं। वे गैरकानूनी कार्य (रोकथाम) कानून के तहत देश में आतंकवाद फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने उन्हें इंसाफ दिए जाने की मांग की है। स्टेन स्वामी तमिलनाडु के त्रिची इलाके के रहने वाले हैं व उन्होंने फिलीपींस में उच्च शिक्षा हासिल की थी। आदिवासियों के बीच उनका काफी प्रभाव हैं व वे उनके अधिकारो के लिए संघर्ष करते आए हैं। वे संविधान में उल्लेखित आदिवासी सलाहकार परिषद की तरह उन लोगों के लिए परिषद के गठन की मांग करते आए हैं। उनका कहना है कि सरकार की नीतियो का विरोध करने के कारण उनके खिलाफ यह कार्रवाई की जा रही है। उनका दावा है कि पुणे में 2018 में भीमा कोरेगांव कांड हुआ तब वे वहां थे ही नहीं।

जबकि कहा जाता है कि वे माओवादियों के लिए पैसा एकत्र करते थे व हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए 300 नक्सलियो को छुड़ाने के लिए बनाई गई समिति से जुड़े हुए थे। तभी उन्हें इस साल 8 अक्तूबर को गिरफ्तार किया गया था। पहले इस कांड की जांच पुणे पुलिस कर रही थी पर राज्य में सरकार बदलने के बाद केंद्र सरकार ने जांच का काम एनआईए को सौंप दिया था। शशि थरूर, सीताराम येचुरी, डी राजा, सुप्रिया सुले, कनिमोझी भी उनकी रिहाई की मांगें करते आए हैं।

यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि उन्होंने अदालत में अपना सिपर व स्ट्रा वापस दिलवाने की मांग की तो 20 दिनों बाद एनआईए ने कहा कि उसके पास ऐसी कोई भी चीज नहीं है। स्टेन स्वामी को अच्छी तरह से सुनाई भी नहीं पड़ता है। तन्हाई में बंद यह कैदी अनेक बार जेल में गिरता रहा है। उन्होंने काफी समय तक पश्चिम बंगाल व झारखंड के आदिवासी इलाकों में काम किया है।

ऐसे में उनके साथ किए जा रहे व्यवहार को देखकर दिल का सवाल  है कि क्या एक बीमार बुजुर्ग को खाने पीने के लिए जेल में सिपर तक न दिया जाना उचित है?  क्या यह 83 वर्षीय बुजुर्ग माओवादियेां की हिंसक गतिविधियों में शामिल हो सकता हैं?  संदेह नहीं है कि बड़ी तादाद में पढ़े-लिखे लोग नक्सली वामपंथी माओवादियेां की मदद करते आए हैं जो हमारे सुरक्षाबलो व गरीब निर्दोष जवानों को अपना निशाना बनाते आए हैं। तब उनके साथ सहानुभूति क्यों जताई जाए?  यह कैसे मान लिया जाए कि वे हिंसा के पीछे नहीं हो सकते हैं।

मुझे याद है कि एक बार तिहाड़ जेल के एक आला अधिकारी ने मुझसे कहा था कि कैदियो को जेल में कोई सुविधा नहीं मिलनी चाहिए। यह उनकी ससुराल नहीं है कि वे लोग आनंद करें। जेल के हालात तो इतने खराब होने चाहिए कि वे यहां आने की कल्पना से ही इतने आतंकित हो जाए और यहां आने के लिए अपराध न करें। मगर यह सत्य भी किसी से छिपा नहीं कि सरकार किस तरह से अपनी जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करती आई हैं। इसलिए बुजुर्ग स्वामी के साथ एनआईए के व्यवहार पर मानवीय आधार पर सोचे या न सोचे?

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