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‘एक्ट ऑफ गॉड’ इंसान जन्म, मोदी पीएम!

भारत की बुद्धि का कमाल है जो भगवान को दिन-रात कोसती हैं। सोचें, एक तरफ हम हिंदू 84 लाख योनियों में श्रेष्ठ जीवन मनुष्य का मानते हैं। मनुष्य जन्म ‘एक्ट ऑफ गॉड’ के कारण। मगर इस जन्म को हम हिंदू बारह सौ सालों से कैसे जी रहे हैं? बुद्धि-आंख-कान-नाक बंद रख कर, अपने हाथों अपना कलियुग बना कर। मनुष्य की बजाय हमारा भेड़-बकरी जीवन का लगातार आचरण। जीवन पूरी तरह बुद्धिहीनता, भक्ति और अंधविश्वासों में। इतना ही नहीं इंसान होते हुए भी दूसरे मनुष्य को भगवान मान बैठना। मेरा मानना था और है कि आधुनिक काल हिंदुओं की मुक्ति का था। गुलामी के पाप से मुक्ति का था। खंड-विखंड-छुआछूत और अंधविश्वासों के दलदल में धंसे समाज का दलदल से बाहर निकलने का अवसर था। बुद्धि को खत्म करने वाले भक्तियुग से आजाद होने का मौका था। बंजरता से बुद्धि-दिमाग के बाहर निकलने का समय था।

हां, 1947 में हिंदू को ‘एक्ट ऑफ गॉड’ से आजादी मिली। दुनिया के आगे सनातनी की सनातनता की सार्वभौमता का हिंदू अस्तित्व जाहिर हुआ। मेरा मानना है वह ‘एक्ट ऑफ गॉड’ और समय के बल से आजाद भारत का जन्म था। दुनिया के बाकी इंसानों के पुरुषार्थ, ज्ञान-विज्ञान-आविष्कारों, विचारों, विचारधाराओं से हिंदू की खोपड़ी में उससे विकल्प खुले-बने। प्रयोग के फॉर्मूले और प्रयोगकर्ता चेहरों का मौका बना। लेकिन बावजूद इस सबके हिंदुओं ने क्या किया? हिंदू ने वापिस अपने नए भगवान, नई भक्ति बनाना शुरू की। गांधी भी भगवान, नेहरू भी भगवान तो डॉ. अबेंडकर भी भगवान। और नए भगवान नरेंद्र मोदी!

सचमुच ‘एक्ट ऑफ गॉड’ का शुक्रिया करने, आजादी के लिए ईश्वर को धन्यवाद देने की बजाय हिंदुओं ने 75 वर्षों में अपने नए-नए भगवान बनाए। अपने वे अवतार, ईश्वर के वे बंदे, वे कथावाचक, वे जादूगर भगवान पैदा किए, जिनसे त्वरित चमत्कार और निदान के अंधविश्वासों में हिंदू का आधुनिक काल और कलियुगी बनता हुआ है। वह यह मानते हुए जीवन जी रहा है कि ‘एक्ट ऑफ गॉड’ से बना हुआ मनुष्य जन्म भेड़-बकरी की रैवड है। इसलिए उसे गड़ेरिए चाहिए। उसे वह भगवान चाहिए, जिसकी सत्ता से साक्षात कृपा, आशीर्वाद, राशन, नमक, आरक्षण, नौकरी आदि मिले।

क्या ऐसी दुनिया में कोई दूसरी कौम है? सोचे, भारत के लोगों ने 75 वर्षों में अपने ही बीच से कितने भगवान बनाए? और सबसे नतीजा क्या? दुनिया में ऐसी हत्भाग्य नस्ल दूसरी कौन सी है? ऐसी नस्ल जो हर चीज के लिए सत्ता के आसन पर बैठे, धर्म के आसन पर बैठे व्यक्ति को भगवान की तरह समर्थवान मानती है? मगर उनके होते हुए भी यदि पुल टूटता है, हादसा होता है मनुष्यनिर्मित नोटबंदी जैसे कारणों से कंगाली बनती है तो फिर वह यह स्यापा करने लगता है कि क्या करें यह तो स्वर्ग में विराजे भगवान ब्रह्मा-विष्णु-महेश की इच्छा। हम तो उन्हें मानते हैं, पूजा-पाठ करते हैं फिर भी देखो, महामारी में बिना ऑक्सीजन में लोग फड़फड़ाते मरे, काम धंधे चौपट हुए और ऐसे हादसे, जिससे परिवार के परिवार खत्म! जन्म देने वाला दोषी, हम नहीं!

सवाल है हिंदू की बुद्धि, दिमाग और खोपड़ी में इतना भूसा कैसे भरा हुआ है जो ‘एक्ट ऑफ गॉड’ में जन्मा इंसान बाद में अपनों के बीच में पहले तो किसी को भगवान मान बैठे और उस पर आश्रित रहे मगर भूख, बेरोजगारी, पूल टूटने से ले कर प्रदूषण, खराब सड़कों के हादसों की बेमौत मौतों की जिंदगी का ठीकरा उस जन्मदाता ईश्वर पर फोड़े, जिसने उसे बुद्धि, सत्य, ज्ञान से लैस करके पृथ्वी पर पैदा किया है!

तभी गुलामी, भक्ति व भयाकुलता में रचे-पके हिंदू डीएनए का मामला सबसे अलग व विचित्र है। गौर करें हिंदुओं के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर! नरेंद्र मोदी ‘एक्ट ऑफ गॉड’ से प्रधानमंत्री बने। जैसा हिंदुओं का कलियुगी इतिहास है कुछ नहीं होते हुए भी समय के संयोग से उन्हें दिल्ली के सिंहासन पर बैठने का मौका मिला। मगर वे ‘एक्ट ऑफ गॉड’ के अपने मनुष्य जीवन और उसमें भी ‘राजयोग’ के मौके में कैसे-कैसे ‘एक्ट ऑफ फ्रॉड’ करते हुए हैं?

वे खुद प्रजा के भगवान बन गए। हवाला ईश्वर का और नाम अपना। ईश्वर के मंदिर बनाते हुए अपनी मार्केटिंग की। प्रजा में बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान भरने की बजाय झूठ-अंधविश्वास-भक्ति भरते हुए! मई 2014 से लेकर आज तक और जब तक वे सत्ता में रहेंगे तब तक नरेंद्र मोदी क्षण-प्रतिक्षण उन हिंदुओं की खोपड़ी में लगातार अपने चेहरे की यह प्राणप्रतिष्ठा बनाने की जिद्द ठाने हुए हैं कि हिंदुओं जानो, उनके कारण रामजी मुक्त हुए। महादेव के वास का पुनरूद्धार हुआ। वे ही गंगा मां का आसरा हैं। वे ही 100 करोड़ भूखे लोगों को राशन-पैसा बांटने वाले अन्नदाता हैं। उनकी खोपड़ी में सर्वज्ञता की सरस्वती विराजी हुई हैं। वे ही हिंदुओं की-देश की सुरक्षा के महावीर हैं।

और उनके इस प्रचार, ऐसी झांकियों, शृंगारों के आगे ‘एक्ट ऑफ गॉड’ की लीला का ‘मनुष्य जन्म’ उर्फ भक्त हिंदू की बुद्धि क्या करती हुई है? उनकी आरती उतारते हुए! मोरबी में पुल टूटने से लोग बेमौत मरे तब भी किसी में यह पूछने की हिम्मत नहीं कि मोदीजी, इतनी शक्तियों, सर्वशक्तिमान पॉवर के बावजूद प्रजा का ऐसा बेमौत मरना कैसे? मगर उनसे सवाल करने, ऊंगली उठाने के बजाय यह कह कर बात खत्म कि भगवानजी की इच्छा! हिंदू के लिए बतौर इंसान किसी की जिम्मेवारी, जवाबदेही है ही नहीं! भला कैसे भगवान नरेंद्र मोदी से यह सवाल पूछा जा सकता है कि 22 साल के आपके राज वाले गुजरात में वह कोरोना काल कैसे था, जिसमें लावारिस मौतों की विभीषिका थी तो मोरबी की भीड़ के लाशों में बदलने का भयावह नजारा भी!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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