nayaindia agneepath scheme Bana Singh कैप्टेन बाना सिंह भी गद्दार कहलाएंगे?
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कैप्टेन बाना सिंह भी गद्दार कहलाएंगे?

क्या उद्धव ठाकरे की तरह परमबीर चक्र विजेता कैप्टेन बाना सिंह भी गद्दार कहे जाएंगे? आखिर उन्होंने भी भाजपा की सरकार का विरोध किया है? कैप्टेन बाना सिंह ने सेना में भर्ती की अग्निपथ योजना का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि इसकी बड़ी कीमत देश को चुकानी होगी। सियाचिन के हीरो के नाम से मशहूर कैप्टेन बाना सिंह ने 1987 में 21 हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित पाकिस्तान के कायद ए आजम चौकी पर हमले का नेतृत्व किया था। इस हमले में छह पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे। इसे अदम्य वीरता का कारनामा माना गया था और 1988 में बाना सिंह को परमबीर चक्र से नवाजा गया था। बाद में उस चौकी का नाम बदल कर बाना पोस्ट कर दिया गया था।

ऐसा बहादुर नायक भी सरकार की योजना का विरोध करके डर जाए या चिंता में पड़ जाए तो हालात समझे जा सकते हैं। उन्होंने अग्निपथ योजना के विरोध में एक ट्विट किया था, जिसमें कहा था कि ‘देश को बचाइए, अग्निपथ स्कीम हमें बुरी तरह नुकसान पहुंचाएगी, भारत एक मुश्किल स्थिति से गुजर रहा है। युवा हमारे देश का भविष्य है’। बाद में उन्होंने इस ट्विट को डिलीट कर दिया और कहा कि उनको कई जगह से फोन आने लगे थे तो उन्होंने अपने बेटे से कहा कि इस ट्विट को डिलीट कर दे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जब उन्होंने सोचा कि सरकार ने फैसला कर लिया है तो वह इसे लागू करेगी ही इसलिए इस ट्विट करने का क्या मतलब है।

सोचें, सेना के एक जांबाज नायक की असहायता के बारे में, जो यह मान रहा है कि सरकार ने फैसला कर लिया तो उसे लागू करेगी ही उस पर क्या विरोध या समर्थन करना! उन्होंने इसे तानाशाही वाला फैसला बताया और कहा कि जिन लोगों ने इस योजना को लाने का काम किया है उनको सशस्त्र बलों के बारे में जानकारी नहीं है। बाना सिंह ने यह भी कहा कि सेना को खिलौना नहीं समझा जा सकता है। उन्होंने जाने-अनजाने में खिलौने का प्रतीक बता कर हकीकत बयान की। क्या यह नहीं दिख रहा है कि पिछले कई सालों से हर चीज को खिलौना बना दिया गया है? लोकतंत्र के आधार स्तंभों और संवैधानिक संस्थाओं की क्या ऐसी स्थिति नहीं कर दी गई है जब मन हुआ किसी खिलौने में चाबी भर दी और जब मन हुआ तो किसी खिलौने की बैटरी निकाल कर उसे निष्क्रिय कर दिया?

कभी देखा-सुना है कि सरकार ने कोई फैसला किया और चाबी वाले गुड्डे की तरह उछल कर सेवा के वरिष्ठ अधिकारी प्रेस कांफ्रेंस करके फैसले का बचाव करने लगें? कभी देखा-सुना है कि सेना के वरिष्ठ अधिकारी देश के नौजवानों को धमकाएं और कहें कि प्रदर्शन में शामिल हुए तो सेना में नौकरी नहीं मिलेगी? क्या कभी देखा-सुना है कि सेना के सर्वोच्च पद पर रह चुका फोर स्टार जनरल सेना में भर्ती की चाह रखने वाले युवाओं के प्रति हिकारत का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हुए कहे कि अग्निपथ योजना स्वैच्छिक है, आना है तो आओ, नहीं आना है तो मत आओ, कोई आपको बुला नहीं रहा है। यह कैसी बात है कि कोई आपको बुला नहीं रहा है? सेना जब भर्ती की वैकेंसी निकालेगी और आवेदन आमंत्रित करेगी तो क्या वह सेना की नौकरी के लिए बुलाना नहीं माना जाएगा?

चाहे जिस मकसद से अग्निपथ योजना लाई गई हो लेकिन यह सही है कि योजना की घोषणा करने से पहले इस बारे में विचार विमर्श नहीं किया गया था। कैप्टेन बाना सिंह जैसे कई रिटायर फौजी या सामरिक मामलों के जानकार इस योजना पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन सरकार इस योजना को लागू करने पर अड़ी है और सेना के अधिकारियों को आगे करके, उनसे बयान दिलवा कर इसे सही ठहरा रही है। तभी सवाल है कि क्या इसका विरोध करने वाले कैप्टेन बाना सिंह भी उद्धव ठाकरे की तरह गद्दार कहे जाएंगे?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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