ताकि किसान व देश दोनों का संकट खत्म हो!

संसद द्वारा पारित कृषि सुधार संबंधित विधेयकों पर राजनीतिक संग्राम जारी है। झूठ और भ्रामक प्रचारों से किसानों को भड़काने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में स्वाभाविक हो जाता है कि देश में किसान और कृषि की स्थिति का वस्तुनिष्ठ आकलन किया जाएं। यह निर्विवाद है कि वर्तमान सरकार ने किसान हित से जुड़ी कई योजनाएं लागू की है। फिर भी क्या पाठक जानते है कि देश की लगभग आधी श्रमशक्ति कृषि पर निर्भर है और बावजूद इसके प्रतिवर्ष हमारा कृषि आयात एक लाख करोड़ से अधिक है? यह न केवल विडंबनापूर्ण स्थिति है, अपितु इसकी जड़ में किसान संकट का कारण भी छिपा है। सरकारी आंकड़े के अनुसार, देश वर्ष 2015-16 में कृषि आयात 1.4 लाख करोड़ था, जो 2017-18 में बढ़कर 1.52 लाख करोड़ हो गया। यह ठीक है कि भारत 2.50 लाख करोड़ से अधिक का कृषि उत्पाद निर्यात भी करता है। इस विरोधाभासी स्थिति को दूर करने की दिशा में कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक और कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) मूल्य आश्‍वासन व कृषि सेवा पर समझौता विधेयक- पहला कदम है।

भारतीय कृषि क्षेत्र- पारंपरिक खेती से जैविक खेती, बागवानी, मुर्गीपालन और डेयरी उत्पादन की ओर रूख कर रहा है। किंतु यह सब देश की विशाल 136 करोड़ आबादी की तुलना में अपर्याप्त है। बदलते समय के साथ बढ़ते शहरीकरण, आय में वृद्धि, लोगों की परिवर्तित आदतों और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता ने देश में सभी प्रकार के ताजा और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की मांग को कई गुना बढ़ा दिया है। इन्हीं जरूरतों को पूरा करने हेतु देश के किसान प्रोत्साहित नहीं हो रहे है- परिणामस्वरूप, इन वस्तुओं का विदेशों से आयात किया जाता है। यह अजीब स्थिति तब है, जब भारत फल-सब्जियों और अन्य खाद्य-वस्तुओं- जैसे चावल, गेहूं, बाजरा, आलू, प्याज, टमाटर, बैंगन, अदरक, लहसून, केले, आम, अमरूद, नींबू, पपीता और कई प्रकार की दालों की पैदावार में विश्व के अग्रणी देशों में से एक है। यह बात अलग है कि देश में पैदा हुई कुल 30-40 प्रतिशत फसल रखरखाव की कमी और प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ जाती है।

जिन कृषि उत्पादों को भारत विदेशों से खरीदता है- उसमें मसालें,  ताजा फल-सब्जियों के अतिरिक्त खाद्य तेल की मात्रा सबसे अधिक है। देश में औसतन प्रति वर्ष 19 किलो प्रति व्यक्ति खाद्य तेल की खपत को पूरा करने के लिए 2.5 करोड़ टन खाद्य तेलों की आवश्यकता है। इसमें से केवल एक करोड़ टन तेल का उत्पादन भारत में किया जाता है, जबकि शेष लगभग 60 प्रतिशत आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है। एक आंकड़े के अनुसार, भारत ने 15.17 लाख टन खाद्य तेल (वनस्पति, जैतून, सोयाबीन, ताड़ का तेल सहित) का आयात किया है।

सफेद सरसों, सोयाबीन और सूरजमुखी जैसे तिलहनों की खेती वर्षा आधारित है। किंतु देश के लाखों-करोड़ों किसान “सुरक्षित फसल” के रूप में धान की खेती करना अधिक पसंद करते हैं, जिसे सरकार उनसे जन-कल्याणकारी योजनाओं के लिए एक निर्धारित मूल्य (एम.एस.पी.) पर खरीदती भी है। जहां धान का उत्पादन इस वर्ष 11.74 करोड़ टन होने का अनुमान है, वही गेहूं की पैदावार 10.62 करोड़ टन। वर्तमान वित्त वर्ष में जहां भारत 12 लाख टन चावल का निर्यात कर चुका है, वही भारत ने अकेले अफगानिस्तान और लेबनान को 90 हजार टन गेहूं का निर्यात किया है। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत में इन दोनों अनाजों की पैदावार इतनी हो रही है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा देश में लोगों को गेहूं-चावल की आपूर्ति होने के बाद भी भारत लाखों टन मोटा अनाज विदेशों में निर्यात कर रहा है।

आवश्यकता इस बात की है कि भविष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार किसानों को तिलहन, सब्जी, फल आदि खाद्यान्नों के उत्पादन हेतु प्रोत्साहित करें, जिससे विदेशी खरीद को सीमित करने और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिल सके। किसानों को चावल की तुलना मक्का पैदावार से जोड़ना भी लाभप्रद है। इससे न केवल किसानों की स्थिति सुधार सकती है, अपितु देश की जैविक ईंधन संबंधित जरूरत पर विदेशी निर्भरता को भी कम किया जा सकता है। सरकारी आंकड़े के अनुसार, 2019-20 में मक्के का 289.8 लाख टन उत्पादन हुआ है।

गन्ने की भांति मक्के से भी एथेनॉल तैयार किया जाता है। यूं तो यह एक प्रकार का मद्य पदार्थ है, किंतु इसे पेट्रोल में मिलाकर गाड़ियों में ईंधन की तरह इस्तेमाल होता है। यह पर्यावरण के लिए दो कारणों से अनुकूल है। पहला- चावल के अपेक्षाकृत बहुत कम पानी में मक्के की फसल तैयार होती है। दूसरा- एथेनॉल में 35 प्रतिशत ऑक्सीजन होता है, जिसके पेट्रोल में उपयोग करने से कम कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसी उपयोगिता के कारण अमेरिका 12 करोड़ टन मक्के से एथेनॉल बनाता है। इसी संदर्भ में मोदी सरकार ने जैव-ईंधन राष्ट्रीय नीति-2018 के माध्यम से पेट्रोल में वर्ष 2022 तक 10 फीसदी, तो 2030 तक 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा है।

क्या उपरोक्त असंतुलन को दूर करने से किसानों की स्थिति सुधर जाएगी? इसका उत्तर- हां और ना- दोनों में है। वर्ष 1950-51 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि संबंधित क्षेत्र का योगदान 51.8 प्रतिशत था और देश की दो तिहाई जनसंख्या कृषि पर आश्रित थी। कालांतर में सेवा और विनिर्माण में सुधार, औद्योगिक विकास के साथ अन्य क्षेत्र में प्रगति के कारण राष्ट्रीय आय में कृषि की हिस्सेदारी में कमी आती गई। वर्तमान समय में राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा मात्र 16-17 प्रतिशत है, किंतु आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित लोगों की संख्या- श्रमिक आबादी का लगभग 50 प्रतिशत है।

देश में खेती योग्य जमीन का औसत आकार भी लगातार घट रहा है। इस स्थिति का सबसे प्रमुख कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमीन का बंटवारा होना है। अर्थात्- खेती की जमीन सीमित है, लेकिन उस पर किसानों और उनपर आश्रितों- जो स्वयं को किसान कहते है- उनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। यह स्थिति कृषि क्षेत्र में छिपी ‘बेरोजगारी’ को उजागर करती है।

इस संकट के मुख्य तीन कारण है। पहला- उनका उपभोक्तावाद के मकड़जाल में फंसना। टीवी के दौर में किसान और उसपर आश्रित- इससे अछूते नहीं है और सीमित आमदनी होते हुए भी उनमें वह सभी चीजें प्राप्त करने की इच्छा जन्म लेने लगती है। दूसरा- खेती एक जोखिमभरा काम है, जिसमें मौसम की उपयोगिता अधिक है। यदि फसल बहुत अच्छी हुई, तो दाम गिर जाते है, जिससे लागत भी वसूल नहीं होती। यदि फसल खराब हो जाए, तो किसान वैसे ही बर्बाद हो जाता है। उपभोक्तावाद के दौर में कई किसान खेती के उद्देश्य से तो कर्ज उठाते है, किंतु कई बार पारिवारिक और सामाजिक कारणों से उसका बड़ा हिस्सा अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने में खर्च कर देते है। इसी चक्रव्यूह में फंसने के कारण अधिकतर किसानों की स्थिति दयनीय रहती है।

यदि किसानों और उनपर आश्रितों को इस दुष्चक्र से बाहर निकालना है, तो उन्हे अन्य क्षेत्रों के रोजगारों से भी जोड़ना होगा। इसके लिए उन्हे कौशल प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करने होंगे। गुणवत्ता शिक्षण और अन्य आधारभूत सुविधाएं न होने के कारण देश के अधिकांश ग्रामीण न केवल बेरोजगार हो जाते है, बल्कि वह आज की गला-काट प्रतिस्पर्धा के दौड़ में किसी आधुनिक उद्योग-धंधे के लायक भी नहीं रह जाते है। इस पृष्ठभूमि में संसद द्वारा पारित कृषि सुधार आधारित विधेयक, जिसमें मेहनती किसानों को इच्छानुसार सीधे बाजार में अपनी फसल को बेचने का विकल्प दिया गया है- वह निसंदेह, राष्ट्रव्यापी कृषि सुधार में क्रांति का पर्याय बन सकता है।

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