कृषि-कानूनः असली मुद्दा

आशा के विपरीत सरकार और किसानों का 7 वां संवाद बेनतीजा रहा। छठे संवाद में जो परस्पर सौहार्द दिखाई पड़ा था, वह इस बार नदारद था। किसानों और मंत्रियों ने इस बार साथ-साथ भोजन भी नहीं किया। अब 8 जनवरी को फिर दोनों पक्षों की बैठक होगी लेकिन उसमें से भी कुछ ठोस समाधान निकलने की संभावना कम ही दिखाई पड़ रही है, क्योंकि दोनों पक्ष अपनी-अपनी टेक पर अड़े हुए हैं।

किसान कहते हैं कि तीनों कानून वापस लो जबकि सरकार कहती है कि उसमें जो भी सुधार करना हो, बताते जाइए, हम संशोधन करने की कोशिश करेंगे। वैसे तो किसानों के लिए दरवाजा खुल गया है। वे चाहें तो इतने संशोधन और अभिवर्द्धन बता दें कि उनके हो जाने के बाद ये तीनों कानून पहचाने ही न जाएं। उनका होना या न होना या रहना या न रहना पता ही न चले। लेकिन इस प्रक्रिया में पेंच है। वह यह कि यह द्विपक्षीय संवाद, संवाद न रहकर द्रौपदी का चीर बन सकता है। पहले ही इस 40 दिन पुराने धरने में 55 किसान स्वर्गवासी हो गए हैं। कुछ आत्महत्याएं भी हुई हैं। इतने अहिंसक और निरापद धरने गांधी-सत्याग्रहों की याद ताजा कराते हैं। दिल्ली की इस भयंकर ठंड और बेमौसम बरसात में ये तो पंजाब, हरयाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों का दमगुर्दा है कि वे टिके हुए हैं। उनकी जगह यदि किसी राजनीतिक दल के लेाग हुए होते तो वे अब तक भाग खड़े होते।

यह तो अच्छा हुआ कि अभी तक कोई किसान आमरण अनशन पर नहीं बैठा। वह अकेला अनशन इस लंबे धरने से भी भारी पड़ता। सरकार का दावा है कि ये तीनों कानून उसने किसानों के भले के लिए बनाए हैं। यदि वे सहमत नहीं है तो सरकार उनके गले में इन्हें जबर्दस्ती क्यों ठूंस रही है ? जो राज्य इसे मानना चाहें, उन्हें और जो नहीं मानना चाहें, उन्हें भी वह छूट क्यों नहीं दे देती ?यों भी इन तीनों कानूनों के बिना भी देश के 94 प्रतिशत किसान मुक्त-खेती और मुक्त-बिक्री के लिए स्वतंत्र हैं। जहां तक 6 प्रतिशत संपन्न किसान, जो सरकार को अपना गेहूं और धान बेचते हैं, वे भी फल और सब्जियां भी उगाना शुरु कर सकते हैं, यदि सरकार उन उत्पादों के लिए भी केरल की तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती रहे। असली मुद्दा यही है। यह मुद्दा आसानी से हल हो सकता है।

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