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संघवाद की धारणा पर बड़ा खतरा

Big threat of federalism

भारत के लोकतांत्रिक गणतंत्र की ढेर सारी खूबियों में एक बड़ी खूबी संघवाद की अवधारणा है। हालांकि भारत एक क्वासी फेडरल यानी अर्ध संघीय राज्य है, जिसमें शक्ति का संतुलन केंद्र की ओर झुका हुआ है। इसके बावजूद अर्ध संघ की यह व्यवस्था बहुत कायदे से काम करती रही है। और जब कभी इसमें तनाव पैदा होता है तो उसे दूर करने के लिए बनी मशीनरी के जरिए कोई न कोई रास्ता निकालता रहा है। सरकारिया आयोग की सिफारिशें इस मामले में रास्ता दिखाने वाली हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि आज जब देश आजादी का अमृत महोत्सव यानी 75वीं सालगिरह मना रहा है और गणतंत्र के भी 72 साल हो गए हैं तो संघवाद की अवधारणा किसी भी और समय के मुकाबले सबसे ज्यादा खतरे में है। यह दुर्भाग्य इसलिए है क्योंकि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे नेता हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में केंद्र-राज्य संबंध के संतुलन पर सर्वाधिक आदर्शवादी बातें कही हैं। वे अपने को इस सिद्धांत के प्रति समर्पित बताते रहे हैं और उन्होंने एक कदम आगे बढ़ कर सहकारी संघवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया। Big threat of federalism

ध्यान रहे भारत में शक्ति का संतुलन केंद्र की ओर झुका हुआ है इसके बावजूद राज्य काफी हद तक स्वायत्त हैं और इस वजह से मजबूती के साथ केंद्र से जुड़े हुए हैं। इस संतुलन को बनाए रखना देश की एकता और अखंडता के लिए बेहद जरूरी है। भारत कोई अमेरिका की तरह राज्यों का समुच्चय नहीं है। वहां एक नस्ल, एक रंग, एक भाषा, एक संस्कृति के लोग हैं। इसलिए शासन व्यवस्था के अलावा उनको जोड़े रखने वाली बहुत सी चीजें हैं। उसके मुकाबले भारत में राज्यों का संघ कुछ हद तक पूर्व सोवियत संघ की तरह अनेक विविधताओं वाला है। यहां भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ था और राज्य अपनी इस पहचान को बड़ी तीव्रता के साथ महसूस करते हैं और बचाए रखना चाहते हैं। यह सिर्फ कहने की बात है कि सबके पूर्वज एक थे और सबका डीएनए एक है, असल में भारत नस्ल, रंग, संस्कृति, भाषा सहित कई तरह की विविधता लिए हुए है। इसलिए शासन में शक्ति का संतुलन बनाए रखना भारत को एकजुट या अखंड बनाए रखने की सबसे पहली जरूरत है। लेकिन अफसोस की बात है अलग अलग कारणों से और अलग अलग पैमानों पर पिछले कुछ दिनों से शक्ति संतुलन के पवित्र सिद्धांत की अनदेखी की जा रही है।

दक्षिण भारत के अपेक्षाकृत विकसित और आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों ने 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर कैसी प्रतिक्रिया दी थी, उसे भूलना नहीं चाहिए। इन राज्यों के वित्त मंत्रियों ने अलग बैठक की थी और इस बात का विरोध किया था कि ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों या ज्यादा गरीबी वाले राज्यों को केंद्रीय राजस्व में ज्यादा हिस्सा दिया जाएगा। उनका कहना था कि उन्होंने अपने यहां आबादी नियंत्रित की या विकास किया तो उन्हें इसकी सजा नहीं दी जानी चाहिए। यह टकराव का एक बिंदु है। ऐसे अनेक मुद्दे आ गए हैं, जिनसे राज्यों में अलगाव का भाव पैदा हो रहा है।

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यह जो हर बार एक देश, एक कानून का नारा दिया जा रहा है, वह इस मामले में जहर का काम कर रहा है। एक देश, एक टैक्स के नारे पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी कानून लागू कर दिया। इस कानून में अनगिनत कमियां हैं, जिनमें से कुछ को दूर किया गया है। जीएसटी के जरिए केंद्र ने कर वसूलने का राज्यों का अधिकार काफी हद तक कम कर दिया। सभी राज्यों के बदले केंद्र ही कर वसूल रहा है। कानून बनाते समय यह तय हुआ था कि अगर जीएसटी की वसूली कम होती है तो केंद्र सरकार पांच साल तक उसकी भरपाई करेगी। केंद्र ने वह भी बिना शर्त नहीं किया। उसके लिए भी जीएसटी के बदले कर्ज लेकर भरपाई करने का सिस्टम बनाया गया, जिसका राज्यों ने बड़ा विरोध किया था। इन पांच बरसों में दो साल कोरोना में निकल गए। सो, अब राज्य चाहते हैं कि कम से कम दो साल और सरकार कर की कमी की भरपाई करे। अगर सरकार इस प्रस्ताव के बारे में सहानुभूति के साथ विचार नहीं करती है तो राज्यों से टकराव बढ़ेगा। यह टकराव इसलिए भी बढ़ेगा क्योंकि केंद्र सरकार ने उपकर और अधिभार बढ़ा-बढ़ा कर केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी नगण्य कर दी है। सो, राज्यों पर दोतरफा मार हो रही है।

इस बीच केंद्र सरकार ने राज्यों के अन्य अधिकारों में भी कटौती शुरू कर दी है। अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति का मामला भी ऐसा ही है। केंद्र ने इस कानून में बदलाव का मसौदा तैयार किया है, जिसके मुताबिक संबंधित अधिकारी और राज्य सरकार की मर्जी के बगैर केंद्र सरकार जिस अधिकारी को चाहे उसे केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर बुला सकता है। यह देश की संघीय अवधारणा पर गंभीर चोट है। इससे पहले केंद्र ने सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ के अधिकार का दायरा कई राज्यों में 50 किलोमीटर अंदर तक बढ़ा दिया। इस बारे में राज्यों से कोई विमर्श नहीं किया गया और राष्ट्रीय सुरक्षा का नैरेटिव बनाते हुए सरकार ने यह बड़ा कदम उठा लिया। यह पूरा नैरेटिव ऐसा था, जैसे राज्य सरकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा के विरोधी या उसके लिए खतरा हैं। केंद्र सरकार ने कई राज्यों के विरोध के बावजूद मेडिकल में दाखिले के लिए नीट की परीक्षा का अखिल भारतीय स्वरूप बनाया है। तमिलनाडु में इसकी वजह से बड़ी मुश्किल हो रही है। छात्र आत्महत्या कर रहे हैं और सभी पार्टियां इसे बदलना चाहती हैं पर केंद्र का नजरिया ऐसा है, जैसे उसका इससे कोई सरोकार नहीं हो।

केंद्र सरकार ने राज्यों को भरोसे में लिए बगैर तीन कृषि कानून बनाए थे। इन कानूनों पर ऐसा विवाद हुआ कि देश भर के किसान आंदोलन पर उतरे। दिल्ली की सीमा पर पूरे साल आंदोलन चलता रहा और तब केंद्र ने कानून वापस लिए। सोचें, कृषि राज्य सूची का विषय है लेकिन इस पर कानून बनाने के लिए केंद्र ने विशुद्ध रूप से कृषि से जुड़े मसलों को कृषि कारोबार का मुद्दा बनाया और उस पर कानून बना दिया। चूंकि कृषि कारोबार का मुद्दा समवर्ती सूची में है इसलिए सरकार ने यह होशियारी की। जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म करने का फैसला ऐसे समय में हुआ, जब राज्य की विधानसभा भंग थी। ऐसे कामों की सूची और भी लंबी हो सकती है। सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। केंद्र-राज्य संबंधों की संवेदनशीलता और नजाकत को समझना चाहिए और ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, जिससे राज्यों के अंदर अलगाव का भाव पैदा हो।

केंद्र-राज्य संबंधों को बेहतर, जीवंत और सद्भाव वाला बनाए रखने के लिए कई उपाय किए गए हैं। योजना आयोग इसमें बड़ी भूमिका निभाता था। लेकिन अब योजना आयोग की जगह नीति आयोग बना दिया गया। यह अब पूरी तरह से केंद्र सरकार का एक अंग है और वहां राज्यों की सुनवाई नहीं है। इसी तरह देश में एक राष्ट्रीय विकास परिषद, एनडीसी भी है, जिसकी पिछले सात साल में एक भी बैठक नहीं हुई है। एक अंतरराज्यीय परिषद भी है, जिसकी सात साल में सिर्फ एक बैठक हुई है। राष्ट्रीय विकास परिषद या अंतरराज्यीय परिषद की बैठकों में प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री एक साथ बैठते थे और केंद्र-राज्य संबंध को बेहतर बनाए रखने के उपायों पर चर्चा करते थे। अब ऐसी चर्चा भी बंद है। सो, एक तरफ राज्यों की शिकायतें और नाराजगी बढ़ रही है तो दूसरी ओर उस नाराजगी को दूर करने के लिए सेफ्टी वॉल्व की तरह जो व्यवस्था बनाई गई थी उसे भी बंद कर दिया गया है। समझ सकते हैं कि इससे कैसा खतरा पैदा हो सकता है।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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