CBI five year terms ‘तोते’ को पालतू बनाए रखने के उपाय
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‘तोते’ को पालतू बनाए रखने के उपाय

CBI Politics and Governments

तोते को हरी मिर्च बहुत अच्छी लगती है फिर भी यह मान्यता है कि आप कितनी भी हरी मिर्च खिलाएं, जैसे जैसे तोते की उम्र बढ़ती है उसके पालतू बनने या बने रहने की संभावना कम होती जाती है। कहा जाता है कि बूढ़ा तोता पोस नहीं मानता है। तभी उसे पालतू बनाए रखने के लिए तरह-तरह के जतन करते रहने पड़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता कहा था। उस पिंजरे में भी सरकारों के तमाम जतन के बावजूद कोई ऐसा तोता आ जाता है, जो पोस नहीं मानता है तो उसे आधी रात को हटाना पड़ता है। ऐसा लग रहा है कि बार-बार की इस परेशानी से बचने के लिए सरकार अध्यादेश ले आई है ताकि इस समस्या का कोई स्थायी निदान निकले। सरकार ने अध्यादेश के जरिए नया कानून बना दिया है, जिसके तहत सीबीआई व ईडी के निदेशकों को दो साल के निश्चित कार्यकाल के बाद एक-एक साल करके तीन साल का सेवा विस्तार मिल सकता है। इस तरह कुल कार्यकाल पांच साल का हो जाएगा। सोचें, एक तरफ सरकार ने राज्यसभा के महासचिव को सिर्फ 73 दिन में हटा दिया और उधर दो साल के फिक्स्ड टर्म के ऊपर तीन बार के सेवा विस्तार का कानून बनाया जा रहा है! सोचें, देश की प्रीमियम एजेंसियों का प्रमुख बनने की आस में नौकरी कर रहे सैकड़ों अधिकारियों का क्या होगा? वे तो बेचारे अपनी बारी आए बगैर ही रिटायर हो जाएंगे। क्या यह उनके साथ अन्याय नहीं होगा? CBI five year terms

अभी तो यह कानून सिर्फ दो एजेंसियों के प्रमुखों के लिए आया है लेकिन आने वाले समय में अगर सभी फिक्स्ड टर्म वाले पदों के लिए आ जाए तो हैरानी नहीं होगी। इससे फिक्स्ड टर्म वाले पदों पर बैठे अधिकारियों की सरकार व सत्तारूढ़ दल के प्रति निष्ठा व प्रतिबद्धता सुनिश्चित करना आसान हो जाएगा। वरना अभी फिक्स्ड टर्म वाले अधिकारियों को दूसरे जतन करने होते हैं। उनको कार्यकाल खत्म होने के बाद कभी चुनाव आयुक्त बनने का जुगाड़ लगाना होता है तो कभी राज्यसभा का महासचिव बनने की व्यवस्था करनी होती है। सरकार के सामने भी मुश्किल रहती है कि अदालत कहीं ऐसी किसी नियुक्ति पर सवाल न उठा दे, जैसे दो महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने उठा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के मौजूदा निदेशक संजय कुमार मिश्र का नवंबर में कार्यकाल खत्म होने के बाद सेवा विस्तार देने पर रोक लगा दी थी। अदालत ने यह भी कहा था कि किसी भी अधिकारी को सेवा विस्तार बहुत विशेष स्थितियों में ही दिया जाना चाहिए।

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अदालत की यह टिप्पणी सरकार को इतनी नागवार गुजरी कि उसने 29 नवंबर से शुरू होने वाले संसद सत्र का भी इंतजार नहीं किया और अध्यादेश के जरिए अपने को इस अधिकार से लैस किया कि वह सीबीआई और ईडी के निदेशकों को एक-एक साल का तीन सेवा विस्तार दे सके और अदालत इसमें दखल न दे पाए। अगर सरकार कानून बनाने के लिए संसद सत्र का इंतजार करती तो संजय मिश्र रिटायर हो जाते क्योंकि उनका कार्यकाल 17 नवंबर को खत्म हो रहा था। उनकी कमान में ईडी की जांच देश के तमाम विपक्षी पार्टियों के नेताओं के खिलाफ चल रही है। पहले भी एजेंसियां जांच करती थीं लेकिन इतिहास में कभी ऐसा नहीं रहा कि सत्तारूढ़ दल के सारे नेता गंगा नहाए हुए माने जाएं और विपक्ष के सारे नेता चोर-बेईमान साबित किए जाएं। इस समय ईडी की जांच मुख्य विपक्षी कांग्रेस के साथ साथ तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस, डीएमके आदि लगभग सभी विपक्षी पार्टियों के नेताओं के खिलाफ चल रही है।

CBI arrests naval officers

तभी सरकार ने संसद सत्र का इंतजार किए बिना अध्यादेश लाकर कानून बना दिया। अध्यादेश के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सवाल उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1986 में डीसी वाधवा केस में कहा था कि अध्यादेश बहुत खास परिस्थितियों में इस्तेमाल के लिए है और इसका इस्तेमाल किसी हाल में राजनीतिक मकसद के लिए नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन सरकारों को इससे फर्क नहीं पड़ता है। केंद्र की मौजूदा सरकार ने अपने सात साल के कार्यकाल में हर साल औसतन 11 अध्यादेश जारी किए। इससे पहले मनमोहन सिंह की कमान वाली यूपीए सरकार ने हर साल औसतन सात अध्यादेश जारी किए थे और उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने औसतन 10 अध्यादेश हर साल जारी किए थे। यानी इस मामले में कांग्रेस ने संविधान और सुप्रीम कोर्ट की भावना का सबसे कम अनादर किया।

बहरहाल, सरकार को अगर लग रहा था कि ठसके से सरकार चलाने के लिए विश्वासपात्रवाद को मजबूत करना बहुत जरूरी है तो वह अध्यादेश या कानून के जरिए सीधे केंद्रीय एजेंसियों के प्रमुखों को पांच साल का स्थायी कार्यकाल दे सकती थी। लेकिन ऐसा करने पर कमान हाथ से निकल सकती थी क्योंकि एक बार पांच साल के लिए पद पर बैठा व्यक्ति विश्वासपात्र बना रहेगा, इसमें संदेह है। लेकिन अगर उसे एक-एक साल का सेवा विस्तार मिलेगा तो वह अगले विस्तार की प्रत्याशा में सरकार की मर्जी से काम कर सकता है। ध्यान रहे पिछले सालों में अनेक एजेंसियां तदर्थ व्यवस्था के तहत ही चली हैं या चल रही हैं। कहीं से रिटायर अधिकारियों को ठेके पर कहीं बैठा दिया जाता है या कहीं पर तीन महीने, छह महीने या साल भर का सेवा विस्तार देकर काम कराया जाता है। विश्वासपात्रवाद में मौजूदा सरकार की आस्था को अधिकारी समझ गए हैं तभी तो आयकर विभाग के एक कर्मठ और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी ने अपनी सहयोगी से कहा था कि उसने सर्वोच्च पद ऐसे ही हासिल नहीं किया है, बल्कि विपक्ष के एक बड़े नेता के ऊपर कार्रवाई करके हासिल किया है। उनकी इस योग्यता के कारण ही रिटायर होने के बाद अभी उनको कैबिनेट सचिव के दर्जे वाला एक पद दिया गया है।

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बहरहाल, भारत सरकार ने सीबीआई और ईडी के प्रमुखों का कार्यकाल बढ़ाने का अध्यादेश लाकर न सिर्फ संसद की अवमानना की है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की भी अवमानना की है। सरकार ने अपने अहंकार में संसद सत्र के दो हफ्ते पहले अध्यादेश लाकर कानून बदला और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी एक तरह से ठेंगा दिखाया। ऐसा नहीं है कि सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग या नारकोटिक्स कंट्रोल विभाग का पहले राजनीतिक इस्तेमाल नहीं होता था। पहले भी सरकारें अपने विरोधियों के खिलाफ इनका इस्तेमाल करती थीं, लेकिन अब जितने आक्रामक तरीके से इन एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है वैसे पहले कभी नहीं हुआ। तभी सरकार की मंशा पर ज्यादा गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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