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बैंक डूबेंगे ही क्यों?

PM Modi natural farming

प्रधानमंत्री ने बड़े जतन से देश के लोगों को समझाया कि बैंकों में जमा उनका पैसा सुरक्षित है और अगर किसी वजह से बैंक डूबते हैं तो खाताधारकों की पांच लाख रुपए तक की जमा रकम मिल जाएगी। यह अच्छी बात है कि सरकार ने जमा रकम की गारंटी को एक लाख से बढ़ा कर पांच लाख रुपया कर दिया है। इसका मतलब है कि कोई बैंक बंद होता है या दिवालिया होता है तो तीन से चार फीसदी खाताधारकों को छोड़ कर बाकी किसी का पैसा नहीं डूबेगा। लेकिन सवाल है कि इन तीन-चार फीसदी लोगों का भी पैसा क्यों डूबना चाहिए? क्या जिन लोगों की कमाई ज्यादा है, जिन्होंने बैंक में ज्यादा पैसे जमा किए हैं, उस पर सरकार को टैक्स दिया है, उनके पैसे की सुरक्षा की गारंटी सरकार को क्यों नहीं देनी चाहिए? प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि पहले की सरकारों के समय बैंक डूबते थे तो सिर्फ एक लाख रुपए मिलते थे। क्या कोई सरकार की तरफ से बताएगा कि पहले की सरकारों में कितने बैंक डूबे हैं और उसमें लोगों का कितना रुपया डूबा है?

हकीकत है कि 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किए जाने के बाद भारत में एक भी सरकारी बैंक दिवालिया नहीं हुआ है। यह भी हकीकत है कि दुनिया भर के निजी और विदेशी बैंक खुल जाने के बावजूद भारत में 87 फीसदी के करीब लोगों का पैसा सरकारी बैंकों में जमा है। यह भी हकीकत है कि 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के समय जब दुनिया भर के बैंक दिवालिया हो रहे थे और सब प्राइम क्राइसिस की वजह से अमेरिका में दैत्याकार वित्तीय संस्था लेहमन ब्रदर्स सहित 30 के करीब बैंक बंद हुए तब भी भारत में कोई बैंक दिवालिया नहीं हुआ। यह भी हकीकत है कि बैंक ग्राहकों के हितों का ढिंढोरा पीट रही इस सरकार के कार्यकाल में पिछले पांच बैंक और कई वित्तीय संस्थाएं डूबी हैं। लक्ष्मी विकास बैंक, पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक आदि के खाताधारकों को अपने पैसे निकालने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि बैंक डूबने पर 90 दिन के अंदर लोगों को पांच लाख रुपए तक की जमा रकम मिल जाएगी लेकिन पीएमसी बैंक के अलावा कम से कम पांच सहकारी बैंक ऐसे हैं, जिनके खाताधारकों को अपनी जमा रकम नहीं मिलेगी क्योंकि वे नए नियम अधिसूचित होने से थोड़े दिन पहले दिवालिया हो गए थे।

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बैंकों में जमा पांच लाख रुपए तक की रकम सुरक्षित होने की गारंटी करने की बजाय सरकार को यह गारंटी करनी चाहिए कि बैंक नहीं डूबेंगे। बैंकों की निगरानी के लिए रिजर्व बैंक जैसी संस्था है, जो देश में संभवतः सबसे ज्यादा कमाई करने वाली कंपनी है और जिसका रिजर्व पैसा लेकर पिछले कई सालों से केंद्र सरकार अपना काम चला रही है। ऐसी संस्था के होते बैंक क्यों डूबने चाहिए? ध्यान रहे भारत में आम लोग बैंक में पैसा जमा करते हैं और बड़े लोग कर्ज लेते हैं। फिर बड़े लोग मिलीभगत करके बैंकों का पैसा खा जाते हैं और उसके बाद सरकार करदाताओं के पैसे से उसकी भरपाई करती है। तभी एक लाख रू या पांच लाख रुपए सुरक्षित होने की गारंटी का कोई मतलब नहीं है। सरकारें इस तरह की गारंटी पहले भी देती रही हैं लेकिन लोगों को सुरक्षा तभी मिली तब संस्थाएं ठीक ढंग से चलती रहीं। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जब भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी की शुरुआत कराई थी तब उनकी सरकार ने इस संस्था की ओर से संप्रभु गारंटी दी थी कि अगर एलआईसी लोगों का पैसा नहीं दे पाएगी तो सरकार पैसा देगी। पिछले करीब 70 साल में एक बार भी एलआईसी को संप्रभु गारंटी के इस्तेमाल की जरूरत नहीं पड़ी। लेकिन आज जिस तरह से एलआईसी के मत्थे आईडीबीआई बैंक को मढ़ा गया या इंडसइंड बैंक में उसकी हिस्सेदारी बढ़वाई जा रही है या आईपीओ लाकर उसके निजीकरण की शुरुआत की जा रही है उससे आशंका पैदा हो रही है।

असल में नोटबंदी के समय शुरू हुई गलत आर्थिक नीतियों और चहेते उद्योगपतियों को बेरोक-टोक कर्ज दिलाने की नीति ने देश की बैंकिंग व्यवस्था को खोखला बना दिया है। इसे किसी तरह से रंग-रोगन करके बचाया जा रहा है। जब बैंकों का कर्ज बढ़ जा रहा है तो उनकी बैलेंस शीट साफ-सुथरी दिखाने के लिए कर्ज की रकम को बट्टे खाते में डाल दिया जा रहा है यानी राइट ऑफ कर दिया जा रहा है। जब इससे काम नहीं चल रहा है और बैंकों का एनपीए यानी डूबे हुए कर्ज की मात्रा बढ़ जा रही है तो ज्यादा एनपीए वाले बैंकों का कम एनपीए वाले बैंकों में विलय कर दिया जा रहा है। देश के कई बड़े कारोबारी हजारों करोड़ रुपए लेकर विदेश फरार हो गए, कई बड़े उद्योगपति कथित रूप से दिवालिया हो गए और हजारों करोड़ रुपए के कर्ज में डूबी उनकी कंपनियां कौड़ी के मोल फिर उन्हीं को दी गईं या किसी दूसरे चहेते उद्योगपति को दे दी गईं। दिवालिया संहिता बनाए जाने के बाद बैंकों के लाखों करोड़ रुपए बट्टे खाते में चले गए और सरकार समझाती है कि बट्टे खाते में डालने का मतलब कर्ज माफ करना नहीं होता है! इस साल बजट सत्र के दौरान तब के वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने संसद को बताया कि 2018-19 में सरकार ने 2.36 लाख करोड़ रुपए, 2019-20 में 2.34 लाख करोड़ और 2020-21 के पहले नौ महीनों में 1.50 लाख करोड़ रुपए का कर्ज बट्टे खाते में डाला है। यानी मार्च 2021 से पहले के 33 महीने में केंद्र सरकार ने छह लाख 20 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बट्टे खाते में डाला।

सवाल है कि क्या गलत आर्थिक नीतियों की वजह से बैंकों पर इतना बोझ नहीं बढ़ रहा है और बैंक कंगाल नहीं हो रहे हैं? बैंकों को कंगाल होने से बचाने के लिए कॉस्मेटिक उपाय करने की बजाय सरकार क्यों नहीं अर्थव्यवस्था को संभालने के ठोस उपाय कर रही है? पिछले पांच साल में अनेक निजी बैंक, सहकारी बैंक और वित्तीय संस्थाएं दिवालिया हो गईं। बैंकों का एक लाख करोड़ रुपए का कर्ज लेकर आईएलएंडएफएस जैसी कंपनी डूब गई। लगभग इतने ही कर्ज वाली डीएचएफएल कंपनी डूब गई। देश के सबसे बड़े निजी बैंक आईसीआईसीआई बैंक की चेयरपर्सन के ऊपर हजारों करोड़ रुपए के कर्ज घोटाले का आरोप लगा। नोटबंदी के समय एक्सिस बैंक के ऊपर हजारों करोड़ रुपए की गड़बड़ी के आरोप लगे। निजी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं में सबसे ज्यादा गड़बड़ियां पकड़ी गई हैं और फिर भी सरकारी बैंकों का निजीकरण करने की मुहिम चल रही है! सरकार लोगों के पैसे की गारंटी दे, यह अच्छी बात है लेकिन उससे पहले इस बात की गारंटी दे कि बैंक नहीं डूबेंगे और उन्हें बचाने के लिए करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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