Concerns data protection bill डाटा प्रोटेक्शन बिल की चिंताएं
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डाटा प्रोटेक्शन बिल की चिंताएं

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अगर केंद्र सरकार ने कृषि कानूनों के अनुभव से कुछ भी सबक लिया होगा तो डाटा प्रोटेक्शन बिल, 2019 को संसद से पास कराने से पहले उस पर विस्तार से चर्चा कराएगी और सहमति बनाने का प्रयास करेगी। सरकार कह सकती है कि उसने दो साल तक बिल पर सहमति बनाने का प्रयास किया है और विस्तार से विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाई थी, जिसने अपनी रिपोर्ट दे दी है। यह सही है कि संयुक्त संसदीय समिति ने इस बिल पर विचार किया है लेकिन समिति ने जिस रिपोर्ट को स्वीकार किया है वह आम राय वाली रिपोर्ट नहीं है। विपक्ष के सात सांसदों ने बिल के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। विपक्ष के सांसदों ने साझा तौर पर अपना लिखित विरोध दर्ज कराया है। लेकिन चूंकि संसदीय समिति में सत्तापक्ष का बहुमत था इसलिए रिपोर्ट स्वीकार कर ली गई। संयुक्त संसदीय समिति ने जिस रूप में बिल को स्वीकार किया उसी रूप में अगर इसे संसद से पास कराया जाता है तो इसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

यह बिल प्राइवेट डाटा प्रोटेक्शन के लिए है यानी इसमें देश के आम नागरिक की निजता और उसके बारे में सूचनाओं की गोपनीयता दोनों पक्ष शामिल हैं। पर ऐसा नहीं लग रहा है कि सरकार लोगों की निजता और गोपनीयता की रक्षा के लिए गंभीर है। वह इस बिल के बहाने भी अपनी ताकत बढ़ा रही है और डाटा हैंडलिंग पर अपना एकाधिकार बना रही है। वह इसी बहाने नागरिकों की सूचनाओं तक अपनी बेरोकटोक पहुंच बना रही है और साथ ही सोशल मीडिया की नकेल भी कस रही है। तभी जरूरी है कि बारीकी से इस बिल के हर पहलू पर संसद में चर्चा हो और विपक्ष के सांसदों ने बिल के जिन प्रावधानों पर आपत्ति जताई है उन्हें ठीक किया जाए।

ध्यान रहे पुत्तुस्वामी केस में सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के निजता के अधिकार को बुनियादी अधिकार माना है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ध्यान में रखते हुए ही सरकार को यह कानून बनाना चाहिए।

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अफसोस की बात है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भावना का मान नहीं रखा है। सरकार ने इस कानून में अपनी एजेंसियों को कानून के दायरे से ऊपर कर दिया है। सबसे ज्यादा विरोध इसी प्रावधान का हुआ है। बिल की धारा 35 के तहत सरकार को यह अधिकार होगा कि वह केंद्रीय एजेंसियों को इस कानून के दायरे से पूरी छूट दे सके। राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर सरकार केंद्रीय एजेंसियों को निजता की रक्षा के लिए लाए जा रहे इस कानून से छूट दे सकती है। इतना ही नहीं केंद्रीय एजेंसियों को यह अधिकार होगा कि वे किसी व्यक्ति की जानकारी या उसकी सहमति के बगैर उसके बारे में निजी जानकारियां जुटाएं। एक तरह से इसके जरिए सरकार केंद्रीय एजेंसियों को नागरिकों की बेलगाम निगरानी की छूट दे रही है। यह कानून निजी डाटा की सुरक्षा के लिए लाया जा रहा है लेकिन इस बिल का मसौदा इस तरह से बनाया गया है कि इसमें एजेंसियों को ऐसा डाटा जुटाने की भी छूट है, जो निजी नहीं हो। ऊपर से राष्ट्रीय सुरक्षा, एकता, अखंडता या कानून-व्यवस्था की परिभाषा इतनी अस्पष्ट है कि इनका इस्तेमाल कहीं भी किया जा सकता है।

इस कानून में चिंता की दूसरी बात यह है कि नए कानून के तहत जो डाटा प्रोटेक्शन ऑथोरिटी बनने वाली है उसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी। सोचें, जो कमेटी पूरी तरह से सरकार द्वारा नियुक्त की जाएगी और उसकी निगरानी में काम करेगी उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह नागरिकों की निजता और उसकी सूचनाओं की गोपनीयता की पूरी तरह से रक्षा करेगी? ध्यान रहे नागरिकों की निजता और उसकी निजी सूचनाओं की गोपनीयता को सर्वाधिक खतरा सरकारी एजेंसियों से ही होता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि निजी कंपनियां या संस्थाएं नागरिकों का डाटा नहीं चुराती हैं या उनका दुरुपयोग नहीं करती हैं लेकिन उनका मकसद सिर्फ कारोबारी होता है लेकिन सरकारी एजेंसियां किसी और मकसद से कानून का उल्लंघन कर सकती हैं। इसलिए सरकार को डाटा प्रोटेक्शन ऑथोरिटी के गठन के प्रावधानों पर नए सिरे से विचार करना चाहिए और अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति का पैमाना और प्रक्रिया ऐसी बनानी चाहिए, जिससे लोगों का भरोसा बने और डाटा सुरक्षा की गारंटी हो।

इस कानून में एक बड़ा प्रावधान यह है कि सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को इंटरमीडियरी की बजाय प्रकाशक मानेगी। अगर उनको प्रकाशक माना जाता है तो प्रकाशकों के ऊपर लागू होने वाली सारी बाध्यता उन पर भी लागू होगी। उनको हर यूजर को वेरीफाई करना होगा। हर यूजर उनके प्लेटफॉर्म का लेखक माना जाएगा और वह जो भी लिखेगा या उसका लिखा जो भी उस प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित होगा, उसकी जिम्मेदारी कंपनी की भी होगी। अगर किसी बिना वेरीफाई किए गए अकाउंट से भी कुछ लिखा जाता है तो उसकी जिम्मेदारी भी प्लेटफॉर्म यानी कंपनी के ऊपर आएगी। ध्यान रहे पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगाम कसने की तैयारी कर रही थी। इसके लिए नए आईटी बिल लागू किए गए हैं। अब सरकार को निजी डाटा प्रोटेक्शन कानून के जरिए इन कंपनियों पर लगाम कसने की ज्यादा छूट मिल जाएगी। हालांकि इससे संभव है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नफरत फैलाने वाला या अश्लील कंटेंट कम हो लेकिन इनका संचालन करने वाली कंपनियों पर सरकार का नियंत्रण मजबूत होगा।

सरकार को इन चिंताओं पर गौर करना चाहिए। सरकार डाटा प्रोटेक्शन बिल 29 नवंबर से शुरू हो रहे संसद सत्र में पेश करने जा रही है। इसे पास कराने से पहले सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि कानून आधा अधूरा न हो। ध्यान रहे खराब कानून से बेहतर होता है कोई कानून नहीं होना। अगर सरकार आधा अधूरा कानून बनाती है तो उससे निजता के उल्लंघन और नागरिकों की निगरानी को कानूनी स्वीकृति मिल जाएगी और लोगों के कानून से राहत हासिल करने का रास्ता बंद हो जाएगा। अगर सरकार ऐसा नहीं चाहती है और सचमुच आम लोगों की निजता और डाटा सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहती है तो वह विपक्ष की ओर से उठाई गई आपत्तियों पर ध्यान दे और उनकी बताई कमियों को दूर करने के बाद ही इसे पास कराए। तभी कानून का असली मकसद पूरा होगा।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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