congress mukth bharat BJP सहयोगियों से भी सावधान रहे कांग्रेस
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सहयोगियों से भी सावधान रहे कांग्रेस

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शरद पवार ने देश के दो जाने-माने पत्रकारों को दिए इंटरव्यू में कहा कि कांग्रेस कभी कश्मीर से कन्याकुमारी तक थी लेकिन आज वह सिमट गई है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस अपनी पुरानी हवेली भी मेंटेन नहीं कर पा रही है लेकिन उसका आचार-व्यवहार अब भी पुराने जमींदार की तरह है। यह मामूली टिप्पणी नहीं है। यह कांग्रेस पार्टी के प्रति शरद पवार की सोच को दिखाने वाली टिप्पणी है। congress mukth bharat BJP

कांग्रेस पार्टी को सावधान हो जाना चाहिए। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी पार्टियां कांग्रेस को खत्म करके देश को कांग्रेस मुक्त बनाने की राजनीति कर रही हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां भी कुछ कुछ इसी लाइन पर चल रही हैं। वे कहीं भी कांग्रेस को मजबूत करने में मददगार नहीं बन रही हैं। उलटे राजनीतिक और सांगठनिक दोनों रूपों से कांग्रेस को कमजोर करने की राजनीति कर रही हैं। शरद पवार की ओर से कांग्रेस को निशाना बना कर बार बार की जा रही टिप्पणियां अनायास नहीं हैं। वे सोची समझी रणनीति के तहत कांग्रेस को उसकी हैसियत बता रहे है। दूसरी सहयोगी पार्टियां चाहे वह शिव सेना हो या राष्ट्रीय जनता दल और डीएमके हो या झारखंड मुक्ति मोर्चा, कोई यह स्वीकार नहीं कर रहा है कि भाजपा से लड़ने के लिए कांग्रेस को मजबूत करने की जरूरत है।

ध्यान रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा का कोई दूसरा नेता कांग्रेस के ऊपर हमला करता है या उसकी कमियां बताता है तो उसका सीमित असर होता है। चूंकि भाजपा खुद सात साल से सरकार चला रही है इसलिए कांग्रेस पर होने वाले उसके हमले का असर और भी सीमित हो गया है। लोग इसे दो विपक्षी पार्टियों के बीच की स्वाभाविक बयानबाजी मानते हैं। लेकिन जब वहीं बात कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां कहती हैं तो उसका ज्यादा असर होता है। यहीं कारण है कि जब शरद पवार ने कांग्रेस को ऐसा जमींदार बताया, जिसके पास पुरानी हवेली बची है और उसकी हैसियत उस हवेली के रख-रखाव की भी नहीं है तो कई केंद्रीय मंत्रियों ने इसे ट्विट किया। केंद्रीय मंत्रियों को पता है कि सात साल तक केंद्र में सत्ता में रहने के बाद कांग्रेस पर किए जाने वाले उनके हमले की धार भोथरी हो गई है। अब वे खुद निशाने पर हैं। इसलिए वे कांग्रेस के सहयोगियों के कंधे का इस्तेमाल कर रहे हैं।

शरद पवार ने देश के दो जाने-माने पत्रकारों को दिए इंटरव्यू में कहा कि कांग्रेस कभी कश्मीर से कन्याकुमारी तक थी लेकिन आज वह सिमट गई है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस अपनी पुरानी हवेली भी मेंटेन नहीं कर पा रही है लेकिन उसका आचार-व्यवहार अब भी पुराने जमींदार की तरह है। यह मामूली टिप्पणी नहीं है। यह कांग्रेस पार्टी के प्रति शरद पवार की सोच को दिखाने वाली टिप्पणी है। उनके कहने का मतलब है कि कांग्रेस अब सिमट कर बहुत छोटी पार्टी हो गई है इसलिए उसे छोटी पार्टियों के साथ बराबरी का बरताव करना चाहिए और उनके हिसाब से राजनीति करनी चाहिए। यह असल में कांग्रेस की बची-खुची जमींदारी को भी खत्म करने के प्रयास का हिस्सा है। यह काम शरद पवार कांग्रेस की दूसरी सहयोगी पार्टियों के साझा प्रयास के तौर पर कर रहे हैं।

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पवार के पीछे दूसरी पार्टियों का समर्थन है। पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 19 विपक्षी पार्टियों की वर्चुअल बैठक की थी। उस बैठक में उन्होंने कार्यवाही शुरू करने के लिए सीताराम येचुरी को कहा तो ममता बनर्जी ने उन्हें टोक दिया। ममता ने कहा कि शरद पवार जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता बैठक में शामिल हैं तो कार्यवाही उन्हें शुरू करनी चाहिए। पवार के प्रति ममता का यह सद्भाव नया नहीं है। उनके चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर पहले ही पवार से मिल कर आगे की राजनीति की योजना बना चुके हैं। यह योजना पोस्ट मोदी पोलिटिक्स में गैर कांग्रेसी नेता के हाथ में सत्ता और समूचे विपक्ष की कमान देने की रणनीति पर आधारित है।

असल में कांग्रेस के कमजोर होने से तमाम क्षेत्रीय पार्टियां अपने लिए अवसर देख रही हैं। उनको पता है कि वे कांग्रेस के वोट बैंक पर फली-फूली हैं। ध्यान रहे भारत की राजनीति में अगर काडर वोट की बात होगी तो अब वह सिर्फ भाजपा के पास बची है। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और हिंदुत्व की विचारधारा की वजह से उसके पास एक प्रतिबद्ध वोट बैंक है, जिसे तोड़ना मुश्किल है। इसी वजह से भाजपा से निकल कर आज तक कोई नेता सफल नहीं हो सका। कोई कितना भी बड़ा नेता रहा हो वह भाजपा का वोट बैंक अपने साथ नहीं ले जा सका। क्षेत्रीय पार्टियां यह बात जानती हैं। इसलिए भाजपा का वोट तोड़ने में मेहनत करने की बजाय वे कांग्रेस का वोट तोड़ कर खुद को मजबूत करने की राजनीति करती हैं। यह कांग्रेस की कमजोरी रही कि वह कोई ऐसा मजबूत सैद्धांतिक या वैचारिक धागा नहीं बना सकी, जिससे पार्टी के वोट बैंक को बांध कर रखा जा सके। यहीं कारण है कि कांग्रेस छोड़ कर निकलने वाले नेता आमतौर पर सफल हो गए। कांग्रेस से निकल कर कांग्रेस के नाम वाली नई पार्टी बना कर सफल हुए तमाम नेता अब कांग्रेस के लिए मुसीबत बने हैं।

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एक तरफ भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस नेताओं को तोड़ रही है और उनको अच्छे पदों से नवाज रही है तो दूसरी ओर कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां भी इसमें पीछे नहीं हैं। शिव सेना ने कांग्रेस की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी को पार्टी में शामिल होने के एक साल के अंदर राज्यसभा भेज दिया तो तृणमूल कांग्रेस ने अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देब को कांग्रेस छोड़ने के एक महीने के भीतर ही राज्यसभा की टिकट दे दी। सो, कांग्रेस के बचे खुचे नेताओं के लिए यह बहुत आकर्षक प्रस्ताव है कि वे पार्टी छोड़ें और उनको तत्काल लाभ हो जाए। भाजपा तो अब मुख्यमंत्री भी बनाने लगी है। सो, अब तक भारी छूट के साथ बिक्री के लिए बाजार में तैयार खड़े कांग्रेस नेताओं को प्रीमियम प्रस्ताव मिलने लगे हैं। आने वाले दिनों में अगर कांग्रेस जरा सी भी और फिसलती है तो ऐसी भगदड़ मचेगी, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है।

इसमें सारी सहयोगी पार्टियां अपनी भूमिका निभा रही हैं। तमाम सद्भाव के बावजूद डीएमके ने कांग्रेस को राज्य में खाली हुई तीन में से एक भी राज्यसभा सीट नहीं दी। उसने यह सुनिश्चित किया कि कांग्रेस अपने 18 विधायकों के दम पर सिर्फ एक राज्यसभा सीट की हकदार है और उसे एक ही सीट मिले। भले वह सिर्फ चार सीट वाली वामपंथी पार्टियों को या दूसरी छोटी प्रादेशिक पार्टियों को राज्यसभा की सीट दे दे लेकिन कांग्रेस को एक अतिरिक्त सीट नहीं देगी। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ने ऐन चुनाव के समय एक सहयोगी पार्टी के साथ छोड़ने पर कांग्रेस को 30 अतिरिक्त सीटें दी लेकिन यह सुनिश्चित किया कि कांग्रेस को ऐसी सीटें मिलें, जहां वह किसी हाल में नहीं जीत सके। झारखंड में कांग्रेस सत्ता में भागीदार है लेकिन नीतिगत फैसलों में उसकी भूमिका शून्य है। जेएमएम के नेता और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वोट बैंक के लिहाज से विभाजनकारी राजनीति में भाजपा को भी पीछे छोड़ा हुआ है, जिसका नुकसान कांग्रेस को कई जगह होगा, लेकिन कांग्रेस कुछ भी नहीं कर पा रही है।

सो, कांग्रेस के लिए सावधान होने का और जहां तक हो सके अकेले, अपने दम पर राजनीति करने का समय है। कांग्रेस को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भाजपा को रोकने के नाम पर सिर्फ उसी को कुर्बानी देने के लिए कहा जा रहा है। यह सही है कि भाजपा को रोकने में कांग्रेस की बड़ी या केंद्रीय भूमिका है। लेकिन यह सिर्फ मुंहजबानी कहने भर से नहीं होगा। सभी पार्टियां यह जरूर कह रही हैं कि कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता या विपक्ष की राजनीति संभव नहीं है लेकिन वे कांग्रेस को केंद्र में रख कर सिर्फ अपना हित पूरा करने की राजनीति कर रही हैं। कांग्रेस को केंद्र में रखना है तो उसे केंद्रीय ताकत बनाना होगा, उसे मजबूत करना होगा और इसके लिए सहयोगी पार्टियों को अपने अपने हिस्से की कुर्बानी देनी होगी। लेकिन फिलहाल कोई सहयोगी पार्टी इसके लिए तैयार नहीं है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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