विपक्ष में क्या हाशिए में होगी कांग्रेस? - Naya India
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विपक्ष में क्या हाशिए में होगी कांग्रेस?

तभी वे इस सोच में है कि भारतीय जनता पार्टी कमजोर होगी या उसकी सरकार गलतियां करेगी तो देश के मतदाता स्वाभाविक रूप से कांग्रेस को विकल्प मान लेंगे। यह कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह अपने को वास्तविक विपक्ष के तौर पर स्थापित करने और भाजपा से लड़ने की बजाय इस उम्मीद में बैठी है कि वह भाजपा का स्वाभाविक विकल्प है।

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कांग्रेस देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। लोकसभा के दो चुनावों से वह मुख्य विपक्षी पार्टी बनने लायक सीटें नहीं जीत पा रही है फिर भी वह विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है और अखिल भारतीय स्तर पर मिले वोट प्रतिशत के लिहाज से वह मुख्य विपक्षी पार्टी भी है। देश के हर राज्य में उसका संगठन हैं, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार हैं और कमजोर होने के बावजूद उसका एक निश्चित वोट बैंक भी है। उसके मुख्य विपक्षी पार्टी होने का एक सबूत यह भी है कि प्रधानमंत्री से लेकर सत्तारूढ़ दल के हर नेता के निशाने पर कांग्रेस और उसके नेता होते हैं। सो, कायदे से कांग्रेस को ही विपक्ष की राजनीति का केंद्र होना चाहिए। अभी तक ऐसा रहा भी है लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि विपक्ष की पार्टियां मिल कर कांग्रेस को विपक्षी राजनीति के केंद्र से विस्थापित करने का प्रयास कर रही हैं। इसमें विपक्षी पार्टियों की अपनी राजनीति है तो कांग्रेस की अपनी कमजोरी भी है।

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सबसे पहले कांग्रेस की ताकत और उसकी कमजोरी पर विचार करते हैं। कांग्रेस की ताकत यह है कि वह अखिल भारतीय पार्टी है, सबसे पुरानी पार्टी के नाते उसकी एक विरासत है, उसके पास संगठन है और जरूरी संसाधन भी हैं। उसके पास राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नजरिया है, जो कि किसी क्षेत्रीय पार्टी के पास नहीं है। हालांकि यह एक आभासी ताकत है और दिक्कत यह है कि कांग्रेस के नेता इसी को असली ताकत मान रहे हैं। तभी वे इस सोच में है कि भारतीय जनता पार्टी कमजोर होगी या उसकी सरकार गलतियां करेगी तो देश के मतदाता स्वाभाविक रूप से कांग्रेस को विकल्प मान लेंगे। यह कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह अपने को वास्तविक विपक्ष के तौर पर स्थापित करने और भाजपा से लड़ने की बजाय इस उम्मीद में बैठी है कि वह भाजपा का स्वाभाविक विकल्प है।

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पहले ऐसा हो चुका है इसलिए कांग्रेस को उम्मीद है कि आगे भी ऐसा होगा। लेकिन अब पहले जैसे हालात नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने छह साल के शासन में गलतियां कीं  तो 2004 में लोगों ने कांग्रेस को विकल्प मान कर वोट किया। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। वाजपेयी के समय की न तो सरकार है और न उस समय की भाजपा की है। उस समय भाजपा और वाजपेयी सरकार दोनों विपक्ष को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानते थे। उसे अपना दुश्मन मान कर उसे खत्म करने की राजनीति नहीं करते थे। अभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का नारा ही दिया है। इसके लिए उनकी सरकार और पार्टी हर संभव उपाय कर रहे हैं। सबसे पहले राजनीतिक चंदे का इलेक्टोरल बांड वाला ऐसा सिस्टम बनाया गया कि कांग्रेस की आमदनी के सारे स्रोत सूख गए। उसके बाद कांग्रेस नेताओं को भ्रष्ट साबित करने के लिए उसके सर्वोच्च नेता से लेकर प्रदेशों के तमाम क्षत्रपों के ऊपर भ्रष्टाचार के मुकदमे कराए गए। मीडिया और सोशल मीडिया के सहारे कांग्रेस के 50 साल से ज्यादा समय के शासन में कोई काम नहीं होने की धारणा बनवाई गई। कांग्रेस नेताओं के नए-पुराने बयानों के बहाने कांग्रेस को देश विरोधी और पाकिस्तानपरस्त पार्टी बताया गया।

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सबसे ऊपर कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी को ‘पप्पू’ साबित करने का अभियान चलाया गया। सच्ची झूठी खबरों, सोशल मीडिया के झूठे वायरल पोस्ट, फोटोशॉप की गई तस्वीरों और संपादित वीडियो के जरिए यह धारणा बनवाई गई कि राहुल गांधी से नहीं हो पाएगा। उनको एक विफल और नासमझ नेता के तौर पर स्थापित किया गया। सोचें, यह अभियान कितने व्यवस्थित तरीके से चला कि खुद कांग्रेस के नेता और कांग्रेस का समर्थन करने वाले आम लोग भी मानने लगे कि राहुल से नहीं होगा। वे खुद ही पूछने लगे कि नरेंद्र मोदी की जगह क्या राहुल गांधी को बैठा दें! प्रचार की यह कैसी ताकत है कि हर मोर्चे पर विफल सरकार हो रही लेकिन लोग कांग्रेस को कमजोर बता रहे हैं और उससे सवाल पूछ रहे हैं!

धारणा के स्तर पर कांग्रेस को कमजोर करने का अभियान भाजपा ने बहुत व्यवस्थित तरीके से चलाया। इस बीच कांग्रेस राजनीतिक रूप से भी कमजोर होती गई। दो लोकसभा चुनावों में उसकी ताकत घटी तो राज्यों के चुनावों में भी उसका आधार घटता गया। वह अनेक राज्यों में सत्ता से बाहर तो हुई ही मुख्य विपक्षी पार्टी की हैसियत से भी विस्थापित हो गई। कुछ राज्यों में उसकी जगह भाजपा ने ली तो कुछ जगह क्षेत्रीय पार्टियां आ गईं। ताजा मिसाल पश्चिम बंगाल का है, जहां कांग्रेस पिछले चुनाव में भी 44 सीट जीत कर मुख्य विपक्षी पार्टी बनी थी पर इस बार उसका एक भी विधायक नहीं जीता। दिल्ली में लगातार दो चुनावों से उसका खाता नहीं खुल रहा है और महाराष्ट्र में भी उसकी छोटी सहयोगी एनसीपी उससे आगे निकल गई है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कांग्रेस लगभग पूरी तरह से खत्म हो गई है तो तमिलनाडु और केरल में भी सहयोगियों के सहारे है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में उसकी हैसियत हाशिए पर की क्षेत्रीय पार्टी से ज्यादा नहीं रह गई है।

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सो, धारणा के स्तर पर कांग्रेस को असफल बनाने के भाजपा के सफल प्रयोग और राज्यों में उसके घटते राजनीतिक स्पेस ने विपक्ष की दूसरी पार्टियों को उसे विस्थापित करने के लिए प्रेरित किया है। प्रादेशिक पार्टियां ऐसा कर पाएंगी या नहीं यह अभी नहीं कहा जा सकता है लेकिन उनका व्यवस्थित प्रयास भी कांग्रेस को और कमजोर करेगा। अभी ममता बनर्जी यह प्रयास कर रही हैं। उन्होंने अपने चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को शरद पवार से मिलने भेजा। प्रशांत किशोर और पवार के बीच लंच पर कोई चार घंटे की मीटिंग हुई। इस मीटिंग का एकमात्र एजेंडा यह है कि कांग्रेस के बरक्स एक नया मोर्चा बनाया जाए, जो मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर काम करे और आम मतदाता उसे भाजपा का स्वाभाविक विकल्प माने। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रादेशिक पार्टियां भी भाजपा की ही तरह कांग्रेस को कमजोर करने का अभियान चला सकती हैं।

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सवाल है कि ममता बनर्जी को यह मौका किसने दिया? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ममता से सीधी लड़ाई बना कर उनकी हैसियत बड़ी की। चुनाव में ममता जीत गईं तो उनको लगने लगा कि वे अब विपक्ष की राजनीति का केंद्र बन सकती हैं। एक समय में नीतीश कुमार के मन में भी यह धारणा बनी थी। चंद्रबाबू नायडू और के चंद्रशेखर राव भी संघीय मोर्चा बनाने या कांग्रेस की जगह विपक्ष की धुरी बनने का प्रयास कर चुके हैं। बहरहाल, ममता को चुनावी जीत से मौका मिला लेकिन कांग्रेस ने मौका गंवाया, इससे भी उनको मौका मिला। भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने का जिम्मा कांग्रेस का था। लेकिन कांग्रेस ने दो-चार बार साझा बयान जारी करने के अलावा विपक्ष को एकजुट करने का कई प्रयास नहीं किया। कहीं भी यह सुनने को नहीं मिला कि राहुल गांधी विपक्षी नेताओं से या कम से कम अपने सहयोगी नेताओं से ही मिल रहे हैं या बात कर रहे हैं। कोरोना की महामारी के बीच उन्होंने कुछ विशेषज्ञों से जरूर बात की, लेकिन किसी विपक्षी नेता से बात नहीं की। वे वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कम से कम अपने सहयोगी नेताओं से ही बात कर सकते थे। जिन मुद्दों पर वे केंद्र सरकार के खिलाफ ट्विटर पर हमले करते हैं उन्हीं मुद्दों पर विपक्ष के साथ साझेदारी बना सकते थे। लेकिन राहुल और कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया। मौका गंवाया, जिसकी वजह से प्रादेशिक पार्टियों को मौका मिला।

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हालांकि अब भी यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रादेशिक पार्टियां कांग्रेस को मुख्य विपक्ष के स्थान और भूमिका से विस्थापित कर देंगी। पहले भी ऐसा नहीं हुआ है। कांग्रेस और भाजपा को छोड़ कर दो बार विपक्ष का तीसरा मोर्चा सत्ता में आया, लेकिन दोनों बार उसका जीवन बहुत छोटा रहा और दोनों बार उसे भाजपा या कांग्रेस पर निर्भर रहना पड़ा। इसके बाद ही भाजपा के सबसे बड़े नेता और इकलौते विचारक लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि गठबंधन की राजनीति तभी सफल होगी, जब गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी उसका नेतृत्व करे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार इसी वजह से सफलतापूर्वक चली और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए की दोनों सरकारें भी इसी वजह से सफल रहीं कि नेतृत्व कांग्रेस के हाथ में था। लेकिन वह चुनाव के बाद की बात थी। चुनाव से पहले अगर समूचा विपक्ष आक्रामक होकर अपनी पोजिशनिंग करता है और कांग्रेस मौका गंवाती रहती है तो उसकी राजनीतिक मुश्किलें बढ़ेंगी।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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