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भाजपा के बिछाए जाल में राहुल

Congress Rahul Gandhi BJP

राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी के नेता और उनके शुभचिंतक भाड़े के बुद्धिजीवी आरोप लगाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुमलेबाज हैं। लेकिन खुद एक के बाद एक ऐसे जुमले गढ़ते हैं, जिसका कोई सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य नहीं होता है। जब प्रधानमंत्री मोदी के 10 लाख के सूट का मामला सामने आया था तब राहुल गांधी ने ‘सूट-बूट की सरकार’ का जुमला बोलना शुरू किया था, लेकिन वह जुमला पीट गया। उनके किसी रणनीतिकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि मोदी अपनी पिछड़ी और गरीब पृष्ठभूमि का हवाला देकर राजनीति करते हैं और उस वर्ग के लोगों में 10 लाख का सूट पहनना गर्व का भाव भरेगा। याद करें कैसे नोटों की माला पहनने पर मायावती का विरोध हुआ था लेकिन उनके मतदाताओं पर उसका असर नहीं हुआ। जब सूट-बूट का जुमला पीटा तो राहुल ने ‘चौकीदार चोर है’ का जुमला बोला। यह सही है कि तब तक राफेल और अनिल अंबानी का मसला सामने आ गया था लेकिन उससे जनमानस में मोदी के भ्रष्ट होने की धारणा नहीं बनी थी इसलिए वह जुमला भी उलटा पड़ गया। अब राहुल गांधी ‘हिंदू बनाम हिंदुत्ववादी’ का जुमला हर जगह बोल रहे हैं। Congress Rahul Gandhi BJP

सोचें, इस जुमले का क्या मतलब है? क्या देश का आम नागरिक इस समय ‘हिंदू बनाम हिंदुत्ववादी’ की बहस में पड़ने को तैयार है? चाहे हिंदू कहें, हिंदुवादी कहें, हिंदुत्व कहें या हिंदुत्ववादी कहें, इन सबका मतलब बहुसंख्यक हिंदू होना ही होता है। यह स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म, उसकी मान्यताओं, धारणाओं और धार्मिक आचरण से जुड़ा है। हिंदू क्या करता है और हिंदुत्ववादी क्या करता है, यह समझा कर राहुल गांधी भाजपा का ही भला कर रहे हैं। क्योंकि भले दार्शनिक अर्थों में हिंदू और हिंदुत्ववाद में अंतर हो लेकिन वास्तविक अर्थों में कोई अंतर नहीं होता है। हिंदू वैसा ही होता है जैसा हिंदुत्ववादी होता है। आजादी की पहली लड़ाई में वह यह सुन कर अंग्रेजों से लड़ गया था कि कारतूस में गाय की चर्बी मिलाई जाती है। अंग्रेजों ने जेल में पीतल की बजाय मिट्टी का लोटा देना शुरू किया तो हिंदुओं ने ‘लोटा आंदोलन’ शुरू कर दिया था। महात्मा गांधी की हत्या की साजिश रचने और उसे अंजाम देने वाले हिंदू थे, उनकी हत्या के बाद महाराष्ट्र में चितपावन ब्राह्मणों की हत्याएं भी हिंदुओं के हाथों ही हुई और गांधी की हत्या पर सर्वाधिक दुख मनाने वाले भी हिंदू ही थे। खुद राहुल गांधी की दादी की हत्या के बाद सिखों के नरसंहार में भी बहुसंख्यक हिंदू ही शामिल थे। इसलिए हिंदू बड़ा विनम्र, सहनशील, सद्भाव वाला, स्वभाव से अहिंसक और सत्य बोलने वाला होता है, जबकि हिंदुत्ववादी इसका उलटा होता है, यह नैरेटिव एक मिथक है। इस मिथक में उलझ कर राहुल अपनी पार्टी का नुकसान कर रहे हैं।

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हैरानी की बात है कि राहुल गांधी खुद जाकर इस जाल में फंस रहे हैं। भाजपा ने उनको नहीं फंसाया है। भाजपा तो अपनी वहीं राजनीति कर रही है, जिसके लिए वह बनी है। वह तो दशकों से हिंदू हितों की बात करके राजनीति करती है। धर्म की राजनीति करती है। मंदिरों की राजनीति करती है। अल्पसंख्यकों को ‘अन्य’ बता कर उनके खिलाफ नफरत फैलाती है और वोटों का ध्रुवीकरण कराती है। इसके लिए पार्टी और उसके शीर्ष नेताओं की ओर से रोज नए नए एजेंडे तय किए जाते हैं। राहुल गांधी हर दिन उसी एजेंडे पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। भाजपा की ओर से तय किए गए एजेंडे की काट में भाजपा की ही राजनीति कर रहे हैं। अगर वे मानते हैं कि हिंदू के लिए धर्म दिखावे की चीज नहीं है तो फिर वे क्यों कैमरे लेकर मंदिरों में जाते हैं और पहले मंदिर क्यों नहीं जाते थे? सोनिया गांधी सार्वजनिक रूप से पूजा करने मंदिर नहीं जाती थीं और न अपनी जाति, धर्म और गोत्र बताती थीं, फिर भी उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को हरा दिया और कांग्रेस की सरकार बना दी। अब राहुल और प्रियंका दोनों कैमरा लेकर मंदिर जाते हैं और धर्म, जाति, गोत्र सब बताते हैं तो आखिर क्यों?

राहुल गांधी ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी के गंगा में डुबकी लगाने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि हिंदू करोड़ों लोगों के साथ गंगा में डुबकी लगाता है और हिंदुत्ववादी अकेले नहाता है। सोचें, इसका क्या मतलब है। जब राहुल गांधी के परिवार को एसपीजी की सुरक्षा हासिल थी तो उनका परिवार भी ऐसे ही करता था। लेकिन एक जुमला बोलने के लिए उन्होंने मोदी के गंगा में डुबकी लगाने पर सवाल उठा दिए। उन्होंने सोचा ही नहीं कि लाल रंग के कपड़े में गंगा में डुबकी लगाते हुए प्रधानमंत्री की तस्वीर देश के करोड़ों हिंदुओं के मन में क्या भाव पैदा कर रही होगी! हिंदू बनाम हिंदुत्ववाद एक बारीक और दार्शनिक किस्म की बहस का मामला है, जिसे लोकप्रिय राजनीतिक विमर्श बनाना कठिन है। लोकप्रिय राजनीतिक विमर्श में यह मुद्दा उलटा नुकसान कर सकता है। आजादी से पहले और ठीक बाद भी कांग्रेस में हिंदू और हिंदुत्ववादी दोनों तरह के नेता थे, लेकिन गांधी-नेहरू को कभी इनके बीच अंतर करने और उसे लोकप्रिय राजनीतिक विमर्श बनाने की जरूरत नहीं पड़ी।

इसलिए राहुल गांधी को इसे छोड़ना चाहिए और आम नागरिक के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े मुद्दों पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए। देश में महंगाई बेतहाशा बढ़ रही है। बेरोजगारी की दर पांच दशक में सबसे अधिक है। करीब 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे पहुंच गए हैं। देश के 81 करोड़ लोग पांच किलो अनाज और एक किलो दाल पर जीवन चला रहे हैं। सरकारी संपत्तियों को औने-पौने कीमत पर बेच कर चुनिंदा उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है। कृषि कार्य लगातार घाटे का काम बनता जा रहा है और उस पर निर्भर बड़ी आबादी मजदूर बन रही है। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में है। चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान सब देश के दुश्मन बने हैं। नागरिकों की निजता और सुरक्षा सवालों के घेरे में है। देश का सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है और विभाजन बढ़ रहा है। संसद की प्रासंगिकता कम की जा रही है और कार्यपालिका मनमाने तरीके से काम कर रही है। कांग्रेस को इन सवालों को उठाना चाहिए और सरकार को जवाबदेह बनाना चाहिए। इसकी बजाय कांग्रेस और राहुल गांधी खुद से चल कर भाजपा के बिछाए जाल में फंस रहे हैं।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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