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Friday, May 14, 2021
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बेसिर पैर की वैक्सीन नीति!

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

केंद्र सरकार को अपनी नई वैक्सीन नीति में तत्काल बदलाव करना चाहिए क्योंकि यह नीति तमाम किस्म के तर्क और विचार से परे या उसके विरूद्ध है। सरकार की वैक्सीन नीति  संघवाद की धारणा के विरूद्ध है। यह आपदा की स्थिति में सबके लिए समान अवसर मुहैया कराने की नीति के भी असंगत है और आम बजट में केंद्र की अपनी घोषित नीति के भी विरूद्ध है। यह समझ से परे है कि जब केंद्र सरकार ने आम बजट में वैक्सीन के लिए 35 हजार करोड़ आवंटित किए हैं तो वह क्यों इधर-उधर की नीति घोषित कर रही है? सरकार की वैक्सीन नीति में तो कई चीजें ऐसी बेसिर पैर की हैं, जिन्हें देख कर यह सवाल उठता है कि आपदा के इस भयावह समय में वैक्सीन की राष्ट्रीय नीति बनाते समय दिमाग का जरा सा भी इस्तेमाल हुआ था या नहीं?

जैसे केंद्र सरकार ने नई वैक्सीन नीति जारी करते हुए कहा अब से वैक्सीन के उत्पादन का 50 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार रखेगी और बाकी 50 फीसदी हिस्सा राज्यों और निजी अस्पतालों को बेचा जाएगा। सवाल है कि केंद्र सरकार जो 50 फीसदी वैक्सीन अपने पास रखेगी, उसका करेगी क्या? जब सारे राज्य अपने अपने फंड से वैक्सीन खरीदेंगे और अपने राज्य के नागरिकों को टीका लगवाएंगे तो भारत सरकार 50 फीसदी वैक्सीन का क्या करेगी? और क्या 50 फीसदी वैक्सीन में सभी राज्यों और निजी अस्पतालों का काम चल जाएगा? भारत सरकार के स्वास्थ्य सचिव ने बहुत साफ शब्दों में कहा है कि केंद्र सरकार वैक्सीन की जो डोज खरीदेगी, वह केंद्रीय अस्पतालों में ही लगाई जाएगी और वहां भी बुजुर्ग व बीमार मरीजों के अलावा स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को ही टीका लगेगा। अब सोचें, देश में कुल कितने केंद्रीय अस्पताल हैं और कितने बुजुर्ग, बीमार, स्वास्थ्यकर्मियों या फ्रंटलाइन वर्कर्स को टीका लगेगा, जिसके लिए केंद्र सरकार को पूरे उत्पादन का 50 फीसदी अपने पास रखना है? बुजुर्ग और बीमार की भी व्याख्या स्वास्थ्य सचिव ने नहीं की।

ध्यान रहे स्वास्थ्य राज्य का विषय होता है और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को छोड़ दें तो सभी राज्यों में सरकारी अस्पतालों में 90 फीसदी से ज्यादा अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र राज्य सरकारों के ही होते हैं। वैसे भी राजधानी दिल्ली में या किसी भी केंद्र शासित प्रदेश या राज्य में सरकारी अस्पतालों की संख्या बहुत सीमित हो गई है लगभग पूरी स्वास्थ्य सेवा निजी क्षेत्र के हाथों में है और राज्यों के ज्यादातर अस्पताल निजी हैं। इस हिसाब से केंद्र सरकार को पांच-दस फीसदी वैक्सीन अपने पास रखनी चाहिए और 90 फीसदी वैक्सीन राज्यों या निजी अस्पतालों के लिए अपने नियंत्रण से मुक्त करनी चाहिए तभी उनकी जरूरतें पूरी होंगी।

इस नीति की दूसरी समझ में नहीं आने वाली बात यह है कि इस राष्ट्रीय आपदा के समय केंद्र सरकार क्यों राज्यों को उनके हाल पर छोड़ रही है? जब इस साल के बजट में केंद्र सरकार ने 35 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान वैक्सीन के लिए किया और वित्त मंत्री ने बड़े गर्व के साथ घोषणा करते हुए इसे स्वास्थ्य बजट का हिस्सा बताया तो सरकार इस पैसे को खर्च क्यों नहीं कर रही है? क्या वैक्सीनेशन का जिम्मा राज्यों पर डाल कर केंद्र सरकार बजट में आवंटित पैसा बचाना चाह रही है? ध्यान रहे वैक्सीन बनाने वाली भारतीय कंपनियां केंद्र सरकार को डेढ़ सौ रुपए में एक डोज दे रही है। इस लिहाज से 35 हजार करोड़ रुपए में 233 करोड़ डोज खरीदी जा सकती है। सोचें, देश की कुल आबादी 138 करोड़ है, जिसमें 18 साल से कम उम्र की आबादी 24 फीसदी यानी 34 करोड़ के करीब है। यानी वैक्सीन लगाने लायक कुल आबादी 104 करोड़ है, जिसके लिए 208 करोड़ डोज खरीदनी होगी। केंद्र सरकार अगर 35 हजार करोड़ रुपए का बजट खर्च करे तो वह हर नागरिक के लिए बड़े आराम से वैक्सीन की दोनों डोज खरीद सकती है और बचे हुए पैसे लॉजिस्टिक्स आदि पर खर्च कर सकती है। यानी इस साल के बजट में आवंटित 35 हजार करोड़ रुपए से ही देश की वैक्सीन लेने लायक पूरी आबादी को दोनों डोज पूरी तरह से मुफ्त में लगाई जा सकती है। यह समझ में नहीं आने वाली बात है कि केंद्र सरकार ऐसा क्यों नहीं कर रही है?

इसके बाद वैक्सीन की कीमत का मसला आता है। सरकार ने जैसे ही नई वैक्सीन नीति घोषित की, वैसे ही सीरम इंस्टीच्यूट ने ऐलान कर दिया कि वह केंद्र सरकार को डेढ़ सौ रुपए में एक डोज देगी, राज्य सरकारों के लिए इसकी कीमत चार सौ रुपए और निजी अस्पतालों के लिए छह सौ रुपए होगी। अब सवाल है कि एक ही उत्पाद की तीन अलग अलग कीमत और वह भी इतने बड़े अंतर वाली कीमत कैसे हो सकती है? एक उत्पाद की पूरे देश में एक कीमत होनी चाहिए। हां, दूर-दराज के इलाकों में उत्पाद को पहुंचाने में आने वाला खर्च कम या ज्यादा हो सकता है। इसकी वजह से कीमतों में भी थोड़ा-बहुत का फर्क हो सकता है। पर यह नहीं हो सकता है कि कोई निजी कंपनी केंद्र सरकार को जिस कीमत पर अपना उत्पाद देगी, उससे तीन गुनी कीमत पर राज्य सरकारों को देगी! यह खुले बाजार की नीति के भी खिलाफ है। तभी राज्यों से पहले केंद्र सरकार को ही पहल करके वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को फटकार लगानी चाहिए कि वह ऐसा कैसे कर सकती है!

लेकिन यहां ऐसा लग रहा है कि केंद्र सरकार की सहमति से सीरम इंस्टीच्यूट ने ये कीमतें तय की हैं इसलिए केंद्र सरकार कुछ नहीं बोल रही है। ध्यान रहे सीरम इंस्टीच्यूट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ अदार पूनावाला ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा है कि उनकी कंपनी डेढ़ सौ रुपए में केंद्र सरकार को एक डोज दे रही है तो उस पर भी वह मुनाफा कमा रही है। लेकिन वह मुनाफा इतना ज्यादा नहीं है कि उससे कंपनी अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा सके। यह और भी अनैतिक व गैरकानूनी बात होगी कि कोई कंपनी अपना उत्पाद डेढ़ सौ रुपए में बेच कर भी मुनाफा कमा रही है तो उसे वह उत्पाद तीन गुनी या चार गुनी कीमत पर बेचने की इजाजत दी जाए! यह सही है कि कंपनी को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ानी है, जो कि देश के लिए भी जरूरी है लेकिन इसके लिए वह राज्यों या निजी अस्पतालों से वैक्सीन की अनाप-शनाप कीमत नहीं वसूल सकती है। कंपनी ने इसके लिए तीन हजार करोड़ रुपए की जरूरत बताई थी, उसे यह रकम राज्य सरकारों से वसूलने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। जिस तरह से केंद्र सरकार का पैसा देश के करदाताओं का पैसा है वैसे ही राज्यों का पैसा भी करदाताओं का ही है। किसी कंपनी को इस बात की इजाजत नहीं दी जा सकती कि वह राज्यों के करदाताओं का पैसा लूट ले।

सो, केंद्र सरकार को तत्काल इस मामले में दखल देकर वैक्सीन की कीमत तर्कसंगत बनवानी चाहिए। हालांकि उसकी भी जरूरत तभी है, जब केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले, राज्यों और नागरिकों को उनके हालात पर छोड़ दे और आम बजट में वैक्सीन के लिए आवंटित पैसा खर्च नहीं करना चाहे। अगर केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाती है तो वह बजट में वैक्सीन के लिए आवंटित 35 हजार करोड़ रुपए से ही पूरी आबादी को वैक्सीन लगवा सकती है। अगर वह ये पैसे बचाना चाहती है तो एक और आसान रास्ता यह है कि केंद्र सरकार ही डेढ़ सौ रुपए प्रति डोज के हिसाब से राज्यों के लिए भी वैक्सीन खरीद दे और बदले में राज्य सरकारें केंद्र को पैसा दे देंगी!

 

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साभार - ऐसे भी जाने सत्य

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