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बीमार व्यवस्था पर कोरोना की मार

Corona hit sick system

जिस तरह से कोरोना वायरस का असर उन लोगों पर बहुत घातक हुआ, जो पहले से किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित थे उसी तरह भारत के ऊपर भी इसका असर हुआ। देश की व्यवस्था पहले से कोमॉरबिडिटी यानी गंभीर रोगों से ग्रसित थे और ऊपर से कोरोना का संक्रमण हो गया। कोढ़ में खाज की तरह आए इस वायरस ने देश की अर्थव्यवस्था, शासन व्यवस्था, न्यायपालिका, संसदीय प्रणाली, मीडिया सबको ऐसा बीमार किया कि निकट भविष्य में इसके ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है। पहले से गिरती जा रही अर्थव्यवस्था कोरोना के कारण रसातल में पहुंच गई। लंबित मुकदमों के बोझ से दबी न्यायपालिका पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया। प्रचंड बहुमत वाली एकाधिकारवादी सरकार की मनमानियां झेल रही देश की संसदीय प्रणाली दम तोड़ती दिखाई दे रही है तो मीडिया या तो रेंगता हुआ है या अंतिम सांसें गिनते हुए है।

पिछले सात साल से देश की संसदीय प्रणाली कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रही थी। संसद की बैठकें कम हो गई थीं, संसदीय समितियों की भूमिका न्यूनतम कर दी गई थीं, अध्यादेशों के जरिए कानून लागू हो रहे थे और विधेयकों पर संसद के अंदर बहस लगभग खत्म कर दी गई थी। संसद की गरिमा और प्रासंगिकता दोनों खतरे में थे। कोरोना ने उस खतरे को न सिर्फ बढ़ा दिया, बल्कि एक नई संसदीय व्यवस्था को जन्म दिया, जिसे आने वाले दिनों सहज रूप से स्वीकार किया जाएगा। इस साल संसद के तीनों सत्र कोरोना या चुनाव के नाम पर समय से पहले स्थगित हुए। पिछले साल भी संसद सत्र समय से पहले स्थगित हुए थे। एक तो संसद सत्र की अवधि कम हो गई है। उसमें कोविड-19 प्रोटोकॉल के नाम पर सांसदों को सदन के साथ साथ गैलरी में और इधर उधर बैठाया जा रहा है। कोविड प्रोटोकॉल के नाम पर कई चीजों में कटौती कर दी गई है। सरकार ने आपदा को अवसर बना कर अनेक कानून अध्यादेश के जरिए लागू किए और संसद में बिना बहस के उन पर मुहर लगवाई। कोरोना काल में यह भी हुआ कि विपक्ष के सांसदों को संशोधन पेश करने से रोका गया और राज्यसभा में कम से कम तीन बार ऐसा हुआ कि विपक्ष की वोटिंग की मांग ठुकरा कर विधेयक पास कराए गए। दो बार तो सदन के अंदर मार्शल बुला कर, सांसदों से मार-पीट कर उन्हें सदन से निकाला गया और बिल पास कराया गया।

कोरोना के नाम पर मीडिया की नकेल अलग कसी गई। पहली बार ऐसा हुआ कि संसद की कवरेज की अनुमति के लिए मीडिया को प्रदर्शन करना पड़ा और इसके बावजूद सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी। कोविड प्रोटोकॉल के नाम पर पहले संसदीय पास की संख्या कम की गई। इसके बाद तय किया गया कि हर संस्थान से एक पत्रकार को मंजूरी मिलेगी और वह भी जिसके पास स्थायी पास होगा। अस्थायी पास वाले पत्रकारों का संसद में प्रवेश बंद कर दिया गया। स्थायी पास वाले पत्रकारों की भी लॉटरी निकलेगी और चार हफ्ते के सत्र में किसी एक हफ्ते उसे बुलाया जाएगा। लॉटरी नहीं निकली तो वैध पास होने के बावजूद संसद में प्रवेश वर्जित हो गया। जिनकी लॉटरी निकली और जो संसद की कवरेज के लिए गए उन्हें भी सेंट्रल हॉल में नहीं जाना था। यह पहली बार हो रहा है कि पीआईबी पास के नवीनीकरण का काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है और एक कमेटी सभी पासधारकों की समीक्षा कर रही है। इससे पहले पीआईबी पासधारक पत्रकारों की सरकारी विभागों में एंट्री काफी हद तक सीमित कर दी गई है। सोचें, अगर पत्रकार सरकारी विभागों और संसद में नहीं जाएंगे तो क्या दफ्तर में बैठ कर सिर्फ सरकारी रिलीज पर खबर बनाएंगे?

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देश की न्यायपालिका पर भी कोरोना की भारी मार पड़ी है। देश की अदालतों में पहले से करोड़ों की संख्या में मुकदमे लंबित थे। कोरोना काल में यह संख्या और बढ़ गई है क्योंकि मुकदमों की सुनवाई और निपटारे की रफ्तार काफी कम हो गई। कई महीनों तक तो देश की अदालतें बंद रहीं और बाद में जब ऑनलाइन सुनवाई शुरू हुई तो जमानत आदि के जरूरी मामले ही निपटाए जाते रहे। जजों और बुनियादी ढांचे की कमी ने इस संकट को और बढ़ा दिया। डिजिटल सुनवाई के लिए ज्यादातर निचली अदालतों में बुनियादी ढांचा ही नहीं था। सभी जजों और वकीलों के घरों पर डिजिटल सुनवाई की व्यवस्था बनाना भी बहुत आसान काम नहीं था। सो, न्याय प्रक्रिया लगभग ठप्प रही। संसद और अदालतों की तरह सरकारी कार्यालय भी या तो ठप्प रहे या जरूरी कामकाज के नाम पर राहत वगैरह बांटने के काम निपटाए गए।

देश की अर्थव्यवस्था पहले से बीमार हो गई थी। नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी का असर जनवरी 2018 की तिमाही से दिखना शुरू हुआ, जब जीडीपी की दर गिरने लगी। मार्च 2020 में कोरोना शुरू होने से पहले डीजीपी की दर गिर कर चार फीसदी पहुंच गई थी। सोचें, 2010 में जिस समय दुनिया भारत गाथा देख रही थी उस समय जीडीपी की दर 13 फीसदी पहुंच गई थी, जो 2018 के वित्त वर्ष में चार फीसदी हो गई। उसके बाद शुरू हुआ कोरोना का दौर, जिसमें पहली बार विकास दर माइनस 24 और माइनस साढ़े सात फीसदी हुई। अगर सब कुछ ठीक रहा तो 2022 के मार्च में खत्म होने वाले वित्तीय वर्ष में देश की अर्थव्यवस्था 2019 वाली स्थिति में पहुंचेगी। ढांचागत परियोजनाओं पर खर्च घटा कर सरकार राहत बांटने में लगी है। पूंजीगत निवेश जो पहले जीडीपी के 40 फीसदी के करीब था वह घट कर 30 फीसदी हो गया है। अगर पूंजीगत निवेश नहीं बढ़ेगा तो रोजगार के अवसर नहीं बढ़ेंगे। यही कारण है कि देश में बेरोजगारी की दर 45 साल में सबसे ऊंची है। थोक महंगाई की दर 14 फीसदी पहुंची है और महंगाई के डर से रिजर्व बैंक पिछले करीब डेढ़ साल से नीतिगत ब्याज दरों में बदलाव नहीं कर रहा है, जिसकी वजह से मांग नहीं बढ़ रही है। ऊपर से कोरोना ने आर्थिक असमानता ऐसी बढ़ा दी है कि देश का 73 फीसदी विकास एक फीसदी आबादी के हिस्से में जा रहा है।  

महामारी की वजह से स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार होना चाहिए था लेकिन अफसोस की बात है कि इतने बड़े संकट के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं हुआ है। नीति आयोग की ओर से इसी महीने जारी चारी चौथे हेल्थ इंडेक्स से पता चल रहा है कि कोरोना की सबसे ज्यादा मार झेलने वाले राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड आदि राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद खराब है। जिन राज्यों की स्थिति अच्छी बताई गई है वहां भी कोरोना काल में युद्धस्तर पर अभियान चला कर स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने का कोई काम नहीं हुआ है। राजधानी दिल्ली में डॉक्टर हड़ताल पर है क्योंकि पीजी कोर्स में दाखिले के लिए काउंसिलिंग नहीं हो रही है। सोचें, क्या कोरोना संकट के बीच किसी सभ्य समाज में इस तरह की स्थिति की कल्पना की जा सकती है!

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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