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कोरोना काल की किताबें

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एक और बुरा साल अंत के करीब!  इस साल की हैरान करने वाली बात कि जहां पिछली सदी के प्लेग, अकाल या दूसरी महामारियों और विश्व युद्ध ने सैकड़ों लेखकों को प्रेरित किया और मानवीय त्रासदियों को लेकर बेहतरीन पुस्तकें लिखी गईं वहीं कोरोना की वैश्विक महामारी के पिछले दो साल में इसके वैयक्तिक, सामाजिक या मानवीय पहलुओं को लेकर कुछ खास नहीं लिखा गया। पत्रकार विनोद कापड़ी ने ‘1232 KM’ नाम से प्रवासी मजदूरों के अलग अलग जगहों से अपने घर लौटने की त्रासद कहानी जरूर लिखी है लेकिन वह खबरों के संकलन की तरह। corona period books

एक शानदार अपवाद अंशुमान तिवारी और अनिंद्य सेनगुप्ता की किताब ‘उलटी गिनती’ हैं। यह किताब कोरोना वायरस की महामारी के आर्थिक असर का आकलन करने वाली है लेकिन यह एक सामाजिक और वैयक्तिक दस्तावेज भी है। गोविंद, रोहन, खंडूजा साहब, त्यागी जी और जमील मियां की निजी कहानियों के सहारे दोनों लेखकों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की सचाई पर से वह परदा हटाया है, जिसका बड़े जतन के साथ सचाई छिपाने के लिए इस्तेमाल किया गया है। इस में गोविंद ‘गिग इकोनॉमी’ यानी हाल के दिनों में ई-कॉमर्स और ऐप आधारित सेवाओं के शुरू होने के साथ जो अर्थव्यवस्था पनपी है उसका प्रतिनिधि है तो वही रोहन चमक-दमक वाली क्रेडिट आधारित अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। खंडूजा पुरानी से नई अर्थव्यवस्था के संक्रमण का प्रतिनिधि है तो त्यागी जी आपदा को अवसर बना कर कमाई करने वाली अर्थव्यवस्था के और जमील पूरी तरह से पुरानी अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधि हैं। इन सबकी निजी और कारोबारी कहानियों के जरिए ‘उलटी गिनती’ में 2012 के बाद से भारत की अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट और कोरोना के कारण आई महामंदी का सिलसिलेवार ब्योरा है। इस किताब की खास बात यह भी है कि इसमें नीतियों की कमियां बताई गई हैं तो मंदी से उबरने के उपायों पर भी विस्तार से चर्चा हुई है।

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हिंदी में कई कहानी संग्रह, उपन्यास और संस्मरण प्रकाशित हुए हैं, जिसमें इलाहाबाद को लेकर लिखा गया ममता कालिया का संस्मरण एक है। ‘जीते जी इलाहाबाद’ बहुत सहज और एक सांस में पढ़ी जाने वाली किताब है, जिसमें हर पन्ने पर इलाहाबाद किसी न किसी स्वरूप में मौजूद। ममता कालिया से कई साल पहले रविंद्र कालिया ने ‘गालिब छूटी शराब’ नाम से संस्मरण या आत्मकथा लिखी थी। उसमें इलाहाबाद का जो कुछ छूट गया था वह ‘जीते जी इलाहाबाद’ में है। इसे इलाहाबाद का महिमामंडन भी कह सकते हैं लेकिन यह एक जरूरी किताब इसलिए है क्योंकि संक्षेप में ही सही, इसमें पिछली सदी के आखिरी दो-तीन दशकों में हिंदी और उर्दू अदब में विकसित होने वाली अहम प्रवृत्तियों और उनसे जुड़े लेखकों के बारे में बताया गया है। ममता और रविंद्र कालिया के निजी जीवन की बातों से ज्यादा इसमें साहित्य, लेखक और इलाहाबाद की चर्चा है।

हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी में ज्यादा लेखन हो रहा है। साहित्य के साथ साथ दूसरे अनुशासनों खास कर राजनीति और समाज के बारे में बहुत कुछ लिखा जा रहा है। कुछ तो ऐसे ‘प्रोलिफिक राइटर’ हैं, जो साल में दो-दो किताबें लिख देते हैं। यह अलग बात है कि उनमें पढ़ने लायक कुछ नहीं होता है। ऐसे लेखकों में कुछ नेता हैं, कुछ पत्रकार हैं और कुछ पेशेवर लेखक हैं। उन्हें यह समझ में नहीं आता है कि वे अपनी किताब में कुछ भी ऐसा नहीं कह रहे हैं, जो पहले नहीं कहा जा चुका है। इंदिरा गांधी या अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी में कोई लेखक ऐसा क्या कह सकता है, जो पहले नहीं कहा गया है? लेकिन नए प्रकाशनों को बिकने वाले ऐसे नाम चाहिए, जो सोशल मीडिया में लोकप्रिय हों। उनके साथ अनुबंध के तहत इस तरह की किताबें थोक के भाव आ रही हैं। महामारी का यह साल भी इसका अपवाद नहीं है। ऐसी कई किताबें आई हैं, जो शुद्ध रूप से पिछले कुछ दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम पर आधारित हैं और कोई नया दृष्टिकोण नहीं देती हैं। इनमें अपवाद के तौर पर दो किताबों- क्रिस्टोफर जेफ्रोले की ‘मोदीज इंडियाः हिंदू नेशनलिज्म एंड द राइज ऑफ एथनिक डेमोक्रेसी’ और आकार पटेल की ‘ऑवर हिंदू राष्ट्र’ का जिक्र किया जा सकता है।

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अंग्रेजी में लिखी जिन किताबों ने इस साल सबसे ज्यादा आकर्षित किया और चौंकाया उसमें सबसे पहले मेहर अफशां फारूकी की गालिब पर लिखी किताब है। उनकी किताब का नाम ‘गालिबः अ वाइल्डरनेस एट माई डोरस्टेपः अ क्रिटिकल बायोग्राफी’ है। गालिब ने लिखा है- उग रहा है दरो दिवार पर सब्जा गालिब, हम बयाबां में हैं और घर में बहार आई है। पहली नजर में ऐसा लगा कि इस शेर को किताब का नाम बना लिया गया है और इसलिए इसमें कुछ खास नहीं होगा। लेकिन यह बहुत खास किताब है क्योंकि इसमें गालिब से ज्यादा शेर कहने के उनके तरीकों और उसे प्रभावित करने वाले हालात के बारे में लिखा गया है। गालिब के जन्म की तारीख व साल के विवाद से लेकर उनको पढ़ने-समझने में एक जटिल शायर बन जाने की कहानी बहुत तरतीब से कही गई है। इस लिहाज से यह एक जरूरी किताब है, खास कर उर्दू अदब और गालिब में रूचि रखने वालों के लिए।

अपने विस्तार और दायरे से हैरान करने वाली दूसरी किताब पेगी मोहन की है। दशकों से भाषा और बोलियों को लेकर काम करने वाली पेगी मोहन ने भाषाओं की यात्रा के जरिए देश के इतिहास और संस्कृति के बारे में बताया है। यह संयोग है कि भाषा के विद्वान ही इन दिनों सामयिक विषयों पर लिखते बोलते हैं और दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं। नोम चोमस्की और फ्रांसिस फुकोयामा भी भाषा के विद्वान हैं। पेगी मोहन ने उनकी तरह कोई सामयिक टिप्पणी नहीं की है लेकिन भारत की संस्कृति और इतिहास को राजनीतिक विमर्श में शामिल करने वालों को भी उनकी किताब ‘वांडर्स, किंग्स, मर्चेंटः द स्टोरी ऑफ इंडिया थ्रू इट्स लैंग्वेजेज’ एक दृष्टि देगी। यह किताब अनिवार्य रूप से आर्यों के बाहर से आने के सिद्धांत को स्थापित करती है और इस तरह भाषा के आधार पर ही आर्यों के भारतीय होने का सिद्धांत स्थापित करने की डॉ. रामविलास शर्मा की अवधारणा को काटती है। भाषा के रूप में संस्कृत के बनने, इंडो-यूरोपीय भाषा के उभरने, तुर्की से लेकर उर्दू के विकास और अंग्रेजी व कई स्थानीय भाषाओं का इतिहास बड़े रोचक तरीके से इसमें बताया गया है।

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इनके अलावा कुछ और किताबें हैं, जो जिक्र के लायक हैं और थोक के भाव छपी किताबों में कुछ अलग होने की वजह से ध्यान खींचती हैं। जैसे समाजशास्त्री बद्री नारायण की किताब ‘द रिपब्लिक ऑफ हिंदुत्व’ है। यह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और उसके कामकाज को देखने की एक अलग दृष्टि देती है। खुद लेखक ने लिखा है कि अभी लोग जिस संघ को जानते हैं वह 30 साल पुराना संघ है। अगर संघ से मुकाबला करना है तो अभी के संघ को जानना होगा। इस क्रम में उन्होंने बिल्कुल जमीनी स्तर पर चल रही संघ की कुछ गतिविधियों के बारे में भी बताया है। वीर सांघवी की किताब ‘रूड लाइफ’ हाल में आई आत्मकथाओं में सबसे साहसी और पढ़ने में रुचिकर है। जैसा कि इसके नाम से ही जाहिर है इसमें बातें बहुत बेबाक और साहसी अंदाज में कह दी गई हैं। जैसे संजय गांधी की मृत्यु हुई और लेखक ने आज की मुंबई और तब के बंबई में कांग्रेस नेताओं से उनके बारे में राय पूछी तो मुरली देवड़ा की प्रतिक्रिया थी, ‘मर गया साला’। यह बात इसी अंदाज में लिख दी गई है। फ्रैंक मोरिस की एक किताब पर शिव सेना के हंगामा करने का असली कारण क्या था वह वीर ने बताया है। उन्होंने लिखा कि बंबई के इतिहास, संस्कृति को कथित रूप से गलत तरीके से पेश किए जाने से ज्यादा बाल ठाकरे को यह बात बुरी लगी थी कि फ्रैंक मोरिस ने उनको छोटे कद का व्यक्ति लिख दिया था और यहीं विवाद का सबसे बड़ा कारण था। एक और किताब कूमी कपूर की है। ‘द टाटाज, फ्रेडी मर्करी एंड अदर बावाजः एन इंटीमेंट हिस्ट्री ऑफ द पारसीज’ नाम से लिखी इस किताब में उन्होंने पारसी लोगों का संक्षिप्त इतिहास लिखा है और अलग अलग क्षेत्र के जाने-माने पारसियों के जीवन के सहारे भारत के बनने में पारसियों को योगदान को रेखांकित किया है।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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