मृत्यु भी सत्य से परे oxygen crisis
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मृत्यु भी सत्य से परे!

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oxygen crisis : कहते हैं कि मृत्यु सत्य है या एकमात्र सत्य है! लेकिन भारत में लोगों का मरना सत्य से परे है, मौत के आंकड़े भी सत्य से परे हैं तो मौत का कारण भी सत्य से परे हैं क्योंकि सत्य सरकारों के माथे पर दाग लगाता है। तभी भारत सरकार ने देश की संसद में कहा कि ऑक्सीजन की कमी से देश में किसी के मरने की खबर नहीं मिली है। फिर इस संपूर्ण झूठ को अर्धसत्य में बदलने के लिए कहा गया कि राज्यों ने ऑक्सीजन की कमी से किसी मौत की सूचना नहीं दी है। चूंकि राज्यों ने कोई सूचना नहीं दी है इसलिए कोई मौत ही नहीं हुई है। कह सकते हैं कि लोग मरे नहीं है, बल्कि मुक्त हुए हैं, जैसा कि संघ प्रमुख ने कहा था। इसलिए मुक्त हुई महान आत्माओं का आंकड़ा भला तुच्छ मनुष्यों के साथ साझा करने की क्या आवश्यकता है!

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सरकार ने भले ऑक्सीजन की कमी से मरने वालों का आंकड़ा साझा नहीं किया क्योंकि उसके लिए वह सिर्फ एक नंबर है, जिसे लोगों को बताया जाए तो वह सरकार की विफलता के स्मारक की तरह दिखेगा। लेकिन इससे हकीकत नहीं बदल जाएगी। हकीकत यह है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक राज्यों में सैकड़ों लोग ऑक्सीजन की कमी से एक-एक सांस के लिए तड़प कर मरे। 23 अप्रैल की रात को दिल्ली के जयपुर गोल्डेन अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से 25 लोगों की मौत हो गई। अस्पताल प्रशासन ने हलफ उठा कर यह जानकारी दिल्ली हाई कोर्ट में दी हुई है। 22 से 23 अप्रैल के बीच 24 घंटे में दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित गंगाराम अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से 25 मरीजों की मौत हो गई। अस्पताल के चेयरमैन डॉ. डीएस राणा ने खुद इस बात की जानकारी दी।

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एक मई को दिल्ली के बत्रा अस्पताल में 12 मरीजों की ऑक्सीजन की कमी से मौत हो गई। 13-14 अप्रैल को महाराष्ट्र के वसई-विरार इलाके के दो अस्पतालों- विनायक और रिद्धि विनायक अस्पताल में 10 मरीजों की ऑक्सीजन की कमी से मौत हो गई। आगरा के पारस अस्पताल में 26 अप्रैल को ऑक्सीजन की कमी के बीच मॉक ड्रिल से 22 लोगों के मरने की खबर है, जिसका एक वीडियो भी वायरल हुआ था। हालांकि बाद में प्रशासन ने अपनी जांच में अस्पताल को क्लीन चिट दे दिया। ये कुछ प्रतिनिधि घटनाएं हैं, जिनकी देश भर में चर्चा हुई। इसके अलावा देश के अनेक राज्यों में सैकड़ों अस्पतालों में हजारों लोगों की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई। हजारों उन लोगों की बात छोड़ दें जो घरों में या गांव, कस्बों और छोटे शहरों में ‘सांस की तकलीफ’ से मर गए। उन्हें तब भी खबर बनाने के लायक नहीं समझा गया था।

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भारत सरकार ने कितनी मासूमियत से कह दिया कि ऑक्सीजन की कमी से मरने की कोई जानकारी राज्यों ने नहीं दी है। सवाल है कि इस मामले में केंद्र की क्या जिम्मेदारी बनती है? क्या केंद्र ने संक्रमण से ज्यादा प्रभावित राज्यों में अपनी टीमें नहीं भेजी थीं? उन टीमों ने भी क्या यही रिपोर्ट दी है कि ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा है? जो सूचनाएं हलफनामा देकर देश की अलग अलग उच्च अदालतों की दी गई हैं उनका क्या? सरकार ने क्यों नहीं अदालतों को बताया गया आंकड़ा संसद में पेश किया? कम से कम उससे एक तस्वीर तो उभरती! और नहीं तो कम से कम 16 मई 2021 का ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार ही देख लेते, जिसने ऑक्सीजन की कमी से जान गंवाने वालों की तस्वीरों के साथ पूरी प्रोफाइल छापी है!

Big statement of state governments

प्रधानमंत्री ने अनेक बार राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की और ऑक्सीजन की उपलब्धता की समीक्षा की, क्या उनको किसी राज्य ने नहीं बताया कि उसके यहां ऑक्सीजन की किल्लत है और लोग मर रहे हैं? यह अच्छा है कि वैक्सीनेशन से लेकर इलाज तक का श्रेय लेने को केंद्र सरकार तैयार है और जब मरने वालों की बारी आई तो कह दिया कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है! स्वास्थ्य राज्यों का विषय है श्रीमान स्वास्थ्य मंत्री लेकिन महामारी राज्यों का विषय नहीं है! महामारी देश का विषय है और तभी केंद्रीय गृह मंत्रालय से रोज राज्यों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जा रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय सिर्फ दिशा-निर्देश जारी करने के लिए नहीं है, उसकी जिम्मेदारी भी बनती है। केंद्र सरकार यह कह कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती है कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है और राज्यों ने ऑक्सीजन की कमी से मरने की कोई जानकारी नहीं दी है!

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यह दुर्भाग्य है कि देश में शासन और व्यवस्था की क्रूरता, नाकामी से लाखों लोगों की मौत हो गई है और अब उन मौतों को भी स्वीकार नहीं किया जा रहा है। क्या इसलिए कि अगर मौतों की स्वीकार किया तो मुआवजा देना होगा? इस देश की सरकारों ने हलफनामा देकर अदालत  से कहा हुआ है कि वे महामारी में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को मुआवजा नहीं दे सकते। यह शर्म की बात है कि लोक कल्याणकारी राज्य ने महामारी में मरे लोगों को मुआवजा देने से इनकार किया और अदालत ने फैसला देकर उसे मुआवजा देने के लिए मजबूर किया। सरकार इस मामले में कितनी असंवेदनशील है कि उसने अदालत के कहने के बावजूद मुआवजे का नियम और मुआवजे की राशि नहीं तय की है। इसके लिए उसने अदालत से एक महीने का अतिरिक्त समय मांगा है। तभी यह सवाल है कि जो सरकार लोगों की मौत स्वीकार नहीं कर रही है और मुआवजा देने से इनकार कर चुकी है वह अदालत के डंडा चलाने के बावजूद इस मामले में कितनी ईमानदारी बरतेगी!

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यह भी दुर्भाग्य है कि महामारी से प्रभावित दुनिया भर के देशों में भारत संभवतः एकमात्र ऐसा देश है, जहां कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े को विश्व स्तर पर झूठा बताया गया। दुनिया भर के मीडिया समूहों और स्वतंत्र संगठनों ने आकलन करके बताया कि भारत में दिए जा रहे मौत के आंकड़े झूठे हैं और इससे कई गुना ज्यादा लोगों की मौत हुई है। सरकार यह कह कर नहीं बच सकती है कि दुनिया भर का मीडिया भारत को बदनाम करने के लिए ऐसी खबरें कर रहा है। अब तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविंद सुब्रह्मण्यम ने एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कहा गया है कि भारत में दिए जा रहे आंकड़ों से कई गुना ज्यादा लोगों की मौत हुई है। अमेरिका में वाशिंगटन स्थित थिंक टैक ‘ग्लोबल डेवलपमेंट’ ने यह रिपोर्ट तैयार की है। इसमें कहा गया है कि मार्च 2020 से जून 2021 के बीच भारत में 30 से 47 लाख लोगों की मौत कोरोना संक्रमण से हुई है, जबकि 21 जुलाई तक भारत का आधिकारिक आंकड़ा चार लाख 18 हजार 511 लोगों के मरने का है। इसका मतलब है कि सात से 11 गुना तक ज्यादा मौतें हुई हैं। लेकिन भारत की लोक कल्याणकारी सरकारों ने इन मौतों के स्वीकार नहीं किया। जिस राज्य में लाशें गंगा नदी में बहती मिली थीं उस राज्य के कोरोना प्रबंधन को स्वंय प्रधानमंत्री ने अभूतपूर्व बताया। सो, यह उम्मीद करना बेमानी है कि सरकार कोरोना से मरने वालों को मृत्यु के बाद न्यूनतम सम्मान देते हुए उनकी मौतों को स्वीकार करेगी और जब मौतों की स्वीकार नहीं किया जाएगा तो यह उम्मीद भी बेमानी है कि सरकार व्यवस्था में सुधार करेगी।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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