कोरोना की टेस्टिंग का गोलमाल!

भारत में कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू होने के बाद अनेक बार टेस्टिंग प्रोटोकॉल बदले गए हैं। भारत सरकार से इसे लेकर कई दिशा-निर्देश जारी हुएहै। इसके अलावा राज्यों के अपने दिशा-निर्देश अलग हैं। राज्य अपने यहां संक्रमण की स्थिति और अपनी टेस्ट क्षमता के मुताबिक टेस्ट के बारे में फैसले कर रहे हैं। यहां तक कि यह फैसला कई बार संस्थाओं से ज्यादा व्यक्तियों की समझदारी पर निर्भर कर रहा है। जैसे मुंबई में बृहन्नमुंबई महानगरपालिका, बीएमसी के पूर्व कमिश्नर प्रवीण परदेशी ने आदेश दिया था कि अगर किसी को शक है कि उसे कोरोना वायरस का संक्रमण है तो उसे बीएमसी के क्वरैंटाइन सेंटर में आकर जांच का सैंपल देना होगा और जब तक रिपोर्ट नहीं आ जाती है तब तक वहीं रहना होगा। वह बहुत समझदारी का फैसला था क्योंकि सैंपल देने वाला अगर संक्रमित निकला तो उसे क्वरैंटाइन करके नहीं रखना बहुत भारी पड़ सकता है। पर प्रवीण परदेसी के हटते ही उनका यह आदेश बदल दिया गया। अब सैंपल देने वाले को क्वरैंटाइन में रहने की जरूरत नहीं है।

यह सिर्फ एक मिसाल है, जिससे पता चल रहा है कि भारत में कोरोना जैसी महामारी की टेस्टिंग का कैसा ढीला-ढाला और लचर सा प्रोटोकॉल है। ऐसा लग रहा है कि दुनिया के देशों ने जिस टेस्टिंग को कोरोना से लड़ने का सबसे कारगर हथियार माना और इस्तेमाल किया, भारत जान बूझकर उस हथियार के इस्तेमाल से बच रहा है। तभी भारत में इस वायरस का संक्रमण रोकने के लिए काम कर रही नोडल एजेंसी, इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर ने बार बार कहा कि उसके पास ज्यादा टेस्टिंग की क्षमता है पर वह ज्यादा टेस्ट नहीं करेगी। सवाल है कि जब क्षमता है तो ज्यादा टेस्ट क्यों नहीं किया जाएगा? इसके दो ही कारण हो सकते हैं या तो क्षमता के बारे में झूठ बोला जा रहा है या इसलिए टेस्ट नहीं किया जा रहा है क्योंकि ज्यादा टेस्ट होने से ज्यादा मामले आएंगे और सरकार नहीं चाहती कि ज्यादा मामले आएं। ज्यादा मामले सामने आए तो सरकार की मेडिकल तैयारियों की पोल खुलेगी।

यहीं कारण है कि 130 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले भारत में 11 मई की सुबह तक कुल 16 लाख 73 हजार टेस्ट हुए थे। इनमें से 68 हजार से से ज्यादा लोग संक्रमित मिले थे। अब यह 16 लाख 73 हजार का आंकड़ा भी बहुत सीधा नहीं है। इससे यह पता नहीं चलता है कि इतने टेस्ट कितने लोगों पर किए गए हैं। ध्यान रहे कोरोना वायरस की टेस्टिंग के नतीजे बहुत सटीक नहीं होते हैं और एक व्यक्ति में संक्रमण की पुष्टि के लिए कई टेस्ट करने होते हैं और संक्रमण की पुष्टि होने के बाद भी कम से कम दो बार और टेस्ट किए जाते हैं। पिछले हफ्ते तक यह भी नियम था कि मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज करते वक्त भी उसकी टेस्टिंग होती थी। इसलिए टेस्टिंग की जानकारी देते हुए सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसने कितने लोगों के टेस्ट किए हैं। यह बताना चाहिए कि 16 लाख 73 हजार टेस्ट की जो संख्या है वह टेस्ट की संख्या है या टेस्ट किए गए लोगों की संख्या है?

राज्यों के स्तर पर टेस्टिंग में ज्यादा गोलमाल है। जो राज्य सरकारें ईमानदारी से टेस्टिंग करा रही हैं उनके यहां ज्यादा मामले आ रहे हैं और वे अपने सीमित साधनों में ज्यादा से ज्यादा मरीजों का इलाज कर रहे हैं। पर कई राज्य ऐसे हैं, जिन्होंने जांच से पूरी तरह से तौबा की है। जैसे 10 करोड़ की आबादी वाले बिहार में अब तक सिर्फ 34 हजार टेस्टिंग हुई है। सरकार बड़े शान से बता रही है कि हमारे पास 18 सौ टेस्टिंग रोज करने की क्षमता है और हम 14-15 सौ टेस्टिंग रोज कर रहे हैं। उधर करीब पौने सात करोड़ की आबादी वाले राजस्थान में एक लाख 66 हजार टेस्टिंग हो चुकी है लेकिन नौ करोड़ की आबादी वाले पश्चिम बंगाल में 43 हजार और 10 करोड़ की आबादी वाले बिहार में 34 हजार टेस्टिंग हुई है!

इसमें भी चाहे बिहार हो या पश्चिम बंगाल या मध्य प्रदेश और झारखंड इन राज्यों की टेस्टिंग क्वालिटी और सैंपल जुटाने से लेकर उन्हें टेस्ट के लिए भेजने और रिपोर्ट आने तक की समूची प्रक्रिया में बड़ा झोल है। मध्य प्रदेश से मीडिया में ऐसी खबरें आई हैं कि कई जगह सैंपल रखे रह गए या जांच की रिपोर्ट आठ-आठ दिन तक नहीं आई यहां तक कि कुछ जगह सैंपल ही गायब हो गए। इसी तरह बिहार में सैंपल में बहुत गड़बड़ी हुई है। एक ही व्यक्ति को सरकार का एक अस्पताल पॉजिटिव बताता है तो दूसरा निगेटिव बता देता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि टेस्टिंग का एक मानक प्रोटोकॉल नहीं बना, उस प्रोटोकॉल के हिसाब से क्वालिटी वाले लैब्स नहीं बने और बेहतर ढंग से प्रशिक्षित लोग उन लैब्स में नहीं हैं। इसलिए जो आंकड़े अभी दिख रहे हैं, उन्हें वास्तविक मानना बहुत मुश्किल है। अफसोस की बात यह है कि दुनिया में इस वायरस का संक्रमण शुरू हो जाने के बाद भारत के पास बहुत समय था कि वह इन सब चीजों को ठीक कर सके, पर ऐसा नहीं किया गया।

इस बीच आईसीएमआर ने टेस्टिंग के प्रोटोकॉल में पिछले हफ्ते एक और बदलाव किया। इसने तय किया है कि अब कोरोना वायरस के साधारण लक्षण वाले जो लोग क्वरैंटाइन सेंटर में या अस्पताल में रहेंगे, उन्हें बिना जांच किए ही डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। पहले किसी भी मरीज को तभी छुट्टी दी जाती थी जब 14 दिन पर उसकी जांच रिपोर्ट निगेटिव आती थी और उसके बाद फिर 24 घंटे में दूसरी जांच में भी रिपोर्ट निगेटिव आती थी। पर अब ऐसे मरीजों को, जिनका बुखार तीन में ठीक हो जाता है और उसके बाद चार दिन तक बिना ऑक्सीजन के उसकी स्थिति ठीक रहती है तो उसे दस दिन में डिस्चार्ज कर दिया जाएगा और डिस्चार्ज करते वक्त टेस्ट भी नहीं किया जाएगा। इससे खतरा बढ़ सकता है क्योंकि हो सकता है कि बिना निगेटिव रिपोर्ट की पुष्टि के जिस मरीज को डिस्चार्ज किया जा रहा है वह कोरोना कैरियर हो और बाहर जाकर ज्यादा लोगों को संक्रमित करे।

कोरोना संक्रमितों को अस्पताल से जल्दी डिस्चार्ज करने और अस्पताल से छुट्टी देते समय टेस्ट नहीं करने के फैसले से दो बातें जाहिर होती हैं- एक तो सरकार टेस्ट किट बचाना चाह रही है और दूसरे अस्पतालों में ज्यादा से ज्यादा बेड्स खाली रखना चाह रही हैं। इससे सहज रूप से यह निष्कर्ष निकल रहा है कि सरकार को अंदेशा है कि आने वाले दिनों में मरीजों की संख्या बढ़ने वाली है। इसी वजह से साधारण लक्षण वालों को घरों में ही क्वरैंटाइन करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

One thought on “कोरोना की टेस्टिंग का गोलमाल!

  1. जब सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा की लोगों ने उसका पालन भी किया और अब सरकार की तरफ से बोलो गया है की हम सबको कोरोना के साथ जीना सीखना होगा तर्क समझ से परे है जब की सरकार के पास बहुत टाइम था मेडिकल सुविधा को दुरुस्त करने के लिए फिर वो क्यों नहीं किया ,अभी ना कोई दवा बन पाई और ना कोई पुख्ता इंतज़ाम जिसे की जनता को मह्फूस किया जाई अगर यही परिणाम होना था तो लॉकडाउन किया ही क्यों। हम सबको कोरोना के साथ जीना सीखना था तो….

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