टीकाकरण इतना केंद्रीकृत क्यों?

भारत में कोरोना वायरस की महामारी की नई लहर और टीकाकरण की तैयारी की चौतरफा चर्चा है। टीकाकरण की तैयारी सारी दुनिया में हो रही है इसलिए भारत में भी है, अन्यथा भारत में अभी वैक्सीन खरीद का कोई सौदा नहीं हुआ है। पर चूंकि दुनिया के दूसरे देशों में टीकाकरण की तैयारी हो गई है, इसलिए भारत में भी तैयारी की जा रही है। फिलहाल कम से कम वैक्सीन बनाने वाली चार कंपनियों ने तीसरे और अंतिम चरण की अंतरिम रिपोर्ट जारी कर दी है। अमेरिकी कंपनी बायोएनटेक फाइजर ने सबसे पहले अपनी वैक्सीन के तीसरे चरण की रिपोर्ट जारी की और कहा कि उसकी वैक्सीन 95 फीसदी प्रभावी है और पूरी तरह से सुरक्षित भी है। इसके बाद दूसरी अमेरिकी कंपनी मॉडर्ना ने भी ऐलान किया कि उसकी वैक्सीन 95 फीसदी कारगर और सुरक्षित है। इसके तुरंत बाद रूसी कंपनी ने अपनी वैक्सीन स्पूतनिक वी के 92 फीसदी सफल और सुरक्षित होने का ऐलान किया। सबसे आखिरी में ब्रिटिश स्वीडिश कंपनी ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका ने अपनी रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कहा गया है कि एक डोज 72 फीसदी और डेढ़ डोज 90 फीसदी से ऊपर कारगर है और सुरक्षित भी है।

ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन कोवीशील्ड का भारत में भी तीसरे चरण का ट्रायल चल रहा है। वैक्सीन बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी सीरम इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया की देख रेख में यह परीक्षण हो रहा है। ब्रिटेन में इस वैक्सीन के इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए दिसंबर के मध्य में कंपनी आवेदन करेगी और उसे मंजूरी मिल जाने का पूरा भरोसा है। ब्रिटेन में इस वैक्सीन के इस्तेमाल की मंजूरी मिलने के तुरंत बाद भारत में भी इसे मंजूरी मिल जाएगी।

पर सवाल है कि सिर्फ मंजूरी मिल जाने भर से क्या भारत में टीकाकरण वैसे ही होने लगेगा, जैसे ब्रिटेन, अमेरिका या यूरोपीय संघ के देशों में होगा? भारत में फिलहाल यह संभव नहीं लग रहा है क्योंकि दुनिया के बाकी विकसित देशों ने वैक्सीन की करोड़ों डोज का सौदा पहले किया हुआ है। इसलिए उन्हें वैक्सीन की आपूर्ति पहले होगी। भारत में आम लोगों तक इसकी पहुंच तभी हो पाएगी, जब भारत बायोटेक की अपनी वैक्सीन बन कर तैयार होगी। इस वैक्सीन के भी परीक्षण का तीसरा चरण चल रहा है। लेकिन इसके अगले साल मार्च तक तैयार होने की संभावना है।

सो, फिलहाल तो यह समझ लेना चाहिए कि भारत में वैक्सीन की बड़ी संख्या में डोज फिलहाल नहीं आने जा रही है। दिसंबर के मध्य में जिन वैक्सीन को अमेरिका और ब्रिटेन में इमरजेंसी इस्तेमाल की इजाजत मिलेगी वह बहुत सीमित संख्या में भारत में आ सकती है। इसलिए भारत में टीकाकरण को लेकर अभी चल रहे हल्ले का कोई खास मतलब नहीं है। पहले ही यह कहा जा चुका है कि सीमित मात्रा में जो वैक्सीन आएगी वह पहले फ्रंटलाइन वर्कर्स यानी डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी और पुलिसकर्मियों को लगेगी। अगर भारत सरकार वैक्सीन की ज्यादा से ज्यादा डोज खरीदने का सौदा करती है तो अगले साल के मध्य से आम लोगों को वैक्सीन मिलनी शुरू हो सकती है। लेकिन यहां भी सवाल है कि वह किससे सौदा करेगी? फाइजर को इस साल पांच करोड़ और अगले साल 130 करोड़ डोज तैयार करनी है। मॉडर्ना का भी अगले साल के अंत तक सौ करोड़ डोज तैयार करना है। लेकिन मुश्किल यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक विकसित और पैसे वाले देशों ने आठ सौ करोड़ डोज से ज्यादा का सौदा किया हुआ है। तभी सवाल है कि भारत या इस जैसे विकासशील देशों में वैक्सीन की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी, जब दुनिया के दूसरे देशों ने पहले से पैसे चुका कर डोज बुक कराए हुए हैं।

भारत में एक दूसरी समस्या टीकाकरण को केंद्रीकृत करने का है। भारत में वैक्सीनेशन को इतना ज्यादा केंद्रीकृत किया जा रहा है उसका कारण समझना मुश्किल हो रहा है। भारत में जिस तरह से आधार कार्ड के जरिए टेस्टिंग हो रही है और इलाज में आधार का इस्तेमाल हो रहा है उसी तरह टीकाकरण के लिए सरल तरीके से आधार कार्ड का इस्तेमाल किया जा सकता था। लेकिन सरकार ने इसके लिए बहुत जटिल प्रक्रिया तय की है। बताया जा रहा है कि हर व्यक्ति को आधार के जरिए ही टीका लगेगा लेकिन इसके लिए एक क्यूआर कोड जेनेरेट किया जाएगा और टीका लगने के बाद भी वह क्यूआर कोड संभाल कर रखना होगा। उसे डिजिलॉकर में रखने की बात हो रही है क्योंकि वह इम्युनिटी पासपोर्ट की तरह इस्तेमाल होगा। यह भी कहा जा रहा है कि भविष्य में कहीं भी ट्रैवल करने के लिए इसको अनिवार्य किया जा सकता है।

दूसरे, भारत सरकार ने यह तय किया है कि टीका सिर्फ केंद्र सरकार ही खरीदेगी। यह भी कोरोना वैक्सीन के केंद्रीकरण का एक संकेत है। सवाल है कि जब स्वास्थ्य राज्यों का विषय है और सारे राज्य कोरोना वायरस के अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं तो उन्हें वैक्सीन खरीदने और लोगों को लगवाने की खुली छूट क्यों नहीं होनी चाहिए? क्यों केंद्र सरकार इसकी कमान अपने हाथ में रखना चाहती है? अगर देश के हर नागरिक के लिए वैक्सीन केंद्र सरकार को खरीदनी है तो क्या उसने इसके लिए हजारों करोड़ रुपए का प्रावधान अलग से किया हुआ है?

जैसा कि सीरम इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा था कि सरकार को वैक्सीन के लिए इस साल 80 हजार करोड़ रुपए की जरूरत होगी। क्या सरकार ने इतने पैसे अतिरिक्त आवंटित किए हैं? बहरहाल, सरकार को राज्यों की इसमें भागीदारी बढ़ानी चाहिए। उन्हें स्वतंत्र रूप से टीकाकरण कार्यक्रम चलाने देना चाहिए। अब तक इसे केंद्रीकृत करके रखने का ही नतीजा है कि भारत ने वैक्सीन का कोई बड़ा सौदा नहीं किया है। भारत की विशाल आबादी और डेढ़ या दो डोज की जरूरत को देखते हुए भारत को तीन सौ करोड़ डोज तक खरीदने की जरूरत है, लेकिन अभी तक किसी सौदे की सूचना नहीं है। सो, बिना टीका खरीद का सौदा किए बगैर भारत में टीकाकरण की एक रहस्यमयी और केंद्रीकृत व्यवस्था बनाई जा रही है।

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