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सीधे सीएम, पीएम चुनने के खतरे

अब पूछा जाता है कि तुम्हारी बारात को ठीक है, तुम्हारा दुल्हा कौन है! ऐसा लगता है कि जैसे लोकतंत्र को स्वंयवर बना दिया गया है। पहले अपवाद के तौर पर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का दावेदार पेश करके चुनाव लड़ा गया था लेकिन अब इसे ही मुख्यधारा बना दिया गया है। पंजाब में तो आम आदमी पार्टी इससे एक कदम और आगे बढ़ गई। उसने मुख्यमंत्री का दावेदार रायशुमारी करा कर तय किया है। choosing CM PM directly

भारत में लोकतंत्र की संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है, जिसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री समानों में प्रथम होते हैं और उनकी सरकार सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर काम करती है। इस व्यवस्था की कुछ कमियां हैं और यह प्रणाली भी सैद्धांतिक रूप से सौ फीसदी नहीं अपनाई गई है। परंतु अब इसकी जगह आधे अधूरे तरीके से अध्यक्षीय प्रणाली को लागू किया जा रहा है, जो लोकतंत्र और देश की शासन व्यवस्था दोनों के लिए खतरनाक है। क्योंकि ऐसी व्यवस्था में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री समानों में प्रथम नहीं होता है, बल्कि वह सर्वोच्च हो जाता है और इसके साथ ही सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत का लोप हो जाता है। जब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री सीधे जनता के वोट से चुने जाएंगे और उनको चुनने में सांसदों या विधायकों की भूमिका औपचारिकता भर रह जाएगी तो उसके बहुत खतरनाक नतीजे होंगे।

भारत में कम से कम राष्ट्रीय स्तर पर आजादी के बाद से ही हर चुनाव से पहले यह तय रहता है कि किस पार्टी की सरकार बनी तो कौन प्रधानमंत्री बनेगा। जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव  गांधी तक यह तय था। इसके बावजूद इसकी घोषणा नहीं की जाती थी। किसी को प्रधानमंत्री का  चेहरा बना कर चुनाव नहीं लड़ा जाता था। पहली बार यह काम भारतीय जनता पार्टी ने किया, जब लालकृष्ण आडवाणी ने नब्बे के दशक के शुरुआती दिनों में ऐलान किया कि भाजपा जीती तो अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री होंगे। पहली बार भाजपा ने ही मतदाताओं से सीधे प्रधानमंत्री चुनने की अपील की। जहां तक मुख्यमंत्रियों की बात है तो उस मामले में भी पहल भाजपा ने की है। पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने 2003 में मध्य प्रदेश में उमा भारती को और राजस्थान में वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करके चुनाव लड़ा। उसके बाद धीरे धीरे यह परंपरा बनती गई। अब स्थिति ऐसी है कि कोई पार्टी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चेहरा पेश नहीं करती है तो उससे पूछा जाता है कि तुम्हारी बारात को ठीक है, तुम्हारा दुल्हा कौन है! ऐसा लगता है कि जैसे लोकतंत्र को स्वंयवर बना दिया गया है। पहले अपवाद के तौर पर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का दावेदार पेश करके चुनाव लड़ा गया था लेकिन अब इसे ही मुख्यधारा बना दिया गया है। पंजाब में तो आम आदमी पार्टी इससे एक कदम और आगे बढ़ गई। उसने मुख्यमंत्री का दावेदार रायशुमारी करा कर तय किया है।

सोचें, अगर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री सीधे जनता के वोट से चुना जाता है तो वह संसद या विधानसभा के प्रति जवाबदेह कैसे होगा? क्या फिर वह पार्टी नेतृत्व से ऊपर नहीं हो जाएगा? उसकी सरकार में सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत क्या रह पाएगा? ऐसी स्थिति में कानूनों की गुणवत्ता क्या प्रभावित नहीं होगी? यह व्यवस्था न तो अध्यक्षीय प्रणाली की तरह होगी, जिसमें कार्यपालिका और विधायिका में बहुत साफ साफ अंतर होता है और न संसदीय प्रणाली रह जाएगी, जिसमें प्रधानमंत्री संसद के प्रति जिम्मेदार होता है। यह एकाधिकारवादी शासन व्यवस्था से मिलती-जुलती एक व्यवस्था बन जाएगी, जिसमें चुना गया शीर्ष नेता सीधे जनता से संवाद करेगा। वह अपने और मतदाता के बीच की सारी परतों को हटा देगा। दुर्भाग्य से भारत में यह  प्रक्रिया शुरू हो गई है।

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अध्यक्षीय शासन प्रणाली में कानून बनाने या कार्यपालिका के फैसलों की समीक्षा का अधिकार विधायिका को होता है और वह पूरी तरह से कार्यपालिका या चुने हुए राष्ट्रपति के दबाव से मुक्त होती है। वह राष्ट्रपति के फैसलों पर सवाल उठा सकती है और उसे खारिज भी कर सकती है। लेकिन भारत में जो व्यवस्था बनाई जा रही है उसमें इसकी गुंजाइश खत्म हो जाती है। इस व्यवस्था में जब सारे सांसद और विधायक किसी एक नेता के चेहरे पर चुनाव जीतेंगे तो फिर उनकी स्वतंत्र हैसियत क्या रह जाएगी? मिसाल के तौर पर पंजाब में आम आदमी पार्टी जीत जाती है तो भगवंत मान मुख्यमंत्री बनेंगे, क्योंकि जनता उनको मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट करेगी। ऐसे में वे विधानसभा या अपनी पार्टी के विधायक दल के प्रति नहीं, बल्कि सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होंगे। विधायक दल उनको नेता नहीं चुनेगा, बल्कि पूरा विधायक दल उनके अधीनस्थ होगा।

वे समानों में प्रथम नहीं होंगे, बल्कि सर्वोच्च होंगे। फिर समूचे विधायक दल को वह करना होगा, जो वे कहेंगे। विधायक दल के हिसाब से वे नहीं, बल्कि उनके हिसाब से विधायक दल काम करेगा। जैसे अभी केंद्र में होता है। सारे काम सिर्फ प्रधानंमत्री करते हैं क्योंकि वे सीधे जनता से चुने गए हैं। पूरी पार्टी और संसदीय दल उनके फैसले पर मुहर लगाने के लिए है क्योंकि पार्टी के सारे सांसद प्रधानमंत्री के नाम और चेहरे पर जीत कर आए हैं। इससे अनिवार्य रूप से सांसदों के चेहरे निराकार होते चले जाएंगे। उनकी अपनी योग्यता या काबिलियत का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। उसकी एकमात्र योग्यता यह होगी कि वह शीर्ष नेतृत्व के प्रति कितना समर्पित है।

अमेरिका की अध्यक्षीय प्रणाली में राष्ट्रपति के चेहरे पर प्रतिनिधि सभा या सीनेट के सदस्य नहीं चुने जाते हैं। राष्ट्रपति अलग चुना जाता है और कांग्रेस के दोनों सदनों के सदस्य अलग चुने जाते हैं। या तो भारत में ऐसी व्यवस्था अपना ली जाए कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के चुनाव अलग होंगे और संसद व विधानसभा सदस्यों के चुनाव अलग होंगे और अमेरिका की तरह यहां भी जो सांसद या विधायक होगा वह मंत्री नहीं बन सकेगा। या फिर जो व्यवस्था है उसे ही चलने दिया जाए। अभी इसमें ऐसा घालमेल किया जा रहा है, जिससे भारत में न तो संसदीय प्रणाली रह जाएगी और न अध्यक्षीय प्रणाली बन पाएगी। उलटे देश एकाधिकारवादी व्यवस्था की ओर बढ़ने लगेगा, जिसमें लोकप्रिय और करिश्माई नेता ही सब कुछ होगा। सारी संस्थाएं उसके हिसाब से काम करेंगी।

पार्टियों की भूमिका भी समाप्त हो जाएगी। नेता पार्टी से बड़ा हो जाएगा। अगर पार्टी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को हटाना चाहे तो वह ऐसा नहीं कर पाएगी क्योंकि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री सीधे जनता द्वारा चुना गया होगा। विधायिका, न्यायपालिका या मीडिया कोई उसके फैसले पर सवाल नहीं उठा सकेगा क्योंकि उसके पास यह तर्क होगा कि वह सीधे जनता द्वारा चुना गया है और जनता के प्रति ही जवाबदेह है। वह अपने हर अच्छे बुरे फैसले या कानूनों का यह कह कर बचाव करेगा उसने जनता के हित में इन्हें बनाया है या लागू किया है। जनता उसकी ढाल बन जाएगी और संविधान व लोकतंत्र की व्यवस्था उसके पैरों की जूती बन जाएगी। दुर्भाग्य से जिन लोगों के ऊपर इसे रोकने की जिम्मेदारी है वे भी बिना जाने-समझे इस काम में भागीदार बन गए हैं।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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