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चुनाव सुधार से 2024 का खेला!

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केंद्र सरकार और केंद्रीय चुनाव आयोग दोनों ने अपनी अपनी तरह से 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। आयोग सिफारिशें कर रहा है और सरकार धड़ाधड़ कानून बना रही है। ऐसा लग रहा है, जैसे सब कुछ चुनाव की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने, मतदान प्रक्रिया को बेहतर स्वरूप देने और हर मतदाता की वोटिंग सुनिश्चित करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। लेकिन इन उद्देश्यों के साथ साथ 2024 के चुनाव में ऐसे मतदाता समूहों को जोड़ने और उन्हें वोटिंग के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने का लक्ष्य भी है, जो भारतीय जनता पार्टी या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति रूझान रखते हैं। चुनाव आयोग की सिफारिशों पर सरकार ने इस सत्र में जो बिल पास कराया है या जो बिल आगे आने वाले हैं उनको ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इनका मकसद, जितना दिखाई दे रहा है उतना ही नहीं है। Election reform loksabha election

सबसे पहले उन सुझावों की चर्चा करते हैं, जिन पर आधारित बिल अभी आया नहीं है। इनमें से दो सुझाव सबसे अहम हैं। पहला रिमोट वोटिंग का और दूसरा प्रवासी भारतीयों यानी एनआरआई को ई-पोस्टल बैलेट के जरिए वोटिंग का अधिकार देने का है। चुनाव आयोग ने इस साल मार्च में कहा था कि दो-तीन महीने में रिमोट वोटिंग का पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो जाएगा और 2024 के लोकसभा चुनाव में इसे लागू किया जाएगा। चुनाव आयोग ने नो वोटर इज लेफ्ट बिहाइंडके सिद्धांत के तहत इस योजना को लागू करने का विचार बनाया है। इसके जरिए उन लोगों को वोटिंग की सुविधा दी जाएगी, जो उस जगह पर नहीं रहते हैं, जहां उनका नाम मतदाता सूची में है। इसके लिए राजधानी दिल्ली सहित बड़े शहरों और सैन्य ठिकानों के आसपास मतदान केंद्र बनाए जा सकते हैं। सोचें, अगर ऐसा होता है तो कितनी पार्टियां बड़े शहरों में बनने वाले मतदान केंद्रों पर अपने वोटिंग एजेंट बैठाने की व्यवस्था कर सकती हैं? क्या इसका फायदा सत्तारूढ़ दल या सबसे ज्यादा सक्षम पार्टी को नहीं होगा।

इसी तरह चुनाव आयोग ने प्रवासी भारतीयों के लिए ई-पोस्टल बैलेट से वोटिंग का सुझाव कानून मंत्रालय के पास भेजा है। आयोग का कहना है कि विदेश मंत्रालय की ओर से सभी संबंद्ध पक्षों के साथ विचार करके अपनी रिपोर्ट दी जाएगी। सोचें, विदेश मंत्रालय क्या रिपोर्ट देगा? जाहिर है कि अगर प्रवासियों को ई-पोस्टल बैलेट के जरिए मतदान का मौका मिलता है तो उसका फायदा भी भाजपा और नरेंद्र मोदी को होगा क्योंकि देश की वास्तविक और जमीनी स्थितियों से अनजान प्रवासी भारतीयों का सहज रूझान प्रधानमंत्री मोदी की ओर है। उनकी विदेश यात्राओं में जिस तरह का माहौल होता है उससे सहज ही अंदाजा लगता है कि अगर ज्यादा संख्या में प्रवासी मतदान करते हैं तो फायदा उनको होगा। एनआरआई के लिए ई-पोस्टल बैलेट से वोटिंग की शुरुआत भी 2024 के लोकसभा चुनाव में हो सकती है।

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केंद्रीय चुनाव आयोग की चार सिफारिशों पर बने बिल को संसद की स्थायी समिति में विचार के बाद संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया गया और आनन-फानन में पास भी करा लिया गया। जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन का जो बिल शीतकालीन सत्र में पास किया गया उसमें एक प्रस्ताव वोटर आईडी नंबर को आधार नंबर से जोड़ने का है। कहा जा रहा है कि इससे मतदाता सूची में नाम का दोहराव खत्म होगा और बोगस वोटिंग को रोका जा सकेगा। लेकिन सोचें, इससे लोगों की निजता कितनी प्रभावित होगी? मतदाताओं की प्रोफाइलिंग कितनी आसान हो जाएगी और उनके मतदान व्यवहार को प्रभावित करना या उन्हें रोकना कितना आसान हो जाएगा? ध्यान रहे आधार कार्ड मोबाइल नंबर से जुड़ा होता है उसे अगर वोटर आईडी से जोड़ते हैं तो अपने आप हर मतदाता का मोबाइल नंबर भी वोटर आईडी से जुड़ जाएगा। फिर मोबाइल के जरिए उस व्यक्ति के सोशल मीडिया अकाउंट्स तक पहुंचना भी सुलभ हो जाएगा। वहां सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के अलगोरिद्म के जरिए उनके सामाजिक, राजनीतिक व्यवहार को समझना, उस आधार पर उनकी प्रोफाइलिंग करना और उन्हें प्रभावित करने का प्रयास आसानी से किया जा सकेगा।

कैंब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक से लाखों उपयोक्ताओं का डाटा चुरा कर या हासिल करके कई देशों में इसी तरीके से चुनाव प्रभावित किया था। भारत में भी यह काम बहुत आसान हो जाएगा और कहने की जरूरत नहीं है कि इसका भी सबसे ज्यादा फायदा उसी पार्टी को होगा, जिसकी डाटा तक आसान पहुंच होगी और जिसके पास सारे संसाधन होंगे। हालांकि वोटर आईडी को आधार से जोड़ने का प्रस्ताव वैकल्पिक है इसके बावजूद इससे बहुत डाटा हासिल हो जाएगा।

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इस बिल में दूसरा प्रस्ताव 18 साल के युवाओं को मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के चार मौके देने का है। अभी तक एक जनवरी की कटऑफ होती थी। यानी हर साल एक जनवरी को जितने युवा 18 साल के होते थे उस साल सिर्फ उन्हीं का नाम जुड़ पाता था और बाकियों को पूरे साल इंतजार करना होता था। अब हर तीन महीने पर नाम जुड़वाए जा सकेंगे। पिछले सात साल में हुए कई चुनावों से यह जाहिर हुआ है कि जमीनी वास्तविकता से अनजान युवाओं या पहली बार के मतदाताओं के बड़े हिस्से का रूझान भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी की ओर रहा है। तभी इस तरह के युवाओं का ज्यादा संख्या में मतदाता सूची में दर्ज होना बहुत फायदेमंद होगा।

एक प्रस्ताव यह भी है सैन्यकर्मियों की प्रॉक्सी वोटिंग को जेंडर न्यूट्रल बनाया जाए। अभी तक के नियमों के मुताबिक किसी सैन्यकर्मी की पत्नी सैन्य मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड हो सकती थी और उसके लिए मतदान कर सकती थी। नए संशोधन के मुताबिक पत्नीकी जगह जीवन साथीकर दिया गया है, जिसका मतलब है कि किसी महिला सैन्यकर्मी या सुरक्षा बल से जुड़ी कर्मी के पति भी उसके लिए मतदान कर सकते हैं। कह सकते हैं कि अभी सेना या सुरक्षा बलों में महिलाओं की संख्या बहुत कम है इसलिए इस प्रस्ताव का व्यापक असर नहीं होगा। लेकिन इससे तैयारियों का अंदाजा लगता है। क्या विपक्षी पार्टियों को इसका अंदाजा है कि अगले चुनाव को लेकर किस बारीक तरीके से और कितने स्तर पर तैयारियां हो रही हैं? बहस के लिए कहा जा सकता है कि इन सभी प्रस्तावों से बहुत ज्यादा संख्या में वोट प्रभावित नहीं होंगे। लेकिन जितने भी होंगे उनका फायदा किसको होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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