कानूनी मकड़जाल में उलझता आंदोलन

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों और 46 दिन से चल रहे किसान आंदोलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर 11 जनवरी को सुनवाई होगी। उसके चार दिन के बाद केंद्र सरकार के साथ किसानों की फिर से वार्ता होनी है। केंद्र के साथ हो रही वार्ताओं से अब तक कुछ भी हासिल नहीं हुआ है और उलटे आठ जनवरी की वार्ता में केंद्र ने बहुत साफ इशारा कर दिया कि सर्वोच्च अदालत से इस मामले का समाधान कराया जाए। किसान सुप्रीम कोर्ट जाना नहीं चाह रहे हैं। उन्होंने कहा हुआ है कि विवाद उनके और सरकार के बीच है इसलिए वे अदालत नहीं जाएंगे, आंदोलन करते रहेंगे।

किसानों के लिए यह ‘कैच 22 सिचुएशन’ की तरह स्थिति है। अदालत में एक के बाद एक दायर हो रही याचिकाओं, सर्वोच्च अदालत की कोरोना के खतरों को लेकर की गई तबलीगी जमात वाली टिप्पणी और सरकार के रुख से उनकी उलझन बढ़ गई है। ऐसा लग रहा है कि सरकार ने किसानों को अंतहीन वार्ताओं में उलझा कर जो जाल बुना उसमें किसान फंस रहे हैं। उनके पास उनकी ईमानदारी, खुद्दारी और मृत्यु होने तक संघर्ष करने की जिजीविषा के अलावा और कुछ नहीं है।

उनकी हिम्मत है, जो वे दिल्ली के शून्य तक पहुंचे तापमान, कोरोना वायरस और बर्ड फ्लू के खतरे उठा कर आंदोलन कर रहे हैं। पर दूसरी ओर सरकार साम, दाम, दंड और भेद सबका इस्तेमाल कर रही है। वह जाने कहां कहां से लाकर किसान संगठन खड़े कर रही है और उनसे कानूनों का समर्थन करा रही है, किसान संगठनों में फूट डाल रही है, मीडिया के जरिए माहौल बना कर आंदोलन को बदनाम कर रही है और अदालत से मनमाफिक फैसला हासिल करने के लिए पूरे मुद्दे को तोड़-मरोड़ रही है।

असल में केंद्र सरकार के बनाए कृषि कानूनों के दो पहलू हैं, जिनमें एक संवैधानिकता का पहलू है और दूसरा व्यावहारिक रूप से खेती-किसानी पर होने वाले असर का पहलू है। किसान इस दूसरे पहलू को लेकर ज्यादा चिंतिंत हैं। वे कृषि कानूनों की संवैधानिकता की बहस में नहीं पड़ना चाह रहे हैं। तभी उन्होंने कहा है कि वे अदालत नहीं जाएंगे। उनको पता है कि अदालत संवैधानिकता पर तो विचार कर सकती है लेकिन किसी कानून की जरूरत है या नहीं इस पर वह सरकार के फैसले में दखल नहीं दे सकती है। सरकार यहीं चाहती है कि सर्वोच्च अदालत में कानूनों की संवैधानिकता पर जल्दी से सुनवाई हो जाए और उसका फैसला आ जाए। सरकार को यकीन है कि इस बिंदु पर उसका पक्ष मजबूत है क्योंकि उसका कहना है कि उसने कृषि उत्पादों की बिक्री को लेकर कानून बनाएं हैं, जो संविधान की समवर्ती सूची में है। और दूसरे, इसे संसद के दोनों सदनों से पास कराया गया है।

परंतु संवैधानिकता के मसले पर भी केंद्र सरकार का पक्ष कमजोर है क्योंकि कृषि का मामला संविधान की राज्य सूची में रखा गया है। इस पर कानून बनाने का अधिकार सिर्फ राज्यों को है। सरकार कृषि पैदावार के कारोबार को लेकर तो कानून बना सकती है पर कृषि को लेकर कानून नहीं बना सकती। अब सवाल है कि कृषि कार्य का दायरा कहां तक है? क्या किसान खेत में फसल बो देगा और फसल हो जाने के बाद काट लेगा, इतना ही कृषि कार्य है? नहीं! फसल खेत से खलिहान तक लाना और उसे किसी के भी हाथों बेचना किसान का अधिकार है और यह कृषि कार्य में आता है। जब किसान किसी को अपनी फसल बेच दे उसके बाद उसका जो भी कारोबार होगा वह कृषि कार्य के दायरे से बाहर होगा और केंद्र सरकार उस पर कानून बना सकती है। अगर ईमानदारीपूर्वक इस व्याख्या को माना जाए तो केंद्र का बनाया कानून असंवैधानिक हो जाएगा। केंद्र सरकार ने किसानों के फसल बेचने के अधिकार को भी कारोबार की श्रेणी में रखा है और इसलिए कानून बनाया है, जबकि किसान का अपनी फसल बेचना कृषि कार्य है, कारोबार नहीं है।

इस कानून की संवैधानिकता को लेकर दूसरा सवाल इसे संसद से पास कराने के तरीके पर है। देश में कोई भी कानून बनाने से पहले उसका मसौदा तैयार किया जाता है, मसौदा तैयार करने में उस सेक्टर के लोगों और जानकारों की राय ली जाती है, जिनके लिए कानून बनाया जाता है, मसौदा तैयार होने के बाद उसे आम लोगों के विचार के लिए सार्वजनिक किया जाता है और लोगों से आपत्ति मंगाई जाती है और तब संसद में पेश किया जाता है। संसद में भी उस पर विस्तार से चर्चा होती है और विवाद होने की स्थिति में संबंधित मंत्रालय की स्थायी समिति को या प्रवर समिति को भेजा जाता है। केंद्र सरकार ने कृषि कानून बनाने में इनमें से ज्यादातर की अनदेखी की है। किसान संगठनों का कहना है कि उनकी राय नहीं ली गई है और विपक्ष का कहना है कि उनकी बात नहीं सुनी गई।

लोकसभा में अपने प्रचंड बहुमत के दम पर सरकार ने इसे पास कराया और राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के बावजूद विपक्ष की आपत्तियों को दरकिनार कर बिना वोटिंग कराए, जोर-जबरदस्ती और एक तरह से अवैध तरीके से बिल पास कराया गया। यह संभवतः पहली बार हुआ कि विपक्ष वोटिंग की मांग करता रहा और आसन ने बिना वोटिंग कराए, ध्वनि मत से बिल पास कराया। नियम यह कहता है कि एक भी सदस्य अगर किसी बिल पर वोटिंग की मांग करता है तो अनिवार्य रूप से वोटिंग होगी। कृषि कानूनों पर समूचा विपक्ष वोटिंग की मांग करता रहा और आसन पर विराजमान उप सभापति ने उसे ठुकरा कर ध्वनि मत से बिल पास कराया। पहले तो सरकार ने अध्यादेश के जरिए इन कानूनों को लागू किया और फिर कानून बना कर जोर-जबरदस्ती इन्हें संसद से पास कराया। सो, अगर ईमानदारी से इन कानूनों की संवैधानिकता पर विचार होता है तो ये कानून खारिज होंगे।

तभी अगर सुप्रीम कोर्ट कानूनों की संवैधानिकता पर सुनवाई के लिए तैयार हो जाती है तो फिर यह मामला लंबा चलेगा। क्योंकि कई राज्य सरकारें भी इन कानूनों की संवैधानिक वैधता का मुद्दा लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचेंगी। पंजाब सरकार ने कहा है कि वह जल्दी ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका देगी। पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल आदि राज्यों की सरकारों ने केंद्र के बनाए कानूनों को निरस्त करने का प्रस्ताव विधानसभा से पास किया है और अपने कानून बनाए हैं। संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक केंद्र के बनाए किसी कानून के विरोध में अगर राज्य सरकार कानून बनाती है तो उसे राष्ट्रपति से मंजूरी लेनी होगी। अभी तक किसी राज्य के बनाए कानून पर राष्ट्रपति का फैसला नहीं हुआ है। देर-सबेर इन राज्यों को भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचना है।

सो, आंदोलन कर रहे किसान सुप्रीम कोर्ट जाएं या नहीं जाएं पर अदालत के पास यह मामला पहुंच गया है। अलग-अलग पक्ष इसमें पार्टी बन बन गए हैं। किसी को कानूनों की संवैधानिकता तय करानी है तो किसी को किसानों के आंदोलन की वजह से आने-जाने में परेशानी हो रही है और वह अपने इस मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। किसी को किसानों में कोरोना फैलने का खतरा दिख रहा है तो किसी को लग रहा है कि ये कानून किसानों के लिए फायदेमंद हैं। कंसोर्टियम ऑफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन नाम की एक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस की बेंच को चिट्ठी लिख कर कहा है कानून किसानों के लिए लाभदायक है और इस पर कोई भी फैसला करने से पहले उन्हें भी सुना जाए। इस तरह से यह पूरा मामला कानूनी मकड़जाल में उलझता दिख रहा है। सीधे-सादे किसान ईमानदारी से आंदोलन करते रहे और डेढ़ महीने में केंद्र सरकार ने उनके ईर्द-गिर्द मकड़जाल बुन दिया। तभी अब यह सिर्फ किसानों के हित की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि सच्चाई और तिकड़म की लड़ाई बन गई है। दीये और तूफान की लड़ाई बन गई है, जिसमें एक तरफ अपने हक के लिए लड़ रहे किसान हैं तो दूसरी ओर कारपोरेट का झंडा उठाए सर्वशक्तिमान सरकार, प्रशासन और मीडिया है।

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