‘शाइनिंग इंडिया’ से ‘सेल इंडिया’ तक!


भारतीय जनता पार्टी के शासन का सच है- ‘शाइनिंग इंडिया’ से ‘सेल इंडिया’! भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘शाइनिंग इंडिया’ का नारा दिया था, जिसे देश के लोगों ने ठुकरा दिया था। उस नारे के 17 साल बाद भाजपा के दूसरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माना है कि इंडिया को शाइनिंग बनाना मुश्किल है इसलिए सब कुछ बेच देते हैं। सो, इस साल बजट में ‘सेल इंडिया’ का संकल्प जाहिर किया गया है, वह भी एक निश्चित डेडलाइन के साथ! असल में सरकार पिछले साल बिक्री का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई थी इसलिए इस बार समयबद्ध लक्ष्य तय किया गया है। पिछले साल सरकारी कंपनियों को बेच कर दो लाख 10 हजार करोड़ रुपए की कमाई का लक्ष्य तय किया गया था। कोरोना वायरस की महामारी के बाद लक्ष्य को संशोधित करके 32 हजार करोड़ किया गया पर अंत में सरकार 19,499 करोड़ रुपए ही जुटा सकी।

इस साल सरकारी कंपनियों को बेच कर एक लाख 75 हजार करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार ने इस बार सावधानी बरती है, लक्ष्य कम बताया है लेकिन कमाई लक्ष्य से ज्यादा करनी है। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार इस बार मुनाफा कमाने वाली महारत्न कंपनियों को बेचने जा रही है। इस तरह सरकार ने विनिवेश के पूरे सिद्धांत को सिर के बल खड़ा कर दिया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जब पहली बार विनिवेश मंत्रालय बना था तब यह सिद्धांत तय किया गया था कि घाटे में चल रही कंपनियां ही बेची जाएंगी। जिस तरह मरा हाथी भी सवा लाख का होता है उसी तरह घाटे में चल रही सरकारी कंपनियां भी बहुत पैसा दे सकती थीं लेकिन बिक्री में तमाम तरह की गड़बड़ियां करके सरकारी संपत्ति औने-पौने दाम पर बेची गई, वह अलग कहानी है। इस सरकार ने विनिवेश के पूरे सिद्धांत को उलट दिया है। चूंकि अब घाटे की कंपनी कोई नहीं खरीद रहा है और मुनाफा कमा रही सरकारी कंपनियों के चुनिंदा और चहेते खरीदार मौजूद है इसलिए मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को बेचने पर खास ध्यान दिया गया है। मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के साथ साथ ऐसा बुनियादी ढांचा बेचने का फैसला हुआ है, जिसकी जरूरत कुछ चुनिंदा और चहेते क्रोनी पूंजीपतियों को है।

सरकार बिजली के ट्रांसमिशन लाइन बेचने जा रही है। गैस ऑथोरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी गेल की गैस पाइप लाइन बेची जाएगी। इंडियन ऑयल कारपोरेशन यानी आईओसीएल की तेल पाइप लाइन बेची जाएगी। राजमार्गों का मौद्रीकरण किया जाएगा। वेयरहाउस बेचे जाएंगे। भारतीय जीवन बीमा निगम में हिस्सेदारी बेची जाएगी। दो सरकारी बैंक बेचे जाएंगे। देश की दूसरी सबसे बड़ी तेल कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी बीपीसीएल को बेचा जाएगा। शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की बिक्री होगी। कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को बेचा जाएगा। पवन हंस को बेचना है। नीलांचल इस्पात निगम की बिक्री होनी है। आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी बेची जाएगी। भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड यानी बीईएमएल को बेचा जाना है। एयर इंडिया की बिक्री होनी है। सरकार के मालिकाने वाली लाखों एकड़ जमीनों को बेचने या लीज पर देने की योजना भी तैयार है। इनमें से ज्यादातर को बेचने का काम अगले वित्त वर्ष यानी 2021-22 में पूरा कर लेना है। सरकार को इतने पर चैन नहीं है। पहले से 23 सरकारी कंपनियों को बेचने का काम चल रहा है और वित्त मंत्री ने बजट में बताया कि नीति आयोग से कहा गया है कि वह और कंपनियों की सूची तैयार करे, जिसे बेचा जा सकता है।

सोचें, सरकार ने कितनी उदारता दिखाई है, जो इतनी कंपनियों को बेचने का फैसला करने के बावजूद लक्ष्य सिर्फ एक लाख 75 हजार करोड़ रुपए का ही रखा है। हकीकत यह है कि सरकार को देश की दूसरी सबसे बड़ी तेल कंपनी बीपीसीएल में ही अपनी 52 फीसदी की हिस्सेदारी बेचने से 63 हजार करोड़ रुपए मिलेंगे। यह कंपनी हर साल आठ हजार करोड़ रुपए कमा कर देती है। पर सरकार को हर साल आठ हजार करोड़ नहीं चाहिए। उसे सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को हलाल करना है। इसी तरह हिस्सेदारी बेचने के लिए सरकार भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करेगी तो सूचीबद्ध होते ही यह सबसे बड़ी बाजार पूंजी वाली कंपनी हो जाएगी। इसकी बाजार पूंजी 10 लाख करोड़ रुपए की हो सकती है। जैसी की चर्चा है अगर सरकार इसमें 25 फीसदी हिस्सेदारी बेचती है तो उसे ढाई लाख करोड़ रुपए मिलेंगे। हालांकि एक साथ इतनी बड़ी बिक्री का भार बाजार ही नहीं उठा पाएगा। इसलिए सरकार को इसे किस्तों में बेचना होगा।

एलआईसी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने और उसके बाद हिस्सा बेचने के लिए सरकार को संसद में प्रस्ताव लाना होगा। सो, वित्त मंत्री ने कहा है कि इसी सत्र में प्रस्ताव लाया जाएगा। दो सरकारी बैंकों को बेचने को लिए भी संसद की मंजूरी की जरूरत होगी। वह भी सरकार इसी सत्र में लेगी। वित्त मंत्री ने बताया नहीं है कि किन दो बैंकों को बेचा जाएगा पर माना जा रहा है कि देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा की बिक्री का प्रस्ताव आ सकता है। ध्यान रहे पंजाब नेशनल बैंक का भट्ठा बैठाने में मेहुल ‘भाई’ चौकसी और उनके भांजे नीरव मोदी की खास भूमिका है। बहरहाल, सरकार इतनी प्रतिबद्ध है और समय सीमा को लेकर इतनी गंभीर है कि सरकारी बैंकों और एलआईसी की बिक्री के लिए जरूरी कानूनी कार्रवाई इसी सत्र में कर लेगी। बैंकों और वित्तीय संस्थाओं की बिक्री से सरकार को एक लाख करोड़ रुपए जुटाना है।

कंटेनर कॉरपोरेशन भारत सरकार की एक छोटी सी कंपनी है, जिसे 1988 में शुरू किया गया था। यह देश की सबसे बड़ी लॉजिस्टिक कंपनी है, जिसके वेयरहाउस और डिपो हर रेलवे रूट, हवाई रूट और जलमार्गों पर हैं। यह हर साल मुनाफा कमा कर सरकार को देती है पर सरकार इसे सौ फीसदी बेच कर बाहर होना चाहती है। लॉजिस्टिक, वेयरहाउस, भंडारण आदि के धंधे में जो निजी कंपनी सबसे तेजी से बढ़ रही है वह अडानी समूह है। भारत का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक हब गुजरात के सानंद में बन रहा है, जिसका ठेका अडानी समूह को दिया गया है। सो, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि कंटेनर कारपोरेशन बिकेगा तो किसके पास जाएगा! एक-एक कर देश के सारे बंदरगाहों पर कब्जा कर रहे अडानी समूह को ही अगर मुनाफा कमाने वाली भारत की कंपनी शिपिंग कॉरपोरेशन भी मिल जाए तो हैरानी नहीं होगी।

वित्त मंत्री ने अगले वित्त वर्ष यानी 2021-22 में सरकारी कंपनियों को बेच कर एक लाख 75 हजार करोड़ रुपए कमाने का जो लक्ष्य रखा है उसमें एक लाख करोड़ रुपए सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं में शेयर बेच कर आएगा और 75 हजार करोड़ रुपए केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों यानी सीपीएसई की बिक्री से आएगा। मोदी सरकार ने सरकारी कंपनियों को दो हिस्सों में बांटा है। यह हिस्सा स्ट्रेटेजिक यानी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कंपनियों का है और दूसरा बाकी सरकारी कंपनियों का है। सरकार की नजर में चार स्ट्रेटेजिक सेक्टर हैं। पहला- परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और प्रतिरक्षा। दूसरा- परिवहन और संचार। तीसरा- ऊर्जा, पेट्रोलियम, कोयला और अन्य खनिज। चौथा- बैंकिंग, बीमा और वित्तीय संस्थाएं। इन चारों स्ट्रेटेजिक सेक्टर में सरकार ने तय किया है कि सरकारी हिस्सेदारी नाममात्र की रहेगी। इन सेक्टर्स की चार में से सिर्फ एक कंपनी सरकारी होगी। यानी 75 फीसदी निजी सेक्टर को काम करने दिया जाएगा। इनके अलावा जो नॉन स्ट्रेटेजिक सेक्टर की सरकारी कंपनियां हैं उनका पूरी तरह से निजीकरण किया जाएगा या उनका आपस में विलय किया जाएगा या बंद कर दिया जाएगा।

सरकारी कंपनियों को इतने बड़े पैमाने पर बेचने की योजना के पीछे सरकार का तर्क है कि बेकार पड़ी संपत्ति या घाटे में चल रही कंपनियां सरकार के ऊपर बोझ हैं और वित्तीय घाटा बढ़ाने का कारण बन रही हैं। इन्हें बेचने से सरकार को कमाई भी होगी, जिससे वित्तीय घाटे को कम करने में आसानी होगी और हर साल इन्हें चलाए रखने में होने वाला खर्च खत्म हो जाएगा तो हर साल होने वाला घाटा भी कम हो जाएगा। तभी वित्त मंत्री ने बजट के बाद पहले इंटरव्यू में कहा कि निवेश और सरकारी संपत्तियों का मौद्रीकरण यानी उन्हें बेच कर कमाई करना सरकार का मुख्य लक्ष्य है। सरकार मान रही है कि सार्वजनिक उपक्रमों को बेच कर निजी सेक्टर के निवेश के लिए अच्छा माहौल बनाया जा सकता है। इस साल के बजट में कहा गया है कि निजी  पूंजी आएगी तो उसके साथ नई तकनीक और बेहतर प्रबंधन भी आएगा, जिससे आर्थिक विकास की गति तेज होगी और नए रोजगार पैदा होंगे। सोचें, यह कितना बड़ा झूठ फैलाया जा रहा है। क्या आज तक एक भी मिसाल इस बात की है कि किसी सरकारी कंपनी को खरीद कर निजी कंपनी ने उसमें रोजगार बढ़ाया हो? सरकारी कंपनी खरीदते ही निजी कंपनियां उनमें छंटनी करती हैं और उसके बाद कम लोगों को, ठेके पर और कम वेतन पर बहाल कर उनका शोषण करती हैं। लेकिन रोजगार बढ़ाने के नाम पर सरकारी कंपनियों को बेचने को न्यायसंगत ठहराया जा रहा है। सरकार कह रही है कि निजी निवेश से नई तकनीक और बेहतर प्रबंधन आएगा। सवाल है कि सरकार खुद नई तकनीक या बेहतर प्रबंधन क्यों नहीं ला सकती है?


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