आइडिया ऑफ अमेरिका की परीक्षा!

फरीद जकारिया ने अपनी चर्चित किताब ‘पोस्ट अमेरिकन वर्ल्ड’ में बहुलता को, समावेशी समाज को, बिग आइडिया के प्रति सम्मान को और दुनिया के हर हिस्से से आने वाले प्रवासियों को सहज भाव से स्वीकार करने के अमेरिकी स्वभाव को उसकी असली ताकत बताया था। इस लिहाज से अमेरिका वास्तव में एक यूनिवर्सल नेशन यानी सार्वभौमिक राष्ट्र है। उसकी यहीं ताकत उसे बाकी देशों से अलग करती है। दुनिया का कोई भी देश उसे इसलिए चुनौती नहीं दे सकता है क्योंकि अमेरिका दुनिया के हर हिस्से के सबसे बेहतरीन बौद्धिक क्षमता वाले और सबसे महत्वाकांक्षी लोगों का घर है। भविष्य में दुनिया की जो तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश होंगे- चीन, जापान और भारत, उनमें से किसी के यहां नस्ल, कौम या राष्ट्रीयता की वैसी विविधता नहीं है, जैसी अमेरिका में है।

यहीं आइडिया ऑफ अमेरिका है, जिसे स्थापति और मजबूत करने में अब्राहम लिंकन से लेकर मार्टिन लूथर किंग तक, अनेक लोगों ने कुर्बानी दी। इसी के दम पर अमेरिका पिछले डेढ़ सौ साल से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था है, दुनिया का सबसे जीवंत व जाग्रत लोकतंत्र है और वैयक्तिक स्वतंत्रता का झंडाबरदार है। तभी सवाल है कि क्या ऐसे देश का बुनियादी विचार भी खतरे में पड़ सकता है? यह इतना आसान नहीं है क्योंकि अमेरिका का बुनियादी विचार पिछले दो-ढाई सौ सालों की लंबी लड़ाई और विकास प्रक्रिया में बना है। डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का यह बुनियादी विचार पसंद नहीं है और वे इसके विरूद्ध आचरण करते हैं पर वे इस विचार को कमजोर या खत्म नहीं कर सकते हैं।

फिर क्यों ऐसा है, जो मिनिपोलिस में एक गोरे पुलिस अधिकारी ने एक अश्वेत व्यक्ति को गिरफ्तार किया और उसकी गर्दन घुटनों से दबा कर उसे मार डाला तो पूरा अमेरिका उबल रहा है? असल में अफ्रीकी-अमेरिकी मूल के अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लोएड की मौत ने आम अमेरिकी की घुटन और उसके गुस्से को उस प्वाइंट तक पहुंचा दिया, जहां से गरम पानी में उबाल आता है। यह कई बरसों के गुस्से का सामूहिक प्रकटीकरण है। वास्तविकता यह है कि अतीत में ऐसी अनेक घटनाएं होती रही हैं और अमेरिकी समाज के गोरे और अश्वेत दोनों मिल कर उसका सामना करते रहे हैं। उनसे निपटने या न्याय करने की अमेरिकी व्यवस्था में बराबर विश्वास के साथ हर समुदाय, नस्ल के लोग सहज भाव से जीते रहे हैं। पर पिछले कुछ समय से वह सहजता, वह भरोसा और उम्मीद कमजोर हुई है। ट्रंप से पहले भी कई रिपब्लिकन राष्ट्रपति हुए, जिन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए विभाजनकारी राजनीति को हथियार बनाया पर एक राष्ट्र की नीति के रूप में इसे कभी मान्यता नहीं मिली थी। यह पहली बार हो रहा है कि राष्ट्र की नीति के रूप में अमेरिका में नस्लभेद को मान्यता मिल रही है। अमेरिका को फिर से ग्रेट बनाने या अमेरिकी लोगों को नौकरी देने, अमेरिकी कंपनियों को संरक्षित करने आदि के नाम पर नस्ल, रंग, कौम, देश का नीतिगत भेद शुरू हुआ है।

जब तक यह सब कुछ सिर्फ राजनीति तक सीमित था, तब तक आम लोगों का इससे बहुत सरोकार नहीं रहा। वे इस किस्म की राजनीति की अनदेखी करते रहे। लेकिन जैसे ही अमेरिका में इसे सरकारी नीति के तौर पर मान्यता मिलने लगी और अमेरिका को ग्रेट बनाने के नाम पर विभाजनकारी नीतियों को सांस्थायिक रूप दिया जाने लगा, तब से लोगों में नाराजगी बढ़ने लगी। जॉर्ज फ्लोएड की मौत उस नाराजगी के इजहार का तात्कालिक कारण बनी। लोग पहले से नाराज थे। उन्हें लग रहा था कि एक बुनियादी विचार के तौर पर अमेरिका की विविधता, बहुलता, समावेशी समाज की धारणा, विचारों के खुलेपन और कारोबारी गतिशीलता या डायनेमिज्म को कमजोर किया जा रहा है। और इनकी जगह ‘व्हाइट मेल सुपरमेसी’ यानी गोरे पुरुषों के वर्चस्व को स्थापित किया जा रहा है।

तभी जॉर्ज फ्लोएड की हत्या ने लोगों के गुस्से को भड़का दिया। उन्हें सड़कों पर उतरने और हिंसक प्रदर्शन के लिए मजबूर किया। इसे सिर्फ एक अश्वेत नागरिक की मौत के विरोध में हुए तात्कालिक प्रदर्शन के तौर पर देखेंगे तो असली प्वाइंट मिस हो जाएगा। असली बात को समझने के लिए पिछले साढ़े तीन साल के ट्रंप के शासन को समझना होगा। मुस्लिम देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर पाबंदी लगाने और वीजा नियमों को सख्त बनाने से उन्होंने जिस विभाजनकारी विचार को अपने शासन वाले अमेरिका की रीति-नीति बनाना शुरू किया था उसी की परिणति यह आंदोलन है। अमेरिका खुले दिल से हर नस्ल, कौम या देश के लोगों का स्वागत करता है। वह खुले विचारों का सम्मान करता है। लोगों की महत्वाकांक्षा को फलने-फूलने का मौका देता है। यहीं उसकी ताकत है। अमेरिका ने पहले अपना और फिर दुनिया का भूमंडलीकरण किया। उसने दुनिया भर के देशों में अपना सैन्य व आर्थिक साम्राज्यवाद फैलाया। इसके लिए उसने दुनिया भर के देशों की नाराजगी झेली। लेकिन दुनिया के देशों की वह नाराजगी अब तटस्थता में बदल गई है। दुनिया अब अमेरिका विरोध से आगे बढ़ कर उत्तर अमेरिका यानी पोस्ट अमेरिकन विचार की ओर बढ़ गई है, जिसका अंतिम लक्ष्य अमेरिका जैसा बनना ही है।

ऐसे अमेरिका को क्या कोई एक राष्ट्रपति खत्म कर सकता है? उसके बुनियादी विचारों को बदल सकता है? ऐसा संभव नहीं लगता है। अमेरिका के लोगों ने सड़कों पर उतर कर यहीं दिखाया है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को राष्ट्रपति भवन में कई मंजिल नीचे बने उस बंकर में जाकर छिपना पड़ा, जो परमाणु हमले से अमेरिकी राष्ट्रपति को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया है। इससे अमेरिकी लोगों और वहां के लोकतंत्र की ताकत को समझा जा सकता है। संभव है कि राष्ट्रपति ट्रंप इसका राजनीतिक फायदा उठाना चाहें और कुछ हद तक सफल भी हो जाएं पर इसके बावजूद वे अमेरिका के बुनियादी विचारों को नहीं बदल पाएंगे। वे आए हैं, हो सकते हैं रहें और फिर चले जाएं पर अमेरिका जिस लोकतंत्र, व्यक्ति स्वातंत्र्य और समावेशी समाज की बुनियाद पर खड़ा है, उसे नहीं हिला पाएंगे।

आखिर यह भी आइडिया ऑफ अमेरिका का ही प्रकटीकरण है कि मयामी में पुलिस के जवानों और अधिकारियों ने घुटनों पर बैठ कर प्रदर्शनकारियों से माफी मांगी। घुटनों पर बैठी पूरी पुलिस फोर्स का वीडियो सारी दुनिया ने देखा है और यह भी देखा कि कैसे प्रदर्शनकारियों ने अपना प्रदर्शन रोक दिया और रोने लगे। असल में अमेरिका ने नस्ल और रंगभेद, दासप्रथा आदि के लंबे इतिहास को याद रखा है और उन कड़वी यादों को भुला कर आपसी भाईचारा बनाने के उपाय किए हैं। अगर अमेरिका ने अपने शर्मनाक इतिहास पर परदा डाला होता तब शायद समाज की बुनियाद इतनी मजबूत नहीं होती। पर वहां पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को सच बताया गया। यहीं काम दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद खत्म होने के बाद नेल्सन मंडेला ने किया। उन्होंने गोरे लोगों के अत्याचार को इतिहास से बाहर नहीं किया, बल्कि उसे याद रखते हुए उनके प्रति सद्भाव बनाने का प्रयास किया। अश्वेत लोगों को उन्हें माफ करने के लिए प्रेरित किया। रिकॉन्सिलिएशन की लंबी चली प्रक्रिया में गोरे और अश्वेत लोगों को साथ लाया गया। अमेरिका में यह प्रक्रिया काफी पहले शुरू हुई थी और लंबे समय के बाद उसे स्थापित किया गया है। दासप्रथा को खत्म करने के लिए अब्राहम लिंकन ने खुद सेना का नेतृत्व किया था और मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने सरकार की सविनय अवज्ञा करते हुए कुर्बानी दी थी। अमेरिका इस इतिहास की बुनियाद पर बना है और इसलिए तमाम दूसरी खामियों के बावजूद उस समाज को मिटा देना आसान नहीं होगा।

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