Corona crisis vaccine discrimination वैक्सीन का भेदभाव कैसे खत्म होगा?
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वैक्सीन का भेदभाव कैसे खत्म होगा?

सोचें, हम खुद भारत में कितने देशों के साथ भेदभाव कर रहे हैं? कितने देशों के नागरिकों को वैक्सीन की दोनों डोज लगवाए होने के बावजूद आरटी-पीसीआर टेस्ट के लिए बाध्य कर रहे हैं? देश के भीतर ही कितने राज्यों के नागरिकों के साथ वैक्सीन की डोज लगवाए होने के बावजूद कैसा भेदभाव कर रहे हैं और यहीं काम ब्रिटेन ने कर दिया तो हमने हायतौबा मचा रखी है।… ऐसे भेदभाव का कोई तार्किक आधार नहीं है। भारत, ब्रिटेन और अमेरिका तीनों जगह ट्रैवल गाइडलाइंस में वैक्सीन का भेदभाव दिख रहा है और यह विशुद्ध रूप से इन देशों की मर्जी से तय हुआ लग रहा है। इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। Corona crisis vaccine discrimination

भारत में इस बात को लेकर देशभक्ति उफान मार रही है कि आखिर ब्रिटेन ने कैसे भारत के वैक्सीनेशन को मानने से इनकार किया? समझदार लोग भी सवाल पूछ रहे हैं कि जब ब्रिटेन की संस्था ऑक्सफोर्ड और स्वीडिश कंपनी एस्ट्राजेनेका की लैब में तैयार की गई वैक्सीन ही भारत और ब्रिटेन दोनों जगह लगी है तो ब्रिटेन कैसे भारत के वैक्सीनेशन को स्वीकार करने से इनकार कर सकता है! दोनों सवाल बिल्कुल जायज हैं। जब ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की ही वैक्सीन ब्रिटेन में लगी है और उसी के फॉर्म्यूलेशन से बनी कोवीशील्ड वैक्सीन भारत में लग रही है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी मंजूर कर लिया है तो ब्रिटेन क्यों नहीं इसे मान रहा है और क्यों उसने जो अपनी नई ट्रैवल गाइडलाइन जारी की है उसमें भारत से जाने वालों को वैक्सीन की दोनों डोज लिए होने के बावजूद 10 दिन तक अनिवार्य रूप से क्वरैंटाइन में रखने का फैसला किया है? देशभक्ति से ओतप्रोत लोगों को ज्यादा परेशानी इस बात से भी है कि आखिर ब्रिटेन ने कैसे भारत को तुर्की, पाकिस्तान, मालदीव जैसे मुस्लिम देशों की श्रेणी में रखा और जोखिम वाला देश माना! लेकिन यह अलग चर्चा का विषय है।

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ब्रिटेन के इस भेदभावपूर्ण नियम पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले यह जानना जरूरी है कि भारत में अलग अलग राज्यों ने यात्रा को लेकर क्या दिशा-निर्देश जारी किए हैं। भारत के साथ भेदभाव करने पर ब्रिटेन के खिलाफ आग उगलने वाले लोगों को पता नहीं जानकारी है या नहीं लेकिन यह हकीकत है कि केरल का कोई यात्री अगर गोवा जाता है तो भले उसने वैक्सीन की दोनों डोज लगवा रखी हो, उसे पांच दिन के अनिवार्य क्वरैंटाइन में रहना होगा। देश के कम से कम चार राज्य ऐसे हैं, जहां वैक्सीन की दोनों डोज लगवा चुके लोगों को भी आरटी-पीसीआर टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट लेकर जाना होगा। कर्नाटक, गोवा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल ने यह नियम बनाया है कि उनके यहां आने वाले वैक्सीन की दोनों डोज ले चुके यात्रियों को भी आरटी-पीसीआर की 72 घंटे के अंदर की निगेटिव रिपोर्ट दिखानी होगी।

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अगर अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए भारत के राज्यों में बनाए गए नियमों की बात करें तो महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में बृहन्नमुंबई महानगरपालिका ने नियम बनाया है कि इंगलैंड, यूरोपीय देशों, मध्य-पूर्व एशिया के देशों और दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, बांग्लादेश, चीन, बोत्स्वाना, मॉरीशस, न्यूजीलैंड और जिम्बाब्वे से आने वाले यात्रियों को मुंबई हवाईअड्डे पर अपने खर्च से आरटी-पीसीआर टेस्ट कराना अनिवार्य होगा। हर यात्री को छह सौ रुपए टेस्ट के देने होंगे। इसके साथ ही सेल्फ डिक्लरेशन फॉर्म और अंडरटेकिंग देने के बाद ही एयरपोर्ट छोड़ना होगा। यह नियम उन सभी यात्रियों पर भी लागू होगा, जिन्होंने वैक्सीन की दोनों डोज लगवाई हुई है।

सोचें, हम खुद भारत में कितने देशों के साथ भेदभाव कर रहे हैं? कितने देशों के नागरिकों को वैक्सीन की दोनों डोज लगवाए होने के बावजूद आरटी-पीसीआर टेस्ट के लिए बाध्य कर रहे हैं? देश के भीतर ही कितने राज्यों के नागरिकों के साथ वैक्सीन की डोज लगवाए होने के बावजूद कैसा भेदभाव कर रहे हैं और यहीं काम ब्रिटेन ने कर दिया तो हमने हायतौबा मचा रखी है। भारत ने जो हायतौबा मचाई, उससे हो सकता है कि ब्रिटेन नियम को बदल दे और भारत के यात्रियों को क्वरैंटाइन के नियम में छूट दे दे, लेकिन इससे वैक्सीन के नाम पर होने वाला भेदभाव कभी खत्म नहीं होगा। क्योंकि यह सिर्फ वैक्सीनेशन का मामला नहीं है, बल्कि कंट्रोल का मामला है। लोगों की आवाजाही को पूरी तरह से नियंत्रित करने के प्रयास का मामला है और आने वाले दिनों में इसके कई रूप देखने को मिलेंगे। जैसे अमेरिका ने नए ट्रैवल गाइडलाइंस जारी किए हैं, जो नवंबर से लागू होंगे। इसमें भारत सहित 33 देशों के उन यात्रियों को बेरोकटोक अमेरिका की यात्रा करने की अनुमति होगी, जिन्होंने अमेरिकी एफडीए या विश्व स्वास्थ्य संगठन से मान्यता प्राप्त वैक्सीन की दोनों डोज लगाई होगी। सोचें, दुनिया के बाकी देशों के लोगों ने भी अगर ऐसी ही मान्यता प्राप्त वैक्सीन लगवाई होगी तो उनको क्यों नहीं अमेरिका जाने की इजाजत होगी? आखिर दूसरे देशों के साथ इस भेदभाव का क्या तार्किक और वैज्ञानिक आधार बनता है?

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जाहिर है ऐसे भेदभाव का कोई तार्किक आधार नहीं है। भारत, ब्रिटेन और अमेरिका तीनों जगह ट्रैवल गाइडलाइंस में वैक्सीन का भेदभाव दिख रहा है और यह विशुद्ध रूप से इन देशों की मर्जी से तय हुआ लग रहा है। इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। अगर भारत के लोगों ने अमेरिकी एफडीए या डब्लुएचओ से मान्यता प्राप्त वैक्सीन की दोनों डोज लगवाई है तो वे अमेरिका जा सकते हैं या लेकिन ऐसी ही वैक्सीन लगवाने वाले पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल या श्रीलंका के लोग सिर्फ वैक्सीन सर्टिफिकेट के आधार पर अमेरिका नहीं जा सकते हैं! क्या इन देशों में लगाई जाने वाली वैक्सीन नकली है या सर्टिफिकेट फर्जी जारी हो रहे हैं? अगर ऐसा है तो क्या इन देशों के नागरिकों की चिंता करना दुनिया की जिम्मेदारी नहीं बनती है? असल में इसका सिर्फ इतना मतलब है कि भारत बड़ा देश है, अमेरिकी उत्पादों का बड़ा बाजार है और हिंद-प्रशांत में अमेरिकी कूटनीति का एक संभावित औजार है इसलिए इसके नागरिकों को इजाजत होगी और जिनका कम महत्व है उनके नागरिकों को इजाजत नहीं होगी। अमेरिका ने यह भी नहीं सोचा कि भारत या दूसरे देशों के जिन लोगों ने जनवरी-फरवरी में वैक्सीन लगवाई है उनके शरीर में नवंबर तक वायरस को रोकने वाली एंटीबॉडी बची भी होगी या नहीं!

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दूसरी अहम बात यह है कि दुनिया के जो भी देश वैक्सीनेशन के आधार पर यात्रा के दिशा-निर्देश तय कर रहे हैं क्या वे सचमुच मानते हैं कि वैक्सीन कोरोना वायरस से संपूर्ण सुरक्षा उपलब्ध करा रही है? तमाम शोध और अध्ययन से यह साबित हो गया है कि वैक्सीन की दोनों डोज लिए होने के बावजूद वायरस का संक्रमण हो रहा है। सबसे अच्छी मानी जा रही अमेरिकी कंपनी फाइजर की वैक्सीन के बारे में शोध का नतीजा यह है कि इस वैक्सीन से बनी एंटीबॉडी आठ महीने में 80 फीसदी खत्म हो जा रही है। भारत में लगाई जा रही दोनों वैक्सीन की एंटीबॉडी तो दो से तीन महीने में ही कम होने लग रही है। ऐसे में कैसे कोई देश यह मान सकता है कि वैक्सीन की दोनों डोज लेने वाले लोग सुरक्षित हैं और वे कोरोना वायरस का संक्रमण नहीं फैलाएंगे? यह सब जानते हुए भी वैक्सीन की दोनों डोज के आधार पर यात्रा के निर्देश तैयार किए जा रहे हैं और उसमें मनमाने तरीके से देशों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। यह असल में न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की तैयारी है, जिसमें कमजोर और गरीब देशों के लिए कोई जगह नहीं होगी। यह काम दुनिया की तमाम विश्व संस्थाओं की आंखों के सामने हो रहा है। वैक्सीन के प्रति ऐसी पवित्रता का भाव बना दिया गया है कि कोई इस पर सवाल नहीं उठा सकता है। इस पर सवाल उठाने वालों को सोशल मीडिया साइट्स खुद ब खुद प्रतिबंधित कर दे रही हैं।

अगर वैक्सीन के प्रति श्रद्धा और पवित्रता का भाव छोड़ दिया जाए तो इसके आधार पर होने वाला भेदभाव भी खत्म हो जाएगा। इस पर वैज्ञानिक तरीके से सोचने की बजाय दुनिया के देश वैक्सीन पासपोर्ट और ग्रीन पास की व्यवस्था लागू करने में लगे हैं। अगर ऐसा होता है तो इससे भेदभाव बढ़ेगा और लोगों को वास्तविक सुरक्षा हासिल होने की कोई गारंटी भी नहीं होगी। इसलिए वैक्सीनेशन को अपनी रफ्तार से चलने दिया जाए लेकिन लोगों को यात्रा करने या एक जगह इकट्ठा होने या किसी कार्यक्रम में शामिल होने, ऑफिस जाने जैसे कामों के लिए इसे अनिवार्य नहीं किया जाए। अगर यात्रा से पहले आरटी-पीसीआर टेस्ट अनिवार्य कर दिया जाए और उसके सर्टिफिकेट की शुद्धता सुनिश्चित कर दी जाए तो अपने आप सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी। लेकिन तब वैक्सीनेशन के जरिए चलाए जा दुनिया के बड़े उद्योगपतियों का ग्लोबल एजेंडा पूरा नहीं हो पाएगा।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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