संस्थाएं बचेंगी तो देश बचेगा

शेक्सपीयर के मशहूर नाटक ‘हैमलेट’ की यह लाइन कि ‘समथिंग इज रॉटेन इन द स्टेट ऑफ डेनमार्क’ कई संदर्भों में अलग-अलग तरह से दोहराई जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने यह बात इलाहाबाद हाई कोर्ट के संदर्भ में कही थी, जब उन्होंने न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद का मुद्दा उठाया था। आज यह बात लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं के बारे में कही जा सकती है कि उनमें कुछ न कुछ तो सड़ रहा है! सवाल यह है कि इन संस्थाओं को सड़ने से बचाएगा कौन? जब मेड़ ही खेत खाने लगे तो उसे भला कौन बचा सकता है!

राजस्थान के राजभवन से बात शुरू कर सकते हैं। पिछले 20 दिन से चल रही सियासी उठापटक के बीच राज्यपाल की जो भूमिका रही है, उसने इस बहस को नए सिरे से शुरू करने की वजह दी है कि आखिर भारत की मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यपाल की जरूरत क्या है? क्यों नहीं राज्यपाल नाम की इस संस्था को खत्म कर दिया जाए? पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी के नेता शशि थरूर ने इस बात की जोरदार वकालत की थी कि भारत में अब संसदीय प्रणाली की बजाय अध्यक्षीय प्रणाली यानी अमेरिका जैसी व्यवस्था को अपनाने का समय आ गया है। इस व्यवस्था की अपनी कमियां होंगी पर अगर उसे अपना लिया गया तो गणतंत्र के नाम पर भारत में होने वाला धारावाहिक तमाशा तो बंद होगा!

ध्यान नहीं आता है कि कभी किसी राज्यपाल ने कोई ऐसा काम किया हो, जिसे देख कर अनायास मुंह से वाह निकली या जिस काम को देख कर लगे कि हां, इस काम के लिए राज्यपाल का होना जरूरी है। थोड़े से गौरवशाली अपवादों को छोड़ दें तो राज्यपालों ने भारत में हमेशा केंद्र सरकार के विस्तारित हिस्से के तौर पर ही काम किया है। केंद्र में सत्तारूढ़ दल की सरकार जिस राज्य में होती है वहां राज्यपाल पार्टी के पालतू नेता की तरह बरताव करते हैं, उन्हें मुख्यमंत्री के कामकाज में कभी कोई खामी नहीं दिखाई देती है, लेकिन जहां विरोधी पार्टी की राज्य सरकार होती है, वहां राज्यपाल को सरकार के हर काम में खामी दिखाई देती है। वैसे संविधान की व्यवस्था के मुताबिक राज्यपाल का पद सजावटी ही है पर ऐसा लगता है कि उसे विपक्षी पार्टियों की सरकार को बरखास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करने भर के लिए रखा गया है। एक यहीं काम है, जो राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में आता है बाकी वे जो भी काम करते हैं वो ऐसे काम नहीं होते हैं, जो उनके बिना नहीं हो सकते हैं।

दूसरी संस्था न्यायपालिका है, जिसकी भूमिका को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हुई है। मौजूदा समय की दो घटनाओं के आधार पर इसका विश्लेषण हो सकता है। पहली घटना राजस्थान के स्पीकर सीपी जोशी की ओर से कांग्रेस के बागी विधायकों को नोटिस जारी करने का है। किसी भी विधायक को नोटिस जारी करना स्पीकर का अधिकार होता है और खुद सुप्रीम कोर्ट ने कहा हुआ है कि अपवादों को छोड़ कर इस अधिकार में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। पर राजस्थान के स्पीकर का तो यह अधिकार ही खत्म कर दिया गया। अगर स्पीकर किसी पार्टी के चीफ व्हिप के कहने पर विधायकों को नोटिस तक जारी नहीं कर सकता है तो फिर उसके होने का क्या मतलब है?

दूसरा मामला सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ शुरू हुए अवमानना मामले का है। इस समय जब कोरोना के संक्रमण की वजह से अदालतें सिर्फ जरूरी मुकदमे सुन रही हैं तब प्रशांत भूषण के खिलाफ 11 साल पहले दर्ज हुए एक अवमानना मामले को झाड़-पोंछ कर निकाला गया है और तीन दिन के नोटिस पर उसकी सुनवाई शुरू कर दी गई है। आठ साल से इस मामले में कोई सुनवाई नहीं हुई थी। अवमानना का दूसरा मामले प्रशांत भूषण के ट्विट को लेकर है, जिसे अदालत ने अपने सम्मान के खिलाफ माना है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज रहे जस्टिस रामभूषण मेहरोत्रा जब पीयूसीएल की दिल्ली ईकाई के अध्यक्ष थे, तब वे अमेरिका की संघीय अदालत का एक किस्सा अक्सर सुनाते थे। अमेरिका की संघीय अदालत ने एक फैसला सुनाया, जिसके बाद हारे हुए पक्ष ने कहा कि इस बूढ़े खूसट जज ने जान बूझकर मेरे खिलाफ फैसला दिया है। जाहिर है उस व्यक्ति पर अवमानना का मामला दर्ज हुआ और उसी जज की अदालत में आया, जिसने फैसला सुनाया था। उस जज ने कहा कि आरोपी ने मुझे बूढ़ा कहा है, जो कि ‘मैटर ऑफ फैक्ट’ है यानी सही तथ्य है और उसने मेरे फैसले पर सवाल उठाया है, जो कि उसकी राय है ‘मैटर ऑफ ओपिनियन’ है और अमेरिका में हर व्यक्ति को अपनी राय जाहिर करने का अधिकार है, इसलिए अवमानना का मामला नहीं बनता है। यह कहते हुए जज ने मामले को खारिज कर दिया।

प्रशांत भूषण के मामले में अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, लेखकों और बौद्धिकों के साथ साथ दो रिटायर जजों जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस एपी शाह ने एक बयान जारी किया है। इस बयान में न्यूयॉर्क टाइम्स बनाम एलबी सुलिवन मामले में दिए गए अमेरिका की संघीय अदालत के एक फैसले का जिक्र है। इस मामले में अदालत ने कहा था कि ‘न्यायिक अधिकारियों की प्रतिष्ठा और सम्मान के चलते उनकी आलोचना को आपराधिक नहीं ठहराया जा सकता और यह बात तब भी वैध होगी, जब आलोचना या वक्तव्य अर्धसत्य होगा या सूचना पूरी तरह से गलत होगी’। इसी बयान में आगे दिवंगत वकील विनोड ए बोबड़े का एक संदर्भ दिया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था- हम एक ऐसी स्थिति को गवारा नहीं कर सकते, जहां नागरिक कोर्ट के बाहर या भीतर हमेशा कोर्ट की अवमानना के भय में रहें।

असल में पिछले कुछ समय से देश की उच्च अदालतों का रवैया, उसके कई फैसले, ऑब्जर्वेशन या टिप्पणियां सवालों के घेरे में रही हैं। यह बहुत स्पष्ट रूप से दिखा है कि अदालतें केंद्र सरकार के फैसले में दखल देने, उसे पलटने में या उस पर टिप्पणी करने से संकोच कर रही हैं। किसी भी मामले के अदालत में पहुंचते ही यह अंदाजा लगाया जाने लगता है कि फैसला तो सरकार के पक्ष में ही आएगा। यह स्थिति देश की सबसे भरोसेमंद और आम लोगों के भरोसे की प्रतीक संस्था की साख को कम कर सकती है। बहरहाल, संसद के दोनों सदनों, संसदीय समितियों, चुनाव आयोग सहित तमाम संवैधानिक संस्थाओं और मीडिया तक के कामकाज ऐसे दिख रखे हैं, जैसे सबने संविधान की शपथ नहीं ली है, बल्कि सरकार की शपथ ली है। सबको वहीं काम करने हैं, जो सरकार को पसंद हो। सरकार सारी संस्थाओं में सर्वोच्च हो गई है और संविधान की व्यवस्थाएं उसके मुकाबले गौण हो गई हैं। यह स्थिति लोकतंत्र और अंततः देश को पतन के रास्ते पर ले जा सकती है।

One thought on “संस्थाएं बचेंगी तो देश बचेगा

  1. बिहार में चुनाव होने हैं। मुझे नहीं पता नीतीश कुमार समाचार पत्र पढ़ते हैं या नहीं, टीवी देखते हैं या नहीं? पिछले 7 सालों में मैंने जो पढ़ा या देखा उन्होंने पढ़ा या देखा पता नहीं? पर आज से 7 साल पहले इन समाचार पत्रों या टीवी के अनुसार बिहार एक आदर्श राज्य था जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, सड़क, बिजली, पानी सभी आदर्श स्थिति में थे। वित्तीय अनुशासन लाजवाब था।बिहार सुशासन का प्रतीक था। उनका राज पुण्यता लिए था जो आंधी में भी दीये के जैसा खड़ा था। लड़कियां स्कूल जा रही थीं। टीवी पत्रकार घूम घूम कर बिहार की चिकनी सड़कें दिखा रहे थे। वहां की महिलाओं की उत्कृष्ट स्थिति दिखा रहे थे। अब कुछ सालों में क्या हुआ जो नीतीश का मॉडल सबसे नाकामयाब हो गया? क्या सड़कें टूट गईं, हस्पताल गिरा दिए गए? महिलाओं को घरों में बंद कर दिया गया या लड़कियों की साईकल छीन ली गयी? जब देश के सबसे विकसित राज्य भी अपने कर्मचारियों को वेतन देने की स्थिति में नहीं हैं, बिहार सरकार सबको वेतन दे ही रही है, फिर भी उसका वित्तीय अनुशासन खराब ही कहा जा रहा है।
    ज़ाहिर है तब भी हालात वो नहीं थे जो बताए गए थे ना ही अब वो हालात हैं जो बताए जा रहे हैं। शायद यही वजह है कि मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। अब सच के नक्कार खानों में उनकी झूठ की तूती नहीं बजती तो उनको लगता की संस्थाएं खतरे में हैं। अगर कोई उस सच को बताए तो वह ट्रॉल है या भक्त या लंगूर। राजवंश के टुकड़ों पर ऊपर से नीचे सने उस ग़ुलाम ने कहा वो देखो “भक्त”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares