population law modi government क्या अब भी चाहिए जनसंख्या कानून?
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क्या अब भी चाहिए जनसंख्या कानून?

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भारत में दूसरे हर मसले की तरह जनसंख्या का मसला भी सीधे तौर पर राजनीति से जुड़ा है। आबादी के हिसाब से जातियों की राजनीति होती है और राजनीतिक दलों में जातीय नेताओं की पूछ उनकी संख्या के अनुपात में ही होती है। इसी तरह ध्रुवीकरण की राजनीति भी जनसंख्या के हिसाब से होती है। भारतीय जनता पार्टी के लिए जनसंख्या वृद्धि दर हमेशा ध्रुवीकरण कराने वाला एक मुद्दा रहा है। भाजपा और उसके नेताओं को लगता है कि मुस्लिम आबादी दूसरे समुदायों के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रही है और इससे एक दिन पूरे देश की जनसंख्या संरचना बदल जाएगी। प्रजनन दर के लिहाज से यह बात कुछ हद तक सही है लेकिन देश की जनसंख्या संरचना बदलने की आशंका का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। फिर भी इस मसले पर राजनीति करने से किसी को रोका नहीं जा सकता है।

अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे यानी एनएफएचएस की ताजा रिपोर्ट पेश की है, जिसमें दावा किया गया है कि भारत में जनसंख्या बढ़ने की दर स्थिर हो गई है या निगेटिव हो गई है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के ग्रामीण इलाकों में प्रजनन दर 2.1 फीसदी है और शहरी इलाकों में यह दर 1.6 फीसदी है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से तय मानक के मुताबिक अगर प्रजनन दर 2.1 फीसदी हो जाती है तो इसका मतलब है कि जनसंख्या बढ़ने की दर स्थिर हो गई है या कम हो रही है। देश में अब सिर्फ पांच ही राज्य ऐसे हैं, जहां प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट, टीएफआर दो से ज्यादा है। इसमें सबसे ज्यादा टीएफआर वाला राज्य बिहार है, जहां इसकी दर तीन है। उसके बाद मेघालय में 2.9, उत्तर प्रदेश में 2.4, झारखंड में 2.3 और मणिपुर में 2.2 है।

भारत में 1951 में जब पहली जनसंख्या नीति बनी थी उस समय टोटल फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर छह थी। इसका मतलब था कि एक महिला औसतन छह बच्चों को जन्म दे रही थी। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक यह अब दो के करीब है इसका मतलब है कि एक महिला औसतन दो बच्चों को जन्म दे रही है। यह रिप्लेसमेंट रेट से कम है। रिप्लेसमेंट रेट 2.1 होता है, जिसका मतलब है कि अगर एक महिला औसतन 2.1 बच्चों को जन्म दे रही है तो माना जाएगा कि जनसंख्या बढ़ने की दर स्थिर हो गई है। भारत में टोटल फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर अब रिप्लेसमेंट रेट से कम हो गई है, जिसका मतलब है कि अब देश की आबादी बढ़ने की दर स्थिर हो गई है और आगे इसमें कमी आएगी।

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हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि अब आबादी नहीं बढ़ेगी। शिशु मृत्यु दर में कमी आने और अच्छे खान-पान व चिकित्सा सुविधाओं की वजह से देश के लोगों की औसत आयु बढ़ी है। इसलिए अभी तुरंत जनसंख्या में कमी आनी नहीं शुरू होगी। लेकिन यह भी कम संतोष की बात नहीं है कि प्रजनन दर रिप्लेसमेंट रेट से कम हो गई है। यह देश की एक बड़ी उपलब्धि है, जिसका श्रेय आम लोगों को दिया जाना चाहिए। भारत यह उपलब्धि हासिल करने में कामयाब रहा है तो इसका एक कारण पिछले दो दशक में गैर- सरकारी संगठनों के जरिए गांव-गांव तक फैलाई गई जागरूकता है और दूसरा कारण शिक्षा का प्रसार है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट का एक आंकड़ा इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि जनसंख्या नियंत्रण में किसी भी नीतिगत उपाय के मुकाबले शिक्षा का प्रसार सबसे कारगर रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल नहीं जाने वाली महिलाओं में प्रजनन दर 3.1 है, जबकि 12 साल तक स्कूलिंग करने वाली महिलाओं में यह दर सिर्फ 1.7 है। यानी महज 12वीं तक की पढ़ाई करने वाली महिलाओं में भी प्रजनन दर निगेटिव हो गई है, ऐसी महिलाएं औसतन दो से कम बच्चों को जन्म दे रही हैं।

तभी यह बड़ा सवाल है कि क्या अब भी जनसंख्या नियंत्रण के लिए किसी कानून की जरूरत है? राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी दोनों की यह पुरानी चिंता है कि मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, जिससे देश की जनसंख्या संरचना बदल जाएगी। कायदे से अब उनको इस चिंता से मुक्त हो जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। भाजपा के नेता अब भी जनसंख्या नियत्रण कानून की जरूरत बता रहे हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, असम, उत्तराखंड जैसे भाजपा शासित राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण के कानून लाने की तैयारी काफी समय से चल रही है। तरह तरह के सुझाव दिए जा रहे हैं। कहीं दो से ज्यादा बच्चों वालों को चुनाव लड़ने से रोकने की सलाह दी जा रही है तो कहीं नौकरी, सरकारी सब्सिडी या दूसरी योजनाओं का लाभ नहीं देने का प्रस्ताव किया जा रहा है। लेकिन यह सब अवैज्ञानिक उपाय हैं।

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भारत में इस तरह के जोर-जबरदस्ती वाले उपाय कारगर नहीं हो सकते हैं। 1975 में लगाए गए आपातकाल के समय तब की कांग्रेस सरकार ने अनिवार्य नसबंदी का कार्यक्रम शुरू किया था, जिसका बड़ा नुकसान हुआ। उस घटनाक्रम के बाद दो दशक से ज्यादा समय तक जनसंख्या नियंत्रण के सारे उपाय लगभग ठप्प रहे थे। सन् 2000 में नई जनसंख्या नीति लाने के बाद इसमें फिर से तेजी आई। हालांकि तब भी परिवार नियोजन की जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह से महिलाओं के ऊपर रही। लेकिन पिछले दो दशक में स्थितियां बदली हैं। शिक्षा के प्रसार, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और कुछ हद तक आर्थिक हालात की वजह से धीरे धीरे जनसंख्या बढ़ने की दर स्थिर होने लगी है।

यह सही है कि नेशनल हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट समग्र तस्वीर नहीं दिखाती है। इसकी अपनी सीमाएं हैं। इसमें अलग-अलग धार्मिक या जातीय समूहों की जनसंख्या बढ़ने का वास्तविक आंकड़ा नहीं मिलता है। उसके लिए अगली जनगणना का इंतजार करना होगा। इसमें यह भी खतरा है कि अगर आंकड़ों में मामूली गड़बड़ी भी हुई तो नागरिकों की वास्तविक संख्या में करोड़ों का अंतर आ सकता है क्योंकि भारत की आबादी बहुत बड़ी है। इसके बावजूद इस सर्वे के निष्कर्षों पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। इससे कम से कम इतना स्पष्ट हो गया है कि भारत में जो उपाय अभी आजमाए जा रहे हैं उनके नतीजे सकारात्मक मिल रहे हैं। इसलिए कोई अतिरिक्त उपाय करने या कानून बना कर जोर-जबरदस्ती जनसंख्या नियंत्रित करने का प्रयास करने से बेहतर होगा कि शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रसार किया जाए और जागरूकता बढ़ाई जाए। इमरजेंसी के समय भारत में किए गए और पड़ोसी देश चीन में अपनाए गए जनसंख्या नियंत्रण के उपायों से हुए नुकसान को ध्यान में रखना चाहिए और स्वाभाविक रूप से इसे स्थिर होने देना चाहिए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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