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कंगना एक प्रयोग का हिस्सा हैं

kangana ranaut bheek remark

फिल्म अभिनेत्री पद्मश्री कंगना रनौत ने लंबे संघर्ष के बाद 1947 में भारत को मिली आजादी को ‘भीख में मिली आजादी’ कहा है और उनके हिसाब से भारत को असली आजादी 2014 में मिली, जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी। उनके इस बयान पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी और विपक्ष से ज्यादा प्रबुद्ध जनों ने इसका विरोध किया। लेकिन सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने लगभग चुप्पी साधे रखी। छोटी छोटी बातों पर बड़ी बड़ी टिप्पणी करने वाले भाजपा के ज्यादातर बड़े नेता चुप रहे। भाजपा के किसी राष्ट्रीय प्रवक्ता ने इस पर बयान नहीं दिया। ऑनलाइन सर्च करने पर महाराष्ट्र भाजपा के इस बयान से किनारा करने, भाजपा के किसी अनजाने से मीडिया पैनलिस्ट के आलोचना करने या राजस्थान में भाजपा विधायक दल के नेता द्वारा आलोचना करने की खबरें मिलती हैं। इतने घटिया और बेहूदा बयान पर देश की सबसे बड़ी और केंद्र में सरकार चला रही पार्टी की ओर से जैसी त्वरित और तीखी प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी वह कहीं देखने को नहीं मिली। यह इसके बावजूद है कि भारत की सरकार उसी ‘भीख में मिली आजादी’ का अमृत महोत्सव पूरे धूमधाम से मना रही है। kangana ranaut bheek remark

भाजपा की चुप्पी अपने आप में इस बात का संकेत है कि कंगना रनौत का बयान अनायास नहीं है और न बिना सोचे-समझे दिया गया है। यह एक प्रयोग का हिस्सा है, जो पिछले कुछ दिनों से देश में बहुत तेजी से चल रहा है। याद करें कुछ दिन पहले सबसे तेज चैनल के एक कार्यक्रम में किसी हिंदुवादी संगठन की युवा कार्यकर्ता ऋचा पाठक ने किस आत्मविश्वास के साथ कहा था कि भारत को जो आजादी मिली है वह पूर्ण आजादी नहीं है, बल्कि 99 साल की लीज पर मिली हुई आजादी है। उस युवा कार्यकर्ता के इस बयान पर कोई गंभीर प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। सबने उसे व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का टॉपर छात्र बता कर उसका मजाक उड़ाया। लेकिन यह मजाक का विषय नहीं है। इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि आखिर उसे यह ज्ञान कहां से मिला की भारत को आजादी लीज पर मिली हुई है। अगर इस बारे में गंभीरता से सोचेंगे तो पता चल जाएगा कि ऋचा पाठक और कंगना रनौत दोनों के ज्ञान का स्रोत एक ही है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी उस ज्ञान के प्रसार का माध्यम मात्र है।

इस ज्ञान प्रसार अभियान के पहले चरण में आजादी के नायकों को कमतर दिखाने का प्रयास हुआ था। उसमें महात्मा गांधी से लेकर पंडित नेहरू तक के चरित्रहनन का प्रयास हुआ। उनके चरित्र पर लांछन लगाने वाली बातें सोशल मीडिया में फैलाई गईं। झूठी-सच्ची तस्वीरों से इन अफवाहों को स्थापित करने का प्रयास हुआ। उनके कई बार जेल जाने की बात हुई तो कहा गया कि जेल तो उनके लिए आरामगाह थी, असली जेल तो सावरकर ने काटी। इसी प्रयास के तहत भोपाल से भाजपा की सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने महात्मा गांधी के हत्यारे को राष्ट्रवादी बताया था और इसके बावजूद उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस प्रयास के तहत जहां जरूरत होती वहां नए नायक गढ़े जा रहे हैं। यह सही है कि आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाला हर व्यक्ति नायक था। लेकिन उनमें से जिन लोगों ने आंदोलन का नेतृत्व किया वे ज्यादा बड़े नायक माने गए। उन बड़े नायकों के बरक्स सरकारी प्रयास से दूसरे लोगों को नायक बनाया जाने लगा है। यह नैरेटिव बनाया गया कि कांग्रेस ने सिर्फ एक परिवार और उस परिवार के प्रति श्रद्धा रखने वाले के लोगों को महत्व दिया। इस नैरेटिव के जरिए आजादी के नायक के तौर पर स्थापित ज्यादातर मूर्तियों से सिंदूर खरोंचने का काम किया गया। उन सबके महत्व और योगदान को कमतर किया गया।

Politcs BJP Maharashtra Jharkhand

इस तरह की बातों से पहला चरण पूरा हुआ तो दूसरा चरण आजादी को कमतर बताने का शुरू हुआ। इस तरह के प्रयास के बीज इस तथ्य में छिपे हैं कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने आजादी की किसी लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया। उलटे जिस समय देश में आजादी की लड़ाई चरम पर थी उस समय लगभग सभी हिंदुवादी संगठनों का विभाजनकारी एजेंडा चल रहा था, उसके लोग समाज को बांट रहे थे, अंग्रेजों के लिए जासूसी कर रहे थे, उनके लिए फौज में लोगों को भरती कर रहे थे, मुस्लिम लीग के साथ मिल कर सरकार बना रहे थे और जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो अंग्रेज गवर्नर जनरल को चिट्ठी लिख कर सलाह दे रहे थे और उपाय बता रहे थे कि गांधी के इस महान आंदोलन को कैसे कुचला जाए।

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इस बात की कुंठा और शर्मिंदगी उनको हमेशा घेरे रहती है। जब भी आजादी की गौरवगाथा गाई जाती है, उसके नायकों की बात होती है तो उसमें इनका कहीं जिक्र नहीं आता है। संघ और भाजपा सहित उसके तमाम अनुषंगी संगठनों को पता है कि अगर आजादी की लड़ाई इतनी गौरवशाली बनी रही तो वे भले सरकार बना लें और लंबे समय तक सरकार में बने रहे लेकिन आम लोगों के दिलों में वह जगह नहीं बनेगी या इतिहास में वह जगह नहीं मिलेगी, जो कांग्रेस, समाजवादियों और यहां तक कि कम्युनिस्टों को भी हासिल है। संघ ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लेने और अंग्रेजों का साथ देने के अपने इतिहास को दूसरे कामों से ढकने का बहुत प्रयास किया। उसी प्रयास के तहत हमेशा यह खबर फैलाई जाती रही है कि कहीं भी बाढ़ आती है, ट्रेन दुर्घटना होती है तो सबसे पहले संघ के लोग सेवा के लिए पहुंचते हैं। लेकिन जब कामयाबी नहीं मिली तो आजादी की लड़ाई को ही कमतर बताने का अभियान जोरदार तरीके से शुरू हुआ।

इसके लिए आईटी सेल में नया इतिहास लिखा जा रहा है और उसे व्हाट्सऐप के जरिए लोगों को पढ़ाया जा रहा है। इतिहास को बदलने का यह काम सरकारी संरक्षण में चल रहा है। अन्यथा कोई कारण नहीं था कि सरकार और सत्तारूढ़ दल के नेता कंगना रनौत के बेहूदा बयान पर चुप्पी साधे रहते। अगर इसमें सरकार की कोई मिलीभगत नहीं होती तो अब तक इस बेहूदा बयान वाले क्लिप दिखाने वालों से जवाब तलब किया गया होता और इसे हर प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया होता। इस अभियान में मीडिया समूहों की भी बड़ी भूमिका है अन्यथा देश के जिस सबसे बड़े मीडिया हाउस के न्यूज चैनल पर उसने यह बात कही थी वहां मौजूद एंकर तत्काल प्रतिवाद करता, माफी मांगने की जिद करता और उसकी टिप्पणी को तत्काल प्रसारण से हटवा देता। लेकिन चैनल के बेशर्म मालिकान और संपादकों ने सब कुछ पहले जैसा चलने दिया। जाहिर है उन्होंने भी पहले सरकार का रुख देखा और उसके हिसाब से ही अपना रुख तय किया। इसलिए इस खेल को गंभीरता से समझना चाहिए और इससे लंबी लड़ाई की तैयारी करनी चाहिए क्योंकि इस खतरनाक खेल में दुनिया का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन, दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी और दुनिया का सबसे बड़ा मीडिया शामिल है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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