Kishan Andolan MSP Modi एमएसपी की गारंटी, असंभव भी नहीं
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एमएसपी की गारंटी, असंभव भी नहीं

Kishan Andolan MSP Modi

हाथी निकल गया है, पूंछ अटकी हुई है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी निजी प्रतिष्ठा और बरसों से गढ़ी गई छवि को दांव पर लगा कर तीनों विवादित कृषि कानूनों को वापस ले लिया लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की कानूनी गारंटी देने से हिचक रहे हैं। हालांकि उन्होंने इसके लिए कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया है और उसकी प्रक्रिया भी शुरू हो गई है लेकिन सरकार के कुछ कथित आर्थिक जानकार और सरकारी कृषि विशेषज्ञ एमएसपी की कानूनी गारंटी को देश की आर्थिक सेहत के लिए नुकसानदेह बता रहे हैं। वे झूठे-सच्चे आंकड़ों के सहारे बता रहे हैं कि अगर एमएसपी की कानूनी गारंटी दी गई तो सरकार पर कितना बोझ पड़ेगा और महंगाई कितनी बढ़ जाएगी। याद करें कैसे जब आखिरी बार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह किसान नेताओं से मिले थे तो उसके बाद खबर आई थी कि अगर एमएसपी की कानूनी गारंटी दी गई तो किसानों की फसल के लिए 17 लाख करोड़ रुपए चुकाने पड़ेंगे।

यह 17 लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा कहां से आया, कोई नहीं बता सकता है लेकिन हकीकत यह है कि सरकार के ऊपर पांच लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ नहीं आएगा और वह भी तब जब बाजार में बिक्री के लिए आने वाली सारी फसल सरकार खरीदे। जहां तक महंगाई बढ़ने का सवाल है तो वह भी एक किस्म का दुष्प्रचार है क्योंकि अभी सरकार ने जो एमएसपी तय की है और इसके दायरे में आने वाली फसलों की जो बाजार की कीमत होती है उन दोनों के बीच 36 हजार करोड़ रुपए का ही फर्क आता है। यहां दो बातें समझने की हैं। सरकार ने जिन 23 फसलों को एमएसपी के दायरे में रखा है अगर उनकी पूरी खरीद खुद करती है, जो कि संभव नहीं है, तब भी उसे अभी के मुकाबले पांच लाख करोड़ रुपए ज्यादा खर्च करने होंगे। लेकिन अगर वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद-बिक्री का सिर्फ कानून बना देती है और सब कुछ अभी जैसा चल रहा वैसे ही चलने दिया जाता है तो कारोबारियों को महज 36 हजार करोड़ रुपए ज्यादा चुकाने होंगे।

वैसे भी अगर सरकार किसानों के हितों के प्रति गंभीर है तो उसे खुद ब खुद आगे बढ़ कर फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बिक्री की कानूनी गारंटी देनी चाहिए ताकि बाजार में किसानों का शोषण बंद हो। ध्यान रहे देश में ज्यादातर किसान फसल कटने के तुरंत बाद उसे बेच देते हैं क्योंकि कई कारणों से उनको पैसे की तत्काल जरूरत होती है। खेती के लिए लिया गया कर्ज चुकाना हो या घरेलू जरूरतें हों, उन्हें तत्काल अपनी फसल बेचनी होती है, जिसका फायदा कारोबारी उठाते हैं। वे औने-पौने दाम पर उनकी फसल खरीद लेते हैं। अभी सरकार ने एमएसपी तय तो कर दी है लेकिन इसी कीमत पर खरीद-बिक्री की कानूनी बाध्यता नहीं है इसलिए किसान उस कीमत के लिए दबाव नहीं डाल सकते हैं। अगर एमएसपी पर ही खरीद-बिक्री अनिवार्य हो जाती है तो ऐसे किसान, जो अपनी फसल मंडी में नहीं ले जा पाते हैं या जहां मंडियों का सिस्टम नहीं है वहां के किसान भी एमएसपी पर अपनी फसल बेच पाएंगे।

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इस मिथक को भी समझने की जरूरत है कि अगर एमएसपी की गारंटी हो गई तो सरकार को अनाज का एक-एक दाना खरीदना होगा, जिस पर लाखों करोड़ रुपए खर्च होंगे। दूसरा मिथक यह है कि बाजार में अगर समूचा अनाज एमएसपी पर बिका तो महंगाई बहुत बढ़ जाएगी। किसानों के दुश्मन ये दोनों मिथक फैला रहे हैं। ध्यान रहे कभी भी किसान की समूची पैदावार बाजार में बिकने नहीं जाती है। कुल पैदावार का 70-75 फीसदी हिस्सा ही बिक्री के लिए जाता है। बाकी किसान अपनी जरूरत भर का अनाज अपने पास रखता है और इसके साथ ही पशुओं के लिए और बीज के लिए भी अनाज का संग्रह करता है। इसके बाद बचा हुआ अनाज बाजार में आता है लेकिन उसमें भी बहुत कम हिस्सा सरकार खरीदती है।

गौरतलब है कि सरकार कुल 23 फसलों की एमएसपी तय करती है। इसमें सात अनाज हैं, पांच दालें हैं, सात तिलहन हैं और चार व्यवसायिक फसल है। इनमें गन्ना एकमात्र फसल है, जिसकी एमएसपी पर खरीद-बिक्री की कानूनी गारंटी है। चीनी मिलों की बाध्यता होती है कि वे सरकार की तय की गई कीमत पर गन्ना खरीदें। इसके बावजूद 70 से 75 फीसदी गन्ने की खरीद ही एमएसपी पर होती है, जो कि सबसे ज्यादा है। सरकार औसतन 45 फीसदी के करीब धान, 36 से 38 फीसदी के करीब गेहूं और 25 फीसदी के करीब कपास की खरीद एमएसपी पर करती है। बाकी सारी फसलों में से कोई फसल नहीं है, जिसकी कुल पैदावार की पांच-छह फीसदी से ज्यादा की खरीद सरकार करती है या जिनकी बिक्री एमएसपी पर होती है। हां, पिछले साल चने की खरीद जरूर 20 फीसदी तक रही लेकिन वह इसलिए क्योंकि कोरोना की वजह से सरकार को एक किलो चना मुफ्त बांटना था। इस साल फिर चने की खरीद 5.25 फीसदी पर आ गई है। करीब 14 फसलें ऐसी हैं, जिनके कुल पैदावार का एक फीसदी भी एमएसपी के ऊपर नहीं बेचा जाता है। ध्यान रहे फल, आलू, प्याज, दूध, अंडा आदि ऐसे उत्पाद हैं, जिनकी कोई एमएसपी तय नहीं की गई है।

बहरहाल, सरकार जिन 23 फसलों की एमएसपी तय करती है उनके कुल पैदावार की कीमत पिछले वित्त वर्ष में 12 लाख करोड़ के करीब आंकी गई थी। लेकिन यह पूरी पैदावार बिक्री के लिए बाजार में नहीं आती है। इसका एक बड़ा हिस्सा किसान अपनी जरूरत, बीज और पशुओं के लिए रखता है। बाजार में आने वाली अलग अलग फसलों की मात्रा अलग-अलग होती है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष में जितनी फसल बाजार में आई उनकी एमएसपी के ऊपर कीमत नौ लाख करोड़ रुपए बनती है। अगर सरकारी खरीद की बात करें तो पिछले साल उसने ढाई लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की धान और गेहूं खरीदी है। नैफेड, सीसीआई आदि ने तिलहन, कपास आदि की जो खरीद की है उनकी कीमत 32 हजार करोड़ के करीब थी। इसके अलावा एक लाख करोड़ रुपए के करीब के गन्ने की बिक्री हुई। यानी कुल चार लाख करोड़ रुपए के करीब खरीद एमएसपी के ऊपर हुई। बाकी पांच लाख करोड़ रुपए का अनाज खुले बाजार में बिका और एमएसपी से कम कीमत पर बिका। अगर यह अनाज भी एमएसपी पर बिके तो एक अनुमान के मुताबिक 36 हजार करोड़ रुपए ज्यादा खर्च होंगे।

ध्यान रहे सरकार को बाजार में आने वाली फसल का एक एक दाना खरीदने की जरूरत नहीं है। इसलिए उसे अपने खजाने से पैसा निकालने की जरूरत नहीं होगी। वह जितनी खरीद करती है उतनी करती रहे और यह अनिवार्य कर दे कि खुले बाजार में भी एमएसपी से कम कीमत पर खरीद-बिक्री नहीं होगी। ऐसा कानून बन जाता है तब भी कारोबारियों को सिर्फ 36 हजार करोड़ रुपए ज्यादा चुकाने होंगे। जाहिर है इससे कोई आफत नहीं आ जाएगी और न महंगाई आसमान छूने लगेगी। तभी यह बात समझ में नहीं आने वाली है कि सरकार क्यों एमएसपी की कानूनी गारंटी नहीं देना चाहती है!

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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