उत्तर प्रदेश की प्रयोगशाला!

किसी जमाने में गुजरात को भाजपा और संघ की प्रयोगशाला कहा जाता था। गुजरात में हिंदुत्व के प्रयोग हुए और प्रयोग इतने सफल हुए कि पिछले 25 साल से राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और वहां की प्रयोगशाला से निकले नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अब भाजपा और संघ की प्रयोगशाला के तौर पर उत्तर प्रदेश उभर रहा है। तभी हैरानी नहीं है कि सोशल मीडिया में भाजपा समर्थकों ने नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारियों का जो क्रम बनाया है उसमें राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को काफी ऊपर रखा गया है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने संशोधित नागरिकता कानून के विरोध में हुए प्रदर्शनों के समय एक प्रयोग किया। सरकार ने तय किया कि सीसीटीवी फुटेज, टेलीविजन चैनलों की फुटेज और चश्मदीदों के बयान आदि के आधार पर उन लोगों की सूची बनाई जाएगी, जो प्रदर्शनों में शामिल थे और उनसे प्रदर्शन के दौरान सरकारी या निजी संपत्तियों को हुए नुकसान की वसूली की जाएगी। यह प्रयोग इतना सफल हुआ है कि इसे उत्तर प्रदेश मॉडल के तौर पर पेटेंट कराया जा सकता है। पिछले दिनों कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में दंगे हुए तो राज्य सरकार ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश मॉडल पर दंगाईयों की पहचान करेगी और सरकारी व निजी संपत्तियों को हुए नुकसान की भरपाई उनसे करवाएगी। यह किसी भी प्रदर्शन या प्रतिरोध को अपराध बनाने की दीर्घकालिक योजना का मॉडल है। दिल्ली में इस साल के शुरू में हुए दंगों के मामले में अध्यापकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र नेताओं आदि की गिरफ्तारी भी इसी मॉडल का विस्तार है।

अब उत्तर प्रदेश में दो और प्रयोग होने जा रहे हैं, जिनका राज्य सरकार को निश्चित तौर पेटेंट कराना चाहिए। पहला प्रयोग सरकारी नियुक्तियों में पहले पांच साल तक संविदा पर नौकरी कराने का है। उत्तर प्रदेश सरकार ने तय किया है कि जिन लोगों की सरकारी नौकरियों में नियुक्ति होगी, उनसे पहले पांच साल तक संविदा पर यानी ठेके पर काम कराया जाएगा और पांच साल बाद उनके कामकाज की समीक्षा करने के बाद स्थायी नियुक्ति दी जाएगी। सोचें, पक्की सरकारी नौकरी पाने के लिए पांच साल तक जो लोग ठेके पर काम करेंगे, उनके साथ कैसा बरताव होगा, उन्हें कितनी तरह के समझौते करने पड़ सकते हैं और उनके कामकाज की समीक्षा में कैसी धांधली हो सकती है!

भारत में सरकारी क्षेत्र में ठेके पर काम करने वाले लोगों को अनेक किस्म के समझौते करने होते हैं। अच्छी जगहों पर और खासे पढ़े-लिखे लोगों को भी तमाम किस्म के पक्षपात और भेदभाव झेलने पड़ते हैं। खास कर महिलाओं और वंचित व पिछड़े तबके के लोगों के साथ कैसा बरताव होता है इसकी अनेक भयावह कहानियां सार्वजनिक स्पेस में हैं। संविदा पर काम करने वाली महिलाओं के यौन शोषण की खबरें आए दिन मीडिया में आती रहती हैं। खबरें नहीं भी आएं तब भी सैकड़ों-हजारों अनकही कहानियां लोग जानते हैं। सो, सरकार का यह प्रस्ताव महिलाओं के सम्मान के साथ काम करने की संभावना को कम करेगा। दफ्तरों में उनके कामकाज की अच्छी समीक्षा करने के लिए उनको समझौता करने पर मजबूर किया जा सकता है।

प्रतिस्पर्धा के जरिए नौकरी के लिए चुनी गई युवा महिलाओं के लिए दूसरी मुश्किल यह होगी कि नौकरी के पहले पांच साल में अगर उनकी शादी होती है और बच्चे होते हैं तो इसके लिए उन्हें छुट्टी की जरूरत होगी, जिसे आजकल दफ्तरों में अच्छा नहीं माना जाता है। यह कामकाज की उनकी रेटिंग खराब करने वाला हो सकता है। संभव है कि इस चिंता में युवा महिलाएं परिवार बनाने और बढ़ाने की योजना को टालें, जिससे अलग तरह के संकट खड़े होंगे। महिलाओं के अलावा दूसरे वंचित, पिछड़े समूहों के ऊपर भी यह प्रयोग बहुत भारी पड़ने वाला है। एक दूसरा सवाल आरक्षण को लेकर भी है। नियुक्ति में तो आरक्षण का पालन किया जा सकता है, लेकिन पांच साल संविदा पर काम कराने के बाद जब कामकाज की समीक्षा के आधार पर स्थायी नियुक्ति की बात आएगी, तो उसमें कैसे आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा?

अपराधियों के साथ मुठभेड़ में कई किस्म के सफल प्रयोग के बाद सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए राज्य सरकार ने यूपी स्पेशल सिक्योरिटी फोर्स का गठन किया है। यह भी अद्भुत प्रयोग है। कहा जा रहा है कि यह सीआईएसएफ या महाराष्ट्र स्टेट सिक्योरिटी कॉरपोरेशन की तर्ज पर बनाया गया है। पर इसका गठन कई सवाल खड़े करता है। 31 अगस्त को इस फोर्स के गठन की अधिसूचना जारी हो गई है और राज्य के पुलिस प्रमुख ने कहा है कि तीन महीने के अंदर यह फोर्स काम शुरू कर देगी। कहा जा रहा है कि यह फोर्स राज्य की सभी महत्वपूर्ण जगहों की सुरक्षा संभालेगी। हाई कोर्ट से लेकर मेट्रो तक और साथ ही केंद्र व राज्य सरकार की ओर से अधिसूचित महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा तक का काम यह फोर्स देखेगी।

इस फोर्स को अधिकार दिया गया है कि वह बिना मजिस्ट्रेट के वारंट के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है। अगर किसी व्यक्ति को लेकर फोर्स के किसी सदस्य को संदेह होता है या भरोसा हो जाता है कि वह कोई अपराध करने वाला है या किसी संदिग्ध गतिविधि में शामिल है तो उसे गिरफ्तार करने के लिए वारंट की जरूरत नहीं होगी। इतना ही नहीं, जिन परिसरों की सुरक्षा इस फोर्स को सौंपी जाएगी, वहां से लोगों को बाहर निकालने का अधिकार भी इस फोर्स को होगा।

आमतौर पर इस तरह के अधिकार आतंकवाद प्रभावित इलाकों में फोर्स को दिए जाते हैं। पूर्वोत्तर में या जम्मू कश्मीर में अर्धसैनिक बलों को इस तरह के अधिकार देने के लिए खास कानून बनाए गए हैं। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, सीआईएसएफ को कानून के तहत यह अधिकार दिया गया है क्योंकि उसे देश की सुरक्षा के लिहाज से रणनीतिक जगहों की निगरानी और सुरक्षा का जिम्मा दिया गया है। तभी उत्तर प्रदेश में इस तरह की फोर्स तैयार करने से यह सवाल उठता है कि क्या देश के हृद्य स्थल पर बसा यह प्रदेश आतंकवाद या उग्रवाद या चरमपंथ की चपेट में आ गया है? क्या राज्य की सुरक्षा को पहले से अधिक खतरा पैदा हो गया है, जिसके लिए इस तरह की फोर्स की जरूरत पड़ी है? इस तरह की फोर्स का गठन तो असाधारण स्थितियों में ही होता है। सो, सरकार को बताना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में क्या असाधारण स्थितियां पैदा हो गई हैं, जिनकी वजह से इस तरह के अधिकार देकर एक नई पुलिस फोर्स तैयार की जा रही है।

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