जुबान बंद कराने की जिद से नुकसान

Must Read

अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन आने वाले कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने 1972 के सेंट्रल सिविल सर्विसेज पेंशन नियम में संशोधन को मंजूरी दे दी है। पिछले साल से यह संशोधन प्रस्ताव लंबित था, जिसे 31 मई को मंजूरी दी गई। इस संशोधन में कहा गया है कि सूचना के अधिकार कानून की दूसरी अनुसूची में दर्ज 18 सरकारी विभागों में काम कर चुके लोगों के सार्वजनिक रूप से कुछ भी बोलने और लिखने पर पाबंदी रहेगी। इन 18 विभागों में सभी खुफिया विभाग शामिल हैं और तीनों सेनाओं सहित सभी अर्धसैनिक बल भी शामिल हैं। इन विभागों में काम कर चुके लोग रिटायर होने के बाद भी अगर कुछ लिखना या बोलना चाहते हैं तो उन्हें पहले उस संबंधित विभाग के मौजूदा प्रमुख से मंजूरी लेनी होगी, जहां उन्होंने काम किया है। अगर कोई व्यक्ति इसका उल्लंघन करता है तो उसकी पेंशन रोकी या बंद की जा सकती है। जाहिर यह ऐसी पाबंदी है, जिससे छूट उसी रिटायर व्यक्ति को मिलेगी, जिसके जरिए सरकार किसी खास बात या विचार का प्रचार कराना चाहती है।

यह भी पढ़ें: पढ़ाई किसी की प्राथमिकता नहीं है!

सोचें, इस कानून का क्या मतलब है? सरकार क्यों खुफिया और सुरक्षा प्रतिष्ठानों में काम कर चुके लोगों को लिखने और बोलने से रोकना चाहती है? क्यों उनकी जुबान पर ताला लगाया जा रहा है? उनको सिर्फ बोलने या लिखने से रोका नहीं जा रहा है, बल्कि पेंशन बंद करने की सीधी धमकी दी गई है। क्या किसी सभ्य समाज में इस तरह के किसी कानून की कल्पना की जा सकती है? दुनिया के दूसरे सभ्य समाजों में या भारत में सरकारी अधिकारियों को लेकर ऐसे कानून हैं, जिनके सहारे उनको रिटायर होने के तुरंत बाद किसी निजी संस्थान में नौकरी करने से रोका जाता है। इसी तरह खुफिया या सुरक्षा प्रतिष्ठानों में नौकरी करके रिटायर हुए लोगों पर एक निश्चित समय तक की पाबंदी लगाई जा सकती है परंतु उनके लिखने और बोलने पर हमेशा के लिए पाबंदी लगाना सिर्फ खुफिया सूचना सार्वजनिक होने की चिंता को नहीं दिखाता है, बल्कि सरकार के पैरानॉयड होने का संकेत देता है।

यह भी पढ़ें: राजद्रोह कानून की समीक्षा जरूरी

कोई भी सरकार लोगों के बोलने और लिखने पर इस किस्म की पाबंदी नहीं लगा सकती है। और वैसे भी यह सरकार तो उच्च ओहदे से रिटायर होने वाले अधिकारियों के कूलिंग ऑफ पीरियड यानी निर्धारित अवधि तक किसी निजी कंपनी में नौकरी नहीं करने के कानून में भी इतने अपवाद बना चुकी है, जितना पहले कभी नहीं हुआ, फिर वह सरकार कैसे दूसरी सेवा के अधिकारियों के बारे में ऐसी पाबंदी लगा सकती है? ध्यान रहे मौजूदा विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर के विदेश सचिव जैसे संवेदनशील पद से रिटायर होने के तुरंत बाद केंद्र सरकार ने कूलिंग ऑफ पीरियड की बाध्यता खत्म करके उनको टाटा समूह ज्वाइन करने की इजाजत दी थी। उनके अलावा अनेक अधिकारियों को ऐसी छूट मिली है, जिन्होंने सरकारी नौकरी का कार्यकाल पूरा होने के तुरंत बाद कॉरपोरेट की नौकरी ज्वाइन की। क्या इससे सरकार के राज निजी कंपनियों तक नहीं पहुंचेंगे या इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि इन अधिकारियों ने नौकरी में रहते संबंधित कॉरपोरेट घराने को फायदा पहुंचाया होगा!

यह भी पढ़ें: संघीय ढांचे के लिए चुनौती

फिर सरकार के मंत्रियों के बारे में क्या कहा जाए? खुफिया और सुरक्षा विभागों के अधिकारी और कर्मचारी किसी न किसी मंत्री के अधीन काम करते हैं। अर्धसैनिक बल गृह मंत्रालय के अधीन हैं तो सेना रक्षा मंत्रालय के अधीन और रॉ जैसी एजेंसी सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन है। ऐसे में इन मंत्रालयों में मंत्री या राज्यमंत्री रहे नेताओं के भी पद से हटने के बाद बोलने या लिखने पर पाबंदी लगेगी? आखिर मंत्री के पास भी तो तमाम खुफिया सूचनाएं और सरकार की सुरक्षा योजनाओं की जानकारी होती है, फिर उन पर पाबंदी क्यों नहीं लगाई जा रही है? खुफिया और सुरक्षा से जुड़े मामलों के अलावा वित्त, वाणिज्य या विज्ञान-प्रौद्योगिक, अंतरिक्ष आदि से जुड़े विभागों की जानकारी भी तो बहुत संवेदनशील होती है। फिर इन विभागों के अधिकारियों, कर्मचारियों और मंत्रियों पर भी पाबंदी क्यों नहीं लगनी चाहिए? क्या आगे इन सबके के बोलने और लिखने पर भी पाबंदी लगेगी और नहीं मानने पर पेंशन काट लेने या बंद करने की धमकी दी जाएगी? असल में सरकार की ओर से किए गए संशोधन की भाषा ऐसी है, जिससे साफ साफ डराने का भाव प्रकट होता है।

यह भी पढ़ें: झूठे आंकड़ों से बढ़ेगा संकट

तभी यह आशंका भी पैदा होती है कि कहीं आरटीआई कानून की दूसरी अनुसूची के 18 विभागों के लोगों पर पाबंदी लगाना एक लंबी प्रक्रिया की शुरुआत तो नहीं है? इन विभागों में दो खुफिया एजेंसियां- आईबी और रॉ शामिल हैं। अर्धसैनिक बल- बीएसएफ, सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी, असम राइफल्स, एसएसबी और एसएसएफ भी शामिल हैं। इनके अलावा कुछ केंद्र शासित प्रदेशों जैसे लक्षद्वीप, अंडमान निकोबार द्वीप समूह और दादर नागर हवेली की सीआईडी या विशेष शाखा भी इसमें शामिल है। साथ ही नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय और सेंट्रल इकॉनोमिक इंटेलीजेंस एजेंसी भी इसमें शामिल है। इनमें से ज्यादातर संस्थाओं को पवित्र गाय की तरह देखा जाता है। इसलिए आम लोगों के भी लगेगा कि इनसे जुड़े लोगों को सार्वजनिक रूप से बोलने या लिखने से बचना चाहिए। तभी शुरुआत इनसे हुई है। इसके आगे कम महत्व वाले विभागों पर भी ऐसी पाबंदी नहीं लगाई जाएगी, इसकी गारंटी कोई नहीं कर सकता है।

यह भी पढ़ें: आंसुओं को संभालिए साहेब!

यह आशंका इसलिए है क्योंकि सरकारी गोपनीयता कानून पहले से अमल में है और उससे सेवा के दौरान और रिटायर होने के बाद अधिकारियों के आचरण को नियंत्रित किया गया है, उस कानून के रहते पेंशन कानून में संशोधन किया गया है। सरकार ने इस संशोधन के जरिए पेंशन को रिटायर अधिकारी या कर्मचारी के अच्छे आचरण से जोड़ दिया है। अब सवाल है कि किसी व्यक्ति ने जिस विभाग में काम किया है उसके बारे में लिखना या बोलना कैसे बुरा आचरण है? यह तो एक स्वाभाविक कार्य है, जो हर रिटायर व्यक्ति को करना चाहिए? अमेरिका जैसे देश में तो अनेक राष्ट्रपति हुए, जिन्होंन रिटायर होने के बाद दुनिया भर में भाषण देकर और किताबें लिख कर ही कमाई की और अपना जीवन चलाया, वह तो अपने देश का सर्वोच्च कमांडर होता है और उसके पास सारी खुफिया सूचनाएं होती हैं? भारत में भी प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति पद से रिटायर होने के बाद कई किताबें लिखीं। दूसरे राष्ट्रपतियों, उप राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों आदि ने अनेक किताबें लिखी हैं या सार्वजनिक रूप से भाषण आदि करते रहे हैं।

यह भी पढ़ें: कांग्रेस अध्यक्ष के अलावा सारे चुनाव होंगे!

इसी तरह सेना या अर्धसैनिक बलों या सुरक्षा बलों से रिटायर होने वाले अधिकारी किताबें लिखते हैं और सेमिनार आदि में भाषण देते हैं। उनके ऊपर पाबंदी लगाने या अपने विभाग के प्रमुख से अनुमति लेने की शर्त लगाने का क्या मतलब है? क्या कोई रिटायर सैन्य अधिकारी किसी सेमिनार में भाषण देने जाएगा तो वह पूर्व मंजूरी लेकर जाएगा? भाषण देने जाने से पहले वह कैसे बता सकता है कि वहां क्या क्या बातें होंगी और लोग सवाल करेंगे तो वह क्या जवाब देगा? एक बड़ा सवाल यह है कि अगर रिटायर हुए अधिकारी अपने कामकाज से जुड़े मसलों के बारे में नहीं लिखेंगे या विशेषज्ञ राय नहीं देंगे तो फिर कौन देगा? ऐसे अधिकारियों के अनुभवों से ही तो नई पीढ़ी के लोगों की समझ बनती है। अगर वे अपने अनुभव साझा नहीं करेंगे या किसी खास घटना पर विशेषज्ञ राय नहीं देंगे तो लोगों को सीख कैसे मिलेगी? इससे तो देश का ही नुकसान होगा।

यह भी पढ़ें: सरकार का पूरा फोकस, ध्यान भटकाओं!

तभी सवाल है कि सरकार ऐसा क्यों कर रही है? क्या सरकार खुफिया और सुरक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़े लोगों को लेकर किसी किस्म की आशंका में है, जिसकी वजह से यह संशोधन कानून लागू किया जा रहा है? ध्यान रहे पिछले साल चीन के भारतीय सीमा में घुसने और भारत की जमीन कब्जा कर लेने के मसले पर कई रिटायर सैन्य अधिकारियों ने गंभीर सवाल उठाए थे और सरकार को कठघरे में खड़ा किया था। उससे पहले सर्जिकल स्ट्राइक के समय उत्तरी कमान के प्रमुख रहे जनरल डीएस हुड्डा ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि भारतीय सेना ने कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले यूपीए के शासन में सीमा के पार जाकर सर्जिकल स्ट्राइक किया था। जाहिर है रिटायर सैन्य अधिकारियों की वजह से सरकार के कई दावों पर सवाल उठते हैं और उसे सफाई देनी होती है। इन अधिकारियों की बातों को जनता ध्यान से सुनती है और भरोसा भी करती है। इसलिए कहीं ऐसा तो नहीं है कि आगे ये लोग सरकार के किसी दावे पर सवाल नहीं उठा सकें, इस मकसद से उन्हें बोलने और लिखने से रोका जा रहा है?

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

साभार - ऐसे भी जानें सत्य

Latest News

Corona New Variant ‘Delta Plus’: कोरोना का नया वेरियंट आया सामने, वैज्ञानिकों ने कही ये बात

दिल्ली | Corona New Variant 'Delta Plus' : दुनिया में महामारी फैलाकर लाखों लोगों की जान लेने वाला आजतक...

More Articles Like This