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24 जवानों का खून किसके सिर?

साजिश थ्योरी की बात करने वालों की इन बातों को छोड़ें कि आखिर ऐसा कैसे होता है कि हर चुनाव के बीच में या उससे पहले सुरक्षा बलों पर नक्सलियों का या आतंकवादियों का हमला हो जाता है और भाजपा के बड़े बड़े नेता जवानों की शहादत पर वोट मांगने लगते हैं, तब भी यह बड़ा सवाल है कि आखिर छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ प्लान किया गया इतना बड़ा अभियान कैसे विफल हुआ और 24 जवानों का खून किसके सिर होगा? क्या इसे सुरक्षा बलों की विफलता मान कर भूला दिया जाएगा, जैसा कि पहले होता रहा है या किसी की जिम्मेदारी तय होगी? भाजपा के नेता आरोप लगा रहे हैं कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री असम में प्रचार कर रहे थे तो कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि देश के गृह मंत्री केरल में प्रचार कर रहे थे। सवाल है कि अगर नक्सलियों के सबसे बड़े कमांडर को घेर कर मारने के लिए कोई अभियान प्लान किया गया था तो क्या देश के गृह मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री दोनों को इस अभियान में तालमेल के काम की निगरानी नहीं करनी चाहिए थी?

सुरक्षा बलों का यह अभियान कोई मामूली अभियान नहीं था। आधुनिक समय के किसी अभियान से इसकी तुलना करनी हो तो अमेरिकी सैनिकों द्वारा एबटाबाद में जाकर ओसामा बिन लादेन को मारने के अभियान से की जा सकती है। अमेरिका के तब के राष्ट्रपति बराक ओबामा खुद उसकी निगरानी कर रहे थे, वार रूम में बैठे थे और उनकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी सारे सैन्य कमांडरों के साथ वार रूम में मौजूद थीं। छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों का अभियान नक्सलियों के बटालियन वन के कमांडर हिडमा को मारने के लिए था।

सुरक्षा बलों को जानकारी मिली थी कि हिडमा की बटालियन जोनागुडा में इकट्ठा हो रही है और हिडमा भी वहां होगा। इसके लिए 20 दिन तक तैयारी चली। पूरे अभियान की रूप-रेखा बनाई गई। भारत सरकार के सलाहकार और सीआरपीएफ के प्रमुख रहे के विजय कुमार भी इस अभियान की तैयारी में शामिल थे। सीआरपीएफ से लेकर छत्तीसगढ़ पुलिस और डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड यानी डीआरजी और बस्तरिया बटालियन के जवानों को भी शामिल किया गया। एक हजार जवानों को मुठभेड़ के लिए तैयार किया गया और 10 समूह बनाए गए। इससे अपने आप इस अभियान की गंभीरता का पता चलता है।

सवाल है कि क्या देश के गृह मंत्री को इस अभियान की जानकारी थी? क्या देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इस अभियान के बारे में जानते थे? क्या प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री को इसकी जानकारी थी? अगर नहीं थी तो यह और भी चिंताजनक बात है क्योंकि नक्सलियों के इतने बड़े कमांडर के खिलाफ इतने बड़े अभियान की तैयारी हो रही थी और देश के सर्वोच्च सुरक्षा अधिकारियों को पता नहीं है या देश के प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री को इसकी जानकारी नहीं है। अगर इन चारों सर्वोच्च लोगों को इसकी जानकारी थी तो उन्हें सामने आकर कबूल करना चाहिए औऱ 24 जवानों के शहीद होने की जिम्मेदारी अपने सर लेनी चाहिए। अगर उन्हें जानकारी नहीं थी तो अपनी जिम्मेदारी में विफल रहने की जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता है कि दो-चार अधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा कर इतने बड़े मामले पर लीपापोती कर दी जाए।

अधिकारियों की जिम्मेदारी बाद में आती है पहले राजनीतिक नेतृत्व को अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी। क्योंकि अगर राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी नहीं तय की जाएगी तो इस तरह की घटनाओं का दोहराव होता रहेगा। अगर 11 साल पहले दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में सीआरपीएफ के 76 जवानों के शहीद होने की घटना से सबक लिया गया होता तो ऐसी घटना फिर नहीं होती।

हालांकि उस समय के केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने आगे बढ़ कर जिम्मेदारी ली थी और यह मशहूर जुमला बोला था- बक स्टॉप्स हियर! यानी यह मेरी जिम्मेदारी थी और मैं विफल हुआ। क्या ऐसी बात देश के मौजूदा गृह मंत्री कह सकते हैं? पी चिदंबरम को नक्सलियों की कमर तोड़ने का श्रेय जाता है। उन्होंने ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया था, जिसके बाद बड़े इलाके से नक्सलियों का सफाया हुआ। दूसरी ओर भाजपा की सरकार का दावा है कि उसने नोटबंदी करके नक्सलियों की कमर तोड़ दी। लेकिन हकीकत यह है कि नक्सली अब भी छत्तीसगढ़ के जंगलों में इतने मजबूत हैं कि उन्होंने देश के सबसे प्रतापी प्रधानमंत्री, उतने ही प्रतापी गृह मंत्री, दुनिया के सर्वाधिक सक्षम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आदि के होते हुए सुरक्षा बलों को अपने जाल में फंसाया औऱ घेर कर उन्हें मार डाला।

मारने के बाद उनके पास इतना समय था कि उन्होंने आराम से शहीद सैनिकों के शव से बुलेट प्रूफ जैकेट उतारे, उनके हथियार निकाले, संचार उपकरण उठाए और चलते बने। सोचें, अगर लापरवाही, गैर जिम्मेदारी या निकम्मापन नहीं हो तो क्या तकनीकी सक्षमता के जमाने में ऐसा हो सकता है? ऊपर से यह भी हुआ कि कई घंटों तक रेस्क्यू टीम शहीद सैनिकों के शव तक नहीं पहुंच सकी, जबकि सीआरपीएफ का नजदीकी कैंप आधे घंटे की दूरी पर था।

राजनीतिक लापरवाही, गैर जिम्मेदारी औऱ निकम्मेपन के बाद सुरक्षा बलों के अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। इतने डेकोरेटेड अधिकारी इस अभियान से जुडे थे। सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारी जुल्फिकार हंसमुख, वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार के विजय कुमार, आईजी ऑपरेशंस नलिन प्रभात आदि अधिकारी इस अभियान से जुड़े थे। इन सबकी काबिलियत पर नक्सलियों की साजिश भारी पड़ी है। नक्सलियों ने इतने आसान तरीके से इन सबको बेवकूफ बना लिया, जिसकी आज के समय में कल्पना भी नहीं की जा सकती। अभियान विफल होने और 24 जवानों की शहादत के बाद अब पता चल रहा है कि नक्सलियों ने जान बूझकर सुरक्षा बलों तक यह सूचना पहुंचाई थी कि  जोनागुडा में उनका जमावड़ा हो रहा है। उन्होंने हिडमा को चारे की तरह इस्तेमाल किया और महान सुरक्षा रणनीतिकार लोग उनके जाल में फंस गए। उन्होंने इस तरह के अभियान में बरती जाने वाली बेसिक सावधानी भी नहीं बरती। सरकार के सुरक्षा सलाहकार के विजय कुमार डेरा डाले रहे, सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारी बैठे रहे, एक हजार से ज्यादा जवानों की टीम बनती रही, प्रशिक्षण होता रहा तो क्या नक्सलियों को इसकी सूचना नहीं मिल रही थी? इस तरह के अभियान गोपनीय रखे जाते हैं, छोटी-छोटी टुकड़ियां बनाई जाती हैं और अचानक कार्रवाई होती है। यहां तो 20 दिन से पूरे प्रदेश को पता था कि कोई कार्रवाई होने वाली है।

11 साल पहले हुई दंतेवाड़ा की घटना के समय डीआईजी रहे अधिकारी को ही नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशंस का आईजी बनाया गया है। उस अधिकारी के खिलाफ जांच चली थी और कई कमियों का पता चला था इसके बावजूद उसे इतनी बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। जो गलती उस समय हुई थी उसी से मिलती-जुलती गलती इस बार भी हुई है। इस बार भी खुफिया सूचना हासिल करने में सुरक्षा बलों के अधिकारी विफल रहे। उन्हें गलत सूचना मिली और वे इसे वेरीफाई तक नहीं कर पाए या वेरीफाई करने की जरूरत नहीं समझी। सेटेलाइट की तस्वीरों के जरिए नक्सलियों के मूवमेंट की जानकारी ली जा सकती थी पर वह भी जरूरी नहीं समझी गई।आखिर ऐसी गफलत में कोई अधिकारी इतना बड़ा अभियान कैसे प्लान कर सकता है?

यहां तक कि इस तरह के अभियान का अनुभव रखने वालों को भी जिम्मेदारी देकर आगे नहीं भेजा गया। इस गलती का खुलासा एक घायल जवान ने किया। उसने बताया कि जब वे अभियान पर जा रहे थे तो झीरागांव और टेकलागुडेम गांव पूरी तरह से खाली थे। एक भी व्यक्ति गांव में नहीं था। अगर अनुभवी अधिकारी होता तो वह उसी जगह पर साजिश समझ जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जवानों का जत्था खाली गांव पार कर उस जगह तक पहुंचा, जहां की टिप खुद नक्सलियों ने उनको भिजवाई थी। जाहिर है वहां कोई नहीं था। जब जवान लौटने लगे तो नक्सलियों ने गुरिल्ला स्टाइल में उन्हें ऐसी जगह घेरा, जहां से बच कर जाने का रास्ता नहीं था। न तो सुरक्षा बलों का अभियान गोपनीय रहा और न उनकी मूवमेंट को गोपनीय रखा गया। यहां तक कि वार रूम से मोनिटर कर रहे अधिकारियों को यह भी पता नहीं था कि जवान किस जगह पर जा रहे हैं। इसका भी पता बाद में चला कि मुठभेड़ की जगह सुरक्षा बलों के कैंप से आधे घंटे की दूरी पर थी, जहां अगले दिन पत्रकार बड़ी सहजता से पहुंच गए पर रेस्क्यू टीम को पहुंचने में कई घंटे लग गए। इससे पता चलता है कि कितनी लापरवाही और गैर जिम्मेदारी के साथ यह पूरा अभियान प्लान किया गया था!

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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