अनपढ़ बनाए रखने की साजिश!

नई शिक्षा नीति में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई है कि कक्षा पांच तक मातृभाषा या स्थानीय भाषा में बच्चों को पढ़ाया जाए। यानी शिक्षा की माध्यम भाषा बच्चों की मातृभाषा हो या स्थानीय भाषा हो। यह कोई नई बात नहीं है। आजादी के बाद बहुत समय तक भाषा विद्यालय होते थे, जहां स्थानीय या मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई होती थी। आमतौर पर स्कूलों में पांचवीं के बाद ही अंग्रेजी भाषा की पढ़ाई शुरू होती थी। पर धीरे धीरे भाषा विद्यालय या सरकारी स्कूल कमजोर होते गए और उनकी कीमत पर निजी स्कूलों को फलने-फूलने दिया गया, जहां अंग्रेजी माध्यम से बच्चों को पढ़ाया जाता था। इसका नतीजा यह हुआ है कि निजी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों से पढ़े बच्चे आगे निकलते गए और उसी अनुपात में भाषा विद्यालयों या सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे पिछड़ते गए।

अब भी नई शिक्षा नीति में भाषा को लेकर जो प्रस्ताव है वह असल में देश की बड़ी आबादी को अनपढ़ बनाए रखने की साजिश का हिस्सा है। सबसे पहले तो समस्या यह है कि सरकार ने इस मामले में कुछ भी स्पष्ट नहीं किया है कि मातृभाषा या स्थानीय भाषा का क्या मतलब है? अगर किसी बच्चे की मातृभाषा और स्थानीय भाषा अलग-अलग हुई तो क्या होगा? अगर किसी बच्चे के माता-पिता अलग-अलग भाषा वाले हैं तो उस बच्चे की मातृभाषा क्या मानी जाएगी? अगर माता-पिता अलग अलग प्रांत के हुए तो उसके लिए स्थानीय या मातृभाषा क्या होगी? नौकरियों में जिन लोगों के तबादले होते रहते हैं उनके बच्चे किस भाषा में शिक्षा ग्रहण करेंगे? प्रवासी मजदूरों के बच्चे किस भाषा में पढ़ाई करेंगे? भारत जैसी भाषायी विविधता वाले देश में यह बिल्कुल संभव है कि किसी बच्चे की मातृभाषा अलग हो और वह जहां रहता है वहां की स्थानीय भाषा अलग हो, ऐसे में वह बच्चा किस भाषा में पढ़ाई करेगा? इन सवालों के जवाब मिलने पर ही शिक्षा की माध्यम भाषा के बारे में ठोस विचार हो सकता है।

दूसरी समस्या यह है कि आजादी के बाद से पिछले 73 वर्षों में हिंदी या किसी भी भाषा में अध्ययन सामग्री नहीं के बराबर तैयार की गई है। हिंदी और सारी स्थानीय भाषाएं सिर्फ साहित्य की भाषा बन कर रह गई हैं। हालांकि उसमें भी साहित्य क्या रचा जा रहा है वह भगवान ही जानते हैं। पर अलग अलग विधाओं या अनुशासनों की अध्ययन सामग्री भारत की स्थानीय भाषाओं में नहीं तैयार की गई। भारत की स्थानीय भाषाएं ज्ञान-विज्ञान की भाषा नहीं बन सकीं। विज्ञान से लेकर दर्शनशास्त्र, राजनीति, इतिहास या किसी भी दूसरे विषय की स्तरीय सामग्री स्थानीय भाषाओं में नहीं मिलेगी। सो, अंततः जिनको भी उच्च या तकनीकी शिक्षा हासिल करनी है उनके लिए माध्यम भाषा अंग्रेजी ही होगी, कम से कम तब तक जब तक स्थानीय भाषाओं में स्तरीय अध्ययन सामग्री तैयार नहीं हो जाती है।

अब यहां यह तुलना करें कि कुछ बच्चे पांचवीं तक या सरकार की योजना के हिसाब से आठवीं तक मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाई करेंगे और कुछ बच्चे बिल्कुल शुरू से अंग्रेजी भाषा में पढ़ाई करेंगे तो आठवीं के बाद उनके बीच क्या कोई मुकाबला रह जाएगा? शुरू से अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई करने वाले बच्चे आगे निकलते चले जाएंगे और मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाई करने वाले बच्चे या तो स्कूल छोड़ेंगे या घसीट घसीट कर डिग्री हासिल कर लेंगे। उनके लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा के मौजूदा दौर में मजदूरी करने के सिवा कोई काम नहीं बचेगा।

ऐसा इसलिए है क्योंकि नई शिक्षा नीति में शिक्षा की माध्यम भाषा को लेकर जो कहा गया है उसे अनिवार्य नहीं बनाया गया है। राज्यों को और स्कूलों को तय करना है कि वे किस भाषा में बच्चों को पढ़ाएंगे। भारत सरकार ने खुद तय कर लिया है कि उसके केंद्रीय विद्यालयों में पहले की तरह हिंदी और अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाई होगी। जाहिर है, जब अनिवार्यता नहीं है तो अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल क्यों पढ़ाई की माध्यम भाषा बदलेंगे? जब शिक्षा की माध्यम भाषा के प्रावधान को अनिवार्य नहीं किया गया है तो यह सिर्फ दो-चार दिन की सुर्खियां बनवाने का प्रयास लगता है। बाकी सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहेगा।

माध्यम भाषा के अलावा दूसरी बड़ी बात यह बताई जा रही है कि छठी क्लास से ही बच्चों का कौशल विकास किया जाएगा यानी उनकी वोकेशनल ट्रेनिंग होगी। सबसे पहला सवाल तो यहीं है कि छठी क्लास के बच्चे को, जिसकी उम्र 10 साल के करीब होगी, उसमें पाठ्यक्रम से अलग क्या कौशल विकसित किया जा सकता है? खेल-कूद और संगीत इससे अलग हैं। सो, उनको क्या प्लंबरिंग, कारपेंटरी, इलेक्ट्रिशियन, मैकेनिक आदि का कोर्स कराया जाएगा? इससे वास्तव में क्या हासिल होगा? छठी क्लास का बच्चा स्कूल में ये सब चीजें सीख कर इनमें दक्ष तो हो नहीं सकता है। हां, उसके दिमाग में यह बात जरूर बैठेगी कि उसे आगे चल कर ये ही काम करना है। यह अंततः ड्रॉपआउट को बढ़ावा देगा। बच्चों के स्कूल छोड़ने या ऐसे ही छोटे-छोटे कामों की ओर मुखातिब होने का चलन बढ़ेगा। यह भी एक बड़ी जमात को अनपढ़ बनाए रखने की साजिश का ही हिस्सा लगता है।

इसको बाल मजदूरी न भी कहें, जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं तब भी यह तो कहा ही जा सकता है कि छठी क्लास से ही स्कूलों को मजदूर पैदा करने की फैक्टरी बनाने का प्रयास हो रहा है। नई शिक्षा नीति के मसौदे में इसे ‘फन च्वाइस’ कहा गया है यानी बच्चे खेल-खेल में ये सब चीजें सीखेंगे लेकिन उसी में आगे ‘लोकल स्किलिंग नीड’ यानी स्थानीय जरूरत के हिसाब से कौशल विकसित करने की जरूरत का जिक्र किया गया है। अगर स्कूलों को मजदूर पैदा करने की फैक्टरी नहीं बनानी है तो स्थानीय जरूरत के हिसाब से कौशल विकास करना क्यों जरूरी है? कोई ऐसा कौशल क्यों नहीं विकसित किया जाए, जिसकी स्थानीय स्तर पर कोई जरूरत न हो?

सो, कहा जा सकता है कि मातृभाषा या स्थानीय भाषा को शिक्षा की माध्यम भाषा बनाने का विचार या वोकेशनल क्लासेज का विचार न तो नया है, न क्रांतिकारी है और न बहुत उपयोगी है। यह देश के एक बड़े हिस्से को अनपढ़ बनाए रखने की साजिश है। अगर नई शिक्षा नीति के मुताबिक ही कानून बने तो यह तय मानें कि गरीब, वंचित, आदिवासी, पिछड़े समूहों के बच्चे उसी हालत में रहेंगे, जिस हालत में आज हैं। यह शिक्षा नीति उनके किसी काम नहीं आएगी। अगर सरकार सचमुच उनकी स्थिति में बदलाव चाहती है तो हिम्मत करके अंग्रेजी पर रोक लगाए और किसी एक या ज्यादा से ज्यादा दो भारतीय भाषा को अनिवार्य करते हुए उसमें पढ़ाई  कराए, उन भाषाओं में अध्ययन सामग्री तैयार कराए और साथ ही अध्यापक शिक्षण और प्रशिक्षण की अच्छी व्यवस्था करे।

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