nayaindia New threat to the right to privacy निजता के अधिकार पर नया खतरा
kishori-yojna
बेबाक विचार | नब्ज पर हाथ| नया इंडिया| New threat to the right to privacy निजता के अधिकार पर नया खतरा

निजता के अधिकार पर नया खतरा

bio samples of accused

क्रिमिनल प्रोसिजर (आईडेंटिफिकेशन) बिल, 2022 संसद के दोनों सदनों से पास हो गया है और इसका कानून बन कर लागू होना महज वक्त की बात है। यह नया कानून 102 साल पुराने आइडेंटिफिकेशन ऑफ प्रिजनर एक्ट 1920 की जगह लेगा। नया कानून पुलिस के हाथ में असीमित अधिकार देता है और निजता के अधिकार पर नए खतरे पैदा करता है। कायदे से जो कानून 102 साल पुराने कानून को बदलने के लिए लाया जा रहा था उस पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए थी और सहमति बनानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा लग रहा है कि यह सरकार किसी भी कानून के ऊपर संसद में सहमति बनाने को अपना अपमान मानती है। अन्यथा ऐसी क्या जल्दी थी, जो सरकार ने आनन-फानन में बिल पेश करके उसे पास कराया? बिल को संसदीय समिति में भेजने की मांग मान ली जाती तो उससे क्या बिगड़ रहा था? जो कानून 102 साल से चल रहा था वह तीन-चार महीने और चल सकता था। उसे 10 दिन में नहीं बदला जाता तो कोई आफत नहीं आ रही थी। लेकिन अपनी धमक और विपक्ष को उसकी हैसियत दिखाने के लिए बिल 10 दिन में पास कराया गया।

यह कानून संविधान की मूल भावना के विरूद्ध है, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन करता है और न्याय के बुनियादी सिद्धातों के खिलाफ है। न्याय का बुनियादी सिद्धांत यह है कि जब तक कोई दोषी साबित नहीं होता तब तक उसे बेकसूर माना जाता है। फिर किसी बेकसूर आदमी की उसकी मर्जी के बगैर बायोमेट्रिक पहचान हासिल करने का अधिकार पुलिस को कैसे दिया जा सकता है? कोई भी सरकार संदिग्ध या आरोपी और दोषी का फर्क कैसे खत्म कर सकती है? पुलिस अगर संदेह के आधार पर किसी को हिरासत में लेती है तो उसकी बायोमेट्रिक पहचान लेने की इजाजत पुलिस को नहीं दी जा सकती।

विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता आए दिन धरना-प्रदर्शन करते हैं और धारा 144 का उल्लंघन करते हैं, जिसके आरोप में पुलिस उनको हिरासत में लेती है। क्या पुलिस हिरासत में लिए गए सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं की उंगलियों और पैरों के निशान लेगी, उनकी लंबाई मापेगी और वजन करेगी, उनका ब्लड ग्रुप दर्ज करेगी, उनकी आंखों की पुतलियों को स्कैन करेगी और उनके डीएनए का सैंपल लेगी, उनका पोलिग्राफ टेस्ट करेगी और ब्रेन मैपिंग करेगी? नया कानून लागू होने के बाद पुलिस सिर्फ जेल में बंद विचाराधीन कैदियों या अपराधियों का नहीं, बल्कि संदेह के आधार पर हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति का ऐसा डाटा हासिल कर सकेगी।

हैरानी की बात है कि किसी भी व्यक्ति की सहमति के बगैर इस तरह का डाटा हासिल करने को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध ठहराया हुआ है। सेल्वी बनाम कर्नाटक सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में इस मसले पर बहुत विस्तार से फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में नार्को एनालिसिस, पोलिग्राफ टेस्ट और ब्रेन मैपिंग को लेकर कहा था कि किसी भी व्यक्ति की बिना सहमति के इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल उसकी निजता का उल्लंघन है। अदालत ने यह भी कहा है कि चाहे आपराधिक मामले की जांच हो या कोई और मामला हो, इन तकनीकों का इस्तेमाल किसी भी व्यक्ति पर नहीं किया जा सकता है। बहस के लिए कहा जा सकता है कि नए कानूनों में इन तकनीकों के इस्तेमाल की बात नहीं कही गई है, लेकिन यह भी सही है कि इन तकनीकों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, यह भी नहीं कहा गया है। इस कानून की धारा दो (1) (बी) में साफ कहा गया है कि पुलिस और जेल अधिकारी माप और जैविक सैंपल आदि ले सकेंगे। इसका मतलब है कि सब कुछ पुलिस की मर्जी पर छोड़ा गया है कि वह जो भी बायोमेट्रिक डाटा हासिल करना चाहे वह हासिल कर सकती है।

सरकार कह रही है कि उसका इरादा कानून का दुरुपयोग करने का नहीं है। सोचें, कौन सी सरकार किस कानून के बारे में कहती है कि दुरुपयोग करने के लिए कानून बनाया जा रहा है? सारे कानून जनता की भलाई के लिए ही बनाए जाते हैं। लेकिन सवाल है कि ऐसा कानून क्यों बनाना, जिसके अंदर उसके दुरुपयोग की पूरी संभावना मौजूद हो? सरकार और ससंद दोनों की जिम्मेदारी होती है कि कानून के हर पहलू पर गंभीरता से विचार हो और उसके दुरुपयोग की संभावना को यथासंभव खत्म किया जाए। लेकिन इस कानून के मामले में यह भी नहीं किया गया।

सरकार ने 28 मार्च को बिल पेश किया, जिसे चार अप्रैल को लोकसभा में और छह अप्रैल को राज्यसभा से पास करा लिया गया। विपक्ष इसे संसदीय समिति में भेजने की मांग करता रहा लेकिन सरकार ने उस पर ध्यान नहीं दिया। सरकार की ओर से कहा गया कि कानून सौ साल पुराना हो गया है और अपराध रोकने के लिए कानून के अंदर नई तकनीक का प्रावधान किया जाना जरूरी है। इससे किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है कि पुराने कानूनों में सुधार हो और जहां अपराध रोकने में तकनीक कारगर हो वहां उनका इस्तेमाल भी हो। लेकिन किसी सरकारी एजेंसी को नागरिकों के खिलाफ तकनीक के मनमाने इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जा सकती।

एक अजीब सा तर्क आजकल भारत में दिया जाने लगा है, जो इस कानून के मामले में भी दिया गया कि इस तरह की व्यवस्था अमेरिका और ब्रिटेन में भी है। सोचें, क्या ऐसे तर्क से इस कानून को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है? अमेरिका में नागरिकों की सुरक्षा, उनकी निजता की रक्षा और मानवाधिकारों को लेकर बहुत सख्त कानून हैं। कोई भी एजेंसी उसमें दखलंदाजी नहीं कर सकती है। दूसरे, अमेरिका में डाटा की गोपनीयता और उसकी सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था है। भारत में डाटा की गोपनीयता और उसकी सुरक्षा की क्या व्यवस्था है? कितनी बार इस लचर व्यवस्था की पोल खुल चुकी है। आधार का डाटा बाजार में बिकने की कितनी बार खबरें आई हैं। ऐसे में सोचा जा सकता है कि संदेह के आधार पर हिरासत में लिए गए आरोपी या जेल में बंद लाखों-करोड़ों विचाराधीन कैदियों के बायोमेट्रिक डाटा के साथ क्या हो सकता है। इससे अपराध रोकने में कितनी मदद मिलेगी यह नहीं कहा जा सकता है लेकिन यह तय दिख रहा है कि इस कानून का दुरुपयोग आम लोगों के खिलाफ खुलेआम हो सकता है। इसका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए भी हो सकता है। यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 तीनों के खिलाफ है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सरासर उल्लंघन है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

4 − four =

kishori-yojna
kishori-yojna
ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
सुरक्षा चूक के कारण रूकी राहुल की यात्रा
सुरक्षा चूक के कारण रूकी राहुल की यात्रा