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जोकोविच कोई नायक नहीं

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दुनिया के नंबर एक पुरुष टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच ने ऑस्ट्रेलिया में प्रवेश को लेकर छह जनवरी से चल रही अदालती लड़ाई जीत ली है। मेलबर्न की एक अदालत ने जोकोविच को डिटेंशन सेंटर से रिलीज करने का आदेश दिया और उनका वीजा भी बहाल कर दिया। इस फैसले को अनिवार्य वैक्सीनेशन के खिलाफ एक बड़ी जीत बताया जा रहा है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? क्या जोकोविच सचमुच अनिवार्य वैक्सीनेशन के खिलाफ किसी वैश्विक लड़ाई का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और वे इस वैश्विक जंग के नायक बन कर उभरे हैं? ऐसा नहीं है। असल में अनिवार्य वैक्सीनेशन का विरोध करने वाले लोगों का एक समूह, खुद जोकोविच, उनके पिता और सर्बिया के लोग इस लड़ाई को वैक्सीनेशन के खिलाफ वैश्विक जंग की तरह पेश कर रहे हैं। novak djokovic controversy covid

वैक्सीनेशन को लेकर जोकोविच की खुद की राय बहुत स्पष्ट नहीं है। उन्होंने 19 अप्रैल 2020 को एक दूसरे पुरुष टेनिस खिलाड़ी एंडी मरे के साथ ऑनलाइन चैट में कहा था, ‘निजी तौर पर मैं वैक्सीनेशन के खिलाफ हूं और मैं नहीं चाहूंगा कि कोई मुझे इस बात के लिए बाध्य करे कि मुझे यात्रा करनी है तो वैक्सीन लेनी होगी’। उन्होंने आगे कहा, ‘लेकिन अगर यह अनिवार्य हो गया तो क्या होगा? फिर मुझे फैसला करना होगा। इस बारे में मेरे अपने विचार हैं। आगे ये विचार बदल जाएंगे या नहीं, मैं नहीं जानता’। इसके दो महीने बाद जोकोविच ने विवादित ‘एड्रिया टूर’ शुरू किया, जिसमें बेलग्रेड, सर्बिया, क्रोएशिया में प्रदर्शनी टेनिस मैचों का आयोजन हुआ। इसमें कोविड-19 को लेकर जारी किए गए किसी भी दिशा-निर्देश का पालन नहीं किया गया। जब उस बड़े आयोजन में खिलाड़ियों और उनके साथियों के बीच कोरोना फैलने लगा तो उसे समय से पहले खत्म करना पड़ा। इसके बाद 23 जून 2020 को खुद जोकोविच ने पुष्टि करते हुए कहा कि वे कोरोना संक्रमित हो गए हैं।

उसी साल अगस्त में जब यूएस ओपन शुरू हुआ तो जोकोविच ने वैक्सीन के बारे में अपने विचार और खुल कर बताए। उन्होंने ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ को दिए एक इंटरव्यू में ‘माई बॉडी, माई च्वाइस’ का सिद्धांत पेश किया और कहा कि वे किसी तरह की वैक्सीनेशन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन अगर ‘कोई मेरे शरीर में मेरी मर्जी के खिलाफ कुछ डालना चाहता है तो उससे मेरा विरोध है’। ध्यान रहे उस समय तक कोई भी वैक्सीन तैयार नहीं हुई थी और इसलिए अनिवार्य या स्वैच्छिक वैक्सीनेशन का कोई कानून नहीं बना था। लेकिन तभी जोकोविच ने अपनी राय जाहिर कर दी थी। वैसे तो वे कई चीजों पर अपनी राय जाहिर करते रहते हैं, जैसे दूसरे खिलाड़ी, अभिनेता आदि करते हैं। ऐसी राय कई बार मूर्खतापूर्ण भी होती है। जैसे जोकोविच जब कोरोना की पहली लहर में घर में बैठे तो तब मई 2020 में एक वेलनेस गुरू चेरविन ज्योफ्री के साथ इंस्टाग्राम लाइव में कहा था कि ‘संक्रमित पानी सकारात्मक भावनाओं से शुद्ध किया जा सकता है’।

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बहरहाल, यह एक अवांतर प्रसंग है। उनके धार्मिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक विचार अपनी जगह हैं। लेकिन वैक्सीन को लेकर वे जो विचार जाहिर करते रहे हैं और उसे लेकर पूरी दुनिया में एक खास समूह जो यूफोरिया पैदा कर रहा है वह न तो तर्कसंगत है और न वैज्ञानिक है। ‘माई बॉडी माई च्वाइस’ सिद्धांत रूप में एक बहुत अच्छी बात है, जैसे और भी कई सिद्धांत हैं। लेकिन हर सिद्धांत के कुछ अपवाद होते हैं और हर अच्छा सिद्धांत कुछ नियम-कायदों के अधीन होता है तभी अच्छा होता है। कोई भी आजादी असीमित नहीं हो सकती है। असीमित आजादी अराजकता को जन्म दे सकती है। यह सही है कि नोवाक जोकोविच का अपने शरीर पर अधिकार है और कोई भी उनकी मर्जी के बगैर उनके शरीर में कोई चीज नहीं डाल सकता है। लेकिन अगर उनका शरीर संक्रमित होता है तो निश्चित रूप से उन्हें दूसरों को संक्रमित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। यह उनका अधिकार नहीं हो सकता है कि वे अपने संक्रमित शरीर से दूसरों को संक्रमित करें क्योंकि यह दूसरे लोगों के अधिकार का उल्लंघन होगा। सोचें, अगर ‘माई बॉडी, माई च्वाइस’ के सिद्धांत का हवाला देकर आत्मघाती हमलावर, फिदायीन अपनी आतंकी गतिविधियों को दार्शनिक रूप देने लगें तो क्या होगा?

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यह भी समझना जरूरी है कि वे किस आधार पर ऑस्ट्रेलिया की अदालत में जंग जीते हैं। ऐसा नहीं है कि मेलबर्न की अदालत ने यह स्वीकार कर लिया कि उन्होंने वैक्सीन की कोई डोज नहीं लगवाई है तब भी कोई बात नहीं है वे ऑस्ट्रेलिया में रह सकते हैं और टेनिस खेल सकते हैं। नोवाक जोकोविच के वकीलों ने बहुत साधारण दलील दी और कहा कि जोकोविच को पिछले महीने कोराना का संक्रमण हुआ था, जिसके सबूत उनके पास हैं इसलिए उनको वैक्सीनेशन का सबूत देने की जरूरत नहीं है। यह अपने आप में पर्याप्त है। क्योंकि दुनिया में हर जगह यह नियम है कि कोरोना संक्रमित व्यक्ति को संक्रमण से मुक्त होने के एक निश्चित समय के बाद ही टीका लगाया जाएगा। यह भी प्रमाणित तथ्य है कि संक्रमण के बाद बनने वाली प्राकृतिक इम्यूनिटी वैक्सीन से बनने वाली इम्यूनिटी से ज्यादा मजबूत और टिकाऊ है। सो, इस आधार पर जोकोविच को ऑस्ट्रेलिया में रूकने की इजाजत मिल गई। इस बात को ऐसे प्रचारित किया जा रहा है, जैसे ऑस्ट्रेलिया की अदालत ने अनिवार्य वैक्सीनेशन के सिद्धांत को खारिज कर दिया या यह मान लिया कि बिना वैक्सीनेशन के भी कोई उस देश में रह सकता है। ऐसा नहीं है। ऑस्ट्रेलिया की अदालत ने अपने देश में वैक्सीनेशन से छूट के लिए निर्धारित किए गए कई मानकों में से एक मानक को पूरा करने के आधार पर नोवाक को छूट दी है।

अब सवाल है कि मेलबर्न के अधिकारियों ने इस आधार पर पहले क्यों नहीं मंजूरी दे दी? या पहले क्यों उनको डिटेंशन सेंटर में डाला गया? ऐसा इसलिए क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में संघीय और प्रांतीय व्यवस्थाएं एक दूसरे से स्वतंत्र होती हैं और उन्हें बहुत ज्यादा स्वायत्तता हासिल होती है। जहां तक मेलबर्न का सवाल है तो वहां के नियम सर्वाधिक सख्त हैं। तभी कहा जाता है को कई न्यूयॉर्क से पर्थ पहुंच सकता है लेकिन पर्थ से मेलबर्न जाना मुश्किल है। ऐसे ही कानूनों की वजह से ऑस्ट्रेलिया के लोगों को सबसे लंबे और सख्त लॉकडाउन में रहना पड़ा। उस देश ने अपने ही लोगों का लौटना बंद करा दिया था। नोवाक जोकोविच का मामला भी उसी का एक हिस्सा है। यह टेनिस ऑस्ट्रेलिया, कैनेबरा की संघीय सरकार और मेलबर्न की विक्टोरियन सरकार की खींचतान और लालफीताशाही का मामला है, जिसे नोवाक के वैक्सीनेशन से जुड़े विचारों के साथ मिला कर एक वैश्विक मामला बनाया जा रहा है।

कायदे से कोरोना की भीषण महामारी के समय में जोकोविच जैसे खिलाड़ियों को अपने निजी राग-द्वेष अलग रख कर लोगों में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करना चाहिए और ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए, जिससे लोगों में भ्रम पैदा हो। लेकिन अफसोस की बात है कि जोकोविच ने अपनी अतार्किक सोच का ज्यादा प्रचार किया। तभी उनका ऑस्ट्रेलिया में अदालती जंग जीतना कोई वैश्विक या मानवता की उपलब्धि नहीं है। यह उनकी निजी उपलब्धि है। वे अब ऑस्ट्रेलिया में रूक सकते हैं, ऑस्ट्रेलियन ओपन में हिस्सा ले सकते हैं और हो सकता है कि अपना 21वां ग्रैंड स्लैम भी जीत जाएं और दुनिया के सर्वकालिक टेनिस खिलाड़ी बन जाएं। लेकिन यह भी उनकी निजी उपलब्धि होगी। नोवाक टेनिस इतिहास के सबसे गिफ्टेड यानी सर्वाधिक स्वाभाविक प्रतिभा वाले खिलाड़ी हैं, लेकिन रोजर फेडरर टेनिस के खेल और खेल के सिद्धांत का बेहतर प्रतिनिधित्व करते हैं। नोवाक के विवाद पर उनका कहना था कि ‘यह विवाद ही नहीं होता, अगर नोवाक ने वैक्सीन ले ली होती’। उन्होंने कहा ‘एक बात स्पष्ट है कि अगर आपने यह कर लिया होता तो आपको यहां खेलने में कोई परेशानी नहीं होती’। कम से कम कोरोना वैक्सीन के मामले में दुनिया को फेडरर को सुनना चाहिए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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