कृषि कानूनों पर अब आगे क्या?

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों और किसान आंदोलन में अब आगे क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने चार लोगों की एक कमेटी बना दी है, जिसे किसानों की शिकायतें सुननी हैं और संभव है कि सरकार को भी इसमें अपना पक्ष रखने का मौका मिले। आठ हफ्ते में कमेटी को अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपनी है। सवाल है कि अगर किसान इस कमेटी के सामने नहीं जाते हैं, जैसा कि उन्होंने ऐलान किया है तो फिर क्या होगा? क्या कमेटी सिर्फ सरकार का पक्ष सुन कर अदालत को रिपोर्ट दे देगी और अदालत उस पर कोई फैसला सुना देगी? वैसे भी कमेटी के सारे सदस्य अपना फैसला पहले ही जाहिर कर चुके हैं। चारों सदस्यों ने किसी न किसी मंच पर कृषि कानूनों की तरफदारी की है, इन्हें किसानों के लिए फायदेमंद ठहराया है और इन्हें वापस लेने का विरोध किया है। अब ऐसा तो है नहीं कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से पंच परमेश्वर बनाए दिए जाने के बाद उनकी अंतरात्मा जग जाएगी और वे अचानक दूसरी बात करने लगेंगे। इसलिए सबको मालूम है कि वे अपनी रिपोर्ट में क्या लिखेंगे!

बहरहाल, किसान कमेटी के सामने जाएं या नहीं जाएं, सुप्रीम कोर्ट उन्हें इसके लिए मजबूर नहीं कर सकता है। इसी मामले की सुनवाई में खुद चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने कहा है कि ‘अगर किसान बेमियादी आंदोलन करना चाहते हैं करें, लेकिन जो भी व्यक्ति मसले का हल चाहेगा वह कमेटी के पास जाएगा’। इसका मतलब है कि किसान अगर सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी के जरिए समाधान नहीं चाहते हैं तो वे कमेटी के सामने नहीं जाने और अपना बेमियादी आंदोलन जारी रखने के लिए स्वतंत्र हैं। ध्यान रहे चीफ जस्टिस ने यह भी कहा है कि किसानों को शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार संविधान से मिला है और अदालत उसमें कई रोक-टोक नहीं करेगी। सो, अगर किसान कमेटी के सामने नहीं गए और आंदोलन जारी रखा तो अदालत क्या करेगी?

असल में देश की सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में केंद्र के बनाए कानूनों की संवैधानिक वैधता की जांच करने की बजाय खुद को मध्यस्थ बना कर एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी है। सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक अदालत है और उसे शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत से न्यायिक समीक्षा का जो अधिकार मिला हुआ है वह संसद या विधानसभाओं के बनाए कानूनों की संवैधानिकता और उसके न्यायिक पहलुओं की जांच के लिए है। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने केंद्र सरकार के ‘सेंट्रल विस्टा’ प्रोजेक्ट से जुड़े मामले में यह बात दोहराई थी। जजों ने कहा था कि सरकार के नीति बनाने के अधिकार में दखल देने की अदालत की कोई मंशा नहीं है, यह विशुद्ध रूप से संसद का काम है। लेकिन अब वहीं अदालत कानूनों की न्यायिक समीक्षा और व्याख्या की बजाय उन कानूनों से पैदा हुई स्थितियों में मध्यस्थ या उसे प्रभावित करने वाले की भूमिका में आ गई है।

ध्यान रहे सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार की ओर से इसकी संवैधानिक वैधता का मुद्दा उठाया गया पर अदालत ने उस पर ध्यान देने की बजाय किसानों के आंदोलन पर फोकस किया। यह समझना मुश्किल है कि कानूनों की संवैधानिक वैधता जांचने की बजाय किसानों का आंदोलन अदालत के लिए इतनी चिंता का कारण क्यों है? यह भी कम हैरान करने वाली बात नहीं है कि अदालत ने कानूनों की संवैधानिकता पर कोई भी दलील सुने बगैर इसके अमल पर रोक लगा दी। यह पहली बार हुआ है कि सर्वोच्च अदालत ने संसद के बनाए किसी कानून के अमल पर बिना किसी सुनवाई के रोक लगाई है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि वह इतनी असहाय नहीं है कि सरकार के बनाए कानून पर रोक नहीं लगा सके। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार के बनाए किसी भी कानून पर रोक लगाना सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है पर खुद सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच पहले एक मामले में कह चुकी है कि जब तक कानून में किसी असंवैधानिकता का पता नहीं चलता है तब तक उस पर अंतरिम रोक नहीं लगाई जा सकती है। सवाल है कि बिना सुनवाई के असंवैधानिकता का पता कैसे चलेगा?

यह भी हैरान करने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के बनाए कानूनों की संवैधानिकता पर विचार किए बगैर, सरकार के वकीलों की दलील सुने बगैर रोक लगा दी और सरकार खुश है! सरकार के वकीलों ने इस पर सवाल नहीं उठाए और न अदालत के सामने इसका विरोध किया और न इस बात पर जोर दिया कि कानूनों पर रोक से पहले इसके संवैधानिक पहलुओं की समीक्षा की जाए। उलटे सरकार के वकील भी किसान आंदोलन से लोगों को हो रही मुश्किलों और इसमें कथित तौर पर खालिस्तानी तत्वों के शामिल होने का मुद्दा उठाते रहे। तभी सवाल उठता है कि क्या सरकार भी चाहती थी कि अदालत ऐसा कोई फैसला दे, जिससे किसान आंदोलन को खत्म करने या कमजोर करने का मौका बने? अगर ऐसा है तो यह और भी चिंता की बात है क्योंकि इससे एक नई नजीर स्थापित होती है। इससे यह मैसेज बनता कि सरकार को बतौर कार्यपालिका, जो जिम्मेदारी निभानी थी वह अदालत ने निभाई है।

इस तरह अदालत ने संविधान में की गई शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत की अवहेलना की है और यह मैसेज दिया है कि अगर सरकारें किसी कार्यकारी विवाद का निपटारा नहीं कर पाती हैं तो उसे अदालती तरीके से निपटाया जा सकता है। इसके लिए अदालत ने संविधान के संरक्षण वाली भूमिका छोड़ कर मध्यस्थ वाली भूमिका अपनाई। पर उसमें भी ऐसा लग रहा है कि अदालत ने मध्यस्थता के सबसे बुनियादी सिद्धांत की अनदेखी की है। मध्यस्थता का सबसे बुनियादी सिद्धांत यह है कि जिस मुद्दे का निपटारा होना है उसमें शामिल सभी पक्ष मध्यस्थता के लिए सहमत हों। उनकी इस सहमति के बाद ही मध्यस्थों की नियुक्ति होती है। पर यहां तो किसान पहले से ही मध्यस्थता से इनकार कर रहे थे। उन्होंने कमेटी बनाने के केंद्र सरकार के सुझाव को भी ठुकराया था और अदालत से भी कह दिया था कि कमेटी उनको मंजूर नहीं है। उनका विवाद सरकार से है और वे समाधान भी सरकार से ही हासिल करेंगे। जब किसान संगठन मध्यस्थता के लिए तैयार नहीं थे तो मामला वहीं खत्म हो जाना चाहिए था। पर अदालत ने उनकी सहमति के बगैर चार सदस्यों की कमेटी बना दी। कमेटी के सदस्यों के नामों पर भी सहमति बनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ। तभी कमेटी बनते ही किसानों ने इसे खारिज कर दिया। उन्होंने दो टूक कहा कि यह सरकारी कमेटी है और इसके सारे सदस्य पहले ही कानूनों का समर्थन करते रहे हैं।

कृषि कानूनों और किसान आंदोलन के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने जो पहल की है उससे कई चिंताएं पैदा हुई हैं। नंबर एक चिंता तो यह है कि अदालत ने केंद्र के बनाए कानूनों की संवैधानिकता पर विचार किए बगैर उस पर रोक लगाई है। इससे नई नजीर बनेगी, जो स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। दूसरे, अदालत ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत की अनदेखी करके कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखल दिया है। तीसरे, संविधान के संरक्षक की भूमिका छोड़ कर किसी विवाद को निपटाने के लिए मध्यस्थता की पहल की है। चौथे, अदालत ने अपने न्यायिक समीक्षा के अधिकार का कम से कम एक हिस्सा दूसरे पक्ष यानी मध्यस्थों की कमेटी के सुपुर्द किया है और पांचवें, जाने-अनजाने में उसने एक ऐतिहासिक जन आंदोलन को प्रभावित करने का प्रयास किया है।

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