सत्ता, समाज में जातिवाद का जहर!

उत्तर प्रदेश के गैंगेस्टर विकास दुबे प्रकरण ने राजनीति, प्रशासन और अपराधियों के गठजोड़ की भारत की उस ऐतिहासिक समस्या को जगजाहिर कर दिया है, जो जानते सब हैं और जो पहले भी सामने आती रही है पर जिसे तत्काल किसी न किसी तरीके से दबा-छिपा दिया जाता है। इस बार भी जितनी तेजी से घटनाक्रम बदले हैं और जैसे आनन-फानन में इस पूरे मामले को अंत परिणति तक पहुंचाने का प्रयास चल रहा है उसे देख कर ऐसा लग रहा है कि बहुत जल्दी ही यह घटना भी इतिहास बन जाएगी। लोग इसे भी वैसे ही भूल जाएंगे, जैसे पहले के गैंगवार, उनमें पुलिस की मिलीभगत, प्रशासन की लापरवाही और राजनीति की संलिप्तता को भुला दिया गया।

उत्तर प्रदेश में पिछले दो हफ्ते में जो हुआ है उसके बीज बिहार और उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों में छिपे हैं। इन राज्यों में अपराधी किसी तरह से राज्य की ‘सोशल पोलिटिकल पॉवर स्ट्रक्चर’ का अनिवार्य हिस्सा बन जाते हैं। अपनी जातियों के कारण उनकी एक खास सामाजिक पहचान होती है, जिससे उनकी राजनीतिक पहचान बनती है और बतौर गैंगेस्टर उनका कद घटता-बढ़ता है। सामाजिक रूप से मजबूत और राजनीतिक रूप से सत्ता संभालने वाली जातियों के अपराधियों का फलना-फूलना एक स्थापित नियम है। बिहार में लालू प्रसाद के समय क्या हुआ या उत्तर प्रदेश में मुलायम-अखिलेश के राज में क्या हुआ और नीतीश कुमार के राज में बिहार में क्या हुआ या मायावती और भाजपा के राज में उत्तर प्रदेश में क्या हुआ यह जानने-समझने के लिए बहुत बड़ी बौद्धिकता की जरूरत नहीं है। जाट मुख्यमंत्री होने पर क्या होता है और ठाकुर मुख्यमंत्री बनता है तो क्या होता है यह हरियाणा से लेकर राजस्थान तक की राजनीति में खूब देखा गया है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि किसी बड़े बौद्धिक, सामाजिक या राजनीतिक आईकॉन की अनुपस्थिति में जातियां अब अपनी पहचान अधिकारियों और विधायकों-सांसदों के साथ साथ गुंडों और अपराधियों से भी जोड़ने लगी हैं। बिहार के पुलिस प्रमुख गुप्तेश्वर पांडेय ने पिछले दिनों बहुत कायदे से इस बात को एक वीडियो के जरिए बताया था। उन्होंने कहा था लोग पहले अपराधियों को अपनी जाति का नेता बनाते हैं, उनसे अपनी पहचान जोड़ते हैं, उनकी जय-जयकार करते हैं और बाद में पुलिस से उम्मीद करते हैं कि वह उनके खिलाफ कार्रवाई करे। यह भारतीय समाज में मौजूदा समय की ऐसी हकीकत है, जो विकास दुबे प्रकरण में बहुत अश्लील तरीके से जाहिर हुई है। इस पूरे घटनाक्रम में जिस तरह जातीय ध्रुवीकरण की सच्ची-झूठी खबरें मीडिया और सोशल मीडिया में वायरल हुईं, उनसे नेता, अपराधी और अधिकारियों के गठजोड़ की फॉल्ट लाइन स्पष्ट दिखी।

यह हकीकत है कि अपराधी जिस जाति का होता है उस जाति के लोग उसमें अपना मसीहा देखने लगते हैं। फिर उस जाति के वोट के लिए नेता उसके सर पर हाथ रखते हैं। राजनीतिक सरपरस्ती हासिल होते ही किसी भी मामूली गुंडे का गैंगेस्टर बन जाना कोई बड़ी बात नहीं होती है। इसके बाद वह सामाजिक और राजनीतिक सत्ता की संरचना का एक अनिवार्य हिस्सा बनता जाता है। चूंकि भारत में समय के साथ संस्थाएं या तो कमजोर हुई हैं या पूरी तरह से खत्म हो गई हैं और सारी ताकत राजनीतिक सत्ता के ईर्द-गिर्द सिमट गई हैं। जिसकी वहां तक पहुंच होती है वह अपने हिसाब से सब कुछ नियंत्रित करता है। जिन्हें अपराध करना है, अवैध धंधे करने हैं और बाद में उसे सीढ़ी बना कर राजनीति करनी है वे अपनी राजनीतिक पहुंच के दम पर अपने हिसाब से थानों में और जिलों में पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति कराते हैं। इसी तरह जिन्हें बड़ी आर्थिक लूट करनी होती हैं वे अपने हिसाब से आर्थिक महत्व के फैसलों वाली जगहों पर बड़े अधिकारियों को बैठाते हैं, केंद्रीय एजेंसियों में अपने हिसाब से लोगों की नियुक्ति कराते हैं और उसका फायदा उठाते हैं। यह काम मेरिट के दम पर बहुत कम होता है। इसके लिए कहीं जातीय अस्मिता काम आती है तो कहीं क्षेत्रीय पहचान तो कहीं शुद्ध रूप पैसे की ताकत काम आती है।

केंद्र की अमुक सरकार में अमुक राज्य के लोगों का बोलबाला था। दूसरी सरकार आई तो दूसरे राज्यों के लोगों का बोलबाला है। राज्यों में अमुक जाति का मुख्यमंत्री बना तो उसकी जाति के अपराधियों और अधिकारियों की पौ-बारह है तो दूसरी जाति का मुख्यमंत्री बना तो उस जाति के साथ जिन जातियों का ऐतिहासिक सामाजिक विद्वेष है उनके लोगों की खैर नहीं है। जिस तरह मध्य काल में कबीले होते थे, उसी तरह आज जातियां हैं या क्षेत्रीय पहचान है। सब अपने कबीले के लोगों को आगे बढ़ाते हैं। नेता अपने कबीले के अपराधी को प्रश्रय देता है और अपने कबीले के अधिकारियों को अच्छे पदों पर नियुक्त करता है फिर सब मिल कर अपनी विरोधी जातियों के लोगों को सबक सिखाते हैं। पहले यह लड़ाई लाठी-भाले-तीर-तलवारों से लड़ी जाती थी और अब एके-47 राइफलों से और मो ब्लां की कलम से लड़ी जा रही है।

हम अभी तक उस मध्यकालीन मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं, जहां जातीय और क्षेत्रीय पहचान ही तरक्की का एकमात्र कारगर हथियार है। नेता इसी आधार पर आगे बढ़ता है कि उसकी जाति या धर्म के कितने वोट हैं, अधिकारी इस आधार पर पोस्टिंग या तरक्की पाता है कि राजनीतिक सत्ता में उसकी जाति की कितनी भागीदारी है और अपराधी इस आधार पर ताकतवर होता है या मारा जाता है कि राजनीतिक सत्ता और पुलिस-प्रशासन में उसकी जाति के कितने लोग हैं, जो उसे सरपरस्ती देते हैं। सोचें, यह कैसी शर्मनाक स्थिति है? क्या दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में ऐसी स्थिति की कल्पना की जा सकती है? अफसोस की बात है कि समय के साथ जातिवाद को खत्म हो जाना चाहिए था पर उलटे जाति नाम की संस्था पहले से ज्यादा मजबूत होती जा रही है।

 

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