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क्यों डर रही है सरकार?

आंदोलन, प्रदर्शन और धरने से लोकतंत्र की खूबसूरत तस्वीरें बनती हैं। कितने अच्छे ढंग से इस बात को डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा है कि ‘सड़कें सूनी हो जाएंगी तो संसद आवारा हो जाएगी’! असल में लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि इसकी सड़कें आबाद रहें। केंद्र की मौजूदा सरकार और सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा का इतिहास भले समाजवाद का नहीं रहा है पर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की विरासत का कुछ अंश तो उसके हिस्से में भी आया ही है। फिर भी उसकी सरकार क्यों आंदोलनों, प्रदर्शनों और धरनों से डर रही है? वह भी छात्रों के आंदोलन से?

देश भर के छात्र आंदोलित हैं। करीब 15 राज्यों में बड़े शिक्षण संस्थानों में छात्रों ने जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध में प्रदर्शन किया। आमतौर पर प्रदर्शनों से दूर रहने वाले आईआईटी, आईआईएम और इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरू के छात्रों ने भी प्रदर्शन में हिस्सा लिया। दिल्ली से लेकर कोलकाता, चेन्नई, मुंबई, बेंगुलरू, कानपुर, हैदराबाद, पटना, बनारस सहित कोई भी बड़ा शहर ऐसा नहीं है, जहां छात्र और नौजवान आंदोलन के लिए सड़क पर नहीं निकले।

केंद्र की भाजपा सरकार के साढ़े पांच साल के कार्यकाल में छात्रों के आंदोलन का एक इतिहास रहा है। हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले से लेकर जामिया की लाइब्रेरी में पुलिस के घुस कर छात्रों पर लाठी चलाने तक हर बार छात्र निशाने पर रहे हैं। इसी बात को प्रतीकित करता एक पोस्टर आईआईटी कानपुर के छात्रों ने अपने प्रदर्शन में लगाया था। छात्रों ने सरकार को निशाना बनाते हुए लिखा था- उन्होंने एमटेक का शुल्क बढ़ा दिया, हम कुछ नहीं बोले। उन्होंने जेएनयू में छात्रप्रदर्शनकारियों को पीटा, हम कुछ नहीं बोले और अब जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के साथ यह हुआ।यदि हम अब भी कुछ नहीं बोले तो छात्र समुदाय के प्रति हमारी प्रतिबद्धता पर गंभीर सवालखड़ा होगा। इसलिए आओ, जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालयके छात्रों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए परिसर में आयोजित मार्च में मिल कर हिस्सा लें।

दो विश्वविद्यालयों में छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई ने देश भर के छात्रों को आंदोलित किया है। इसलिए वे प्रतिरोध के लिए सड़कों पर उतरे हैं। उनके प्रतिरोध का तात्कालिक कारण भले नागरिकता कानून या संभावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर है पर असल में उनकी नाराजगी ज्यादा गहरी है। वैसे ही जैसे आज से 46 साल पहले गुजरात नवनिर्माण आंदोलन के समय हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उस आंदोलन की याद होगी क्योंकि इस आंदोलन ने उनके सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने की नींव रखी थी। इस आंदोलन की शुरुआत फीस बढ़ने से हुई थी। एक इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस में और होस्टल में खाने की रेट में बढ़ोतरी हुई थी। इसके विरोध में छात्र सड़कों पर उतरे तो महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त मध्य वर्ग ने खुल कर उनका साथ दिया। आजादी के बाद वह इकलौता सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनथा, जिसकी वजह से एक चुनी हुई सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था।

आज ठीक वहीं हालात देश के हैं। समूचा देश महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त है और छात्र-युवा आंदोलित हैं। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में छात्रावास की फीस बढ़ाए जाने के खिलाफ आंदोलन चल रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में पांच हजार तदर्थ शिक्षकों को अतिथि शिक्षक में बदल दिए जाने के विरोध में आंदोलन चल रहा है। उत्तराखंड में आयुर्वेद यूनिवर्सिटी के छात्र फीस बढ़ाए जाने की वजह से आंदोलित हैं। एएमयू और जामिया मिलिया में नागरिकता कानून को लेकर छात्रों ने प्रदर्शन किया। हैरानी की बात है कि इस हालात में छात्र और युवा आंदोलन से निकले प्रधानमंत्री की सरकार छात्रों के आंदोलन से पुलिस के जरिए निपट रही है! बात करने की बजाय उनको डरा रही है। उनकी समस्या का समाधान करने की बजाय उनको नसीहत दे रही है।

क्या सरकार को यह डर सता रहा है कि अगर उसने छात्रों और युवाओं के आंदोलन को बढ़ने दिया तो 1974 का इतिहास दोहराया जा सकता है? कई लोग यह बात करने लगे हैं कि देश 1974 के हालात की तरफ बढ़ रहा है। उस समय जैसे इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ राजनीतिक व सामाजिक संगठनों की गोलबंदी हो रही थी और आम लोग सरकार से मुक्ति पाने की जद्दोजहद में लगे थे उसी तरह अब मोदी सरकार के खिलाफ हो रही है। इसकी शुरुआत राज्यों से हो चुकी है। महाराष्ट्र में पार्टियों ने अपने तमाम वैचारिक बंधन तोड़ कर भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन किया। एक तरफ सरकार की चिंता दूसरे राज्यों में इस परिघटना के दोहराव को रोकने की है तो दूसरी तरफ छात्रों के आंदोलन को किसी तरह से शांत करने की है। इस काम में मीडिया और न्यायपालिका दोनों सरकार का सहयोग करते दिख रहे हैं।

नरेंद्र मोदी पिछले 50 साल में देश हुए तमाम आंदोलनों से परिचित हैं और उनको पता है कि इन तमाम आंदोलनों में सबसे खतरनाक छात्र और युवाओं का आंदोलन होता है। 74 के आंदोलन के नेता भले जयप्रकाश नारायण थे पर सड़क पर युवा ही उतरे थे। तभी बिहार के एक कवि ने लिखा था- जयप्रकाश का यहीं है नारा, छोड़ो कॉलेज बनो आवारा! इसी बात को 74 के आंदोलन से 32 साल पहले भारत छोड़ो आंदोलन के समय रामधारी सिंह दिनकर ने दूसरे ढंग से कही थी। उन्होंने लिखा था- अब जयप्रकाश है नाम देश की आतुर हठी जवानी का! आवारागर्द युवाओं का आंदोलन ही था, जिसने अंग्रेजी सत्ता की नींव हिला दी तो सर्वशक्तिमान इंदिरा गांधी की सत्ता भी पलट दी थी।

हाल के इतिहास में 2011-12 का अन्ना हजारे का आंदोलन है, जिसकी कमान भी युवाओं के हाथों में थी। तभी सरकार छात्रों-युवाओं के आंदोलन से डर रही है। उसे डर है कि कहीं इसमें आम आदमी शामिल हुआ तो फिर सत्ता बचानी मुश्किल होगी। सरकारों के इस डर को गोरख पांडेय ने एक कविता में अभिव्यक्त किया था- वे डरते हैं, किस चीज से डरते हैं वे, तमाम धन-दौलत, गोला-बारूद, पुलिस-फौज के बावजूद? वे डरते हैं कि एक दिन, ये निहत्थे और गरीब लोग उनसे डरना बंद कर देंगे!

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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