nayaindia भागवत के भाषण का मतलब - Naya India RSS chief mohan Bhagwat
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भागवत के भाषण का मतलब

Mohan Bhagwat

RSS chief mohan Bhagwat speech : राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का यह कहना मामूली नहीं है कि ‘यदि कोई कहता है कि मुसलमान यहां नहीं रह सकता है तो वह हिंदू नहीं है’। उनकी यह बात भी मामूली नहीं है कि ‘गाय के नाम पर दूसरों को मारने वाले हिंदुत्व के विरोधी हैं’। देश के मुसलमानों को भरोसा दिलाने वाली उनकी यह बात भी गैरमामूली नहीं है कि ‘मुसलमान इस भय चक्र में न फंसें कि भारत में इस्लाम खतरे में है’। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के कार्यक्रम में उनकी कही यह बात भी गौरतलब है कि ‘वे छवि बदलने या वोट बैंक की राजनीति के लिए इस कार्यक्रम में नहीं शामिल हुए। संघ राजनीति नहीं करता है और न छवि की चिंता में रहता है। संघ का काम राष्ट्र और समाज के हर वर्ग के लिए काम करना है’।

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मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के कार्यक्रम में संघ प्रमुख का दिया पूरा भाषण पहली नजर में देखने पर लगता है कि यह संघ की विचारधारा के बारे में स्थापित धारणा से बिल्कुल उलट है। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। इस भाषण के कुछ अंश जरूर संघ की विचारधारा से अलग लग रहे हैं लेकिन बाकी जो बातें संघ प्रमुख ने कहीं वह संघ की मौजूदा विचारधारा और उसकी विस्तार की राजनीति के बिल्कुल संगत हैं और उनमें एक किस्म की निरंतरता है। जैसे आरएसएस और अनुषंगी संगठन अब बिल्कुल नहीं चाहते हैं कि गाय के नाम पर लिंचिंग हो या किसी भी नाम पर कोई दंगा या हिंसा हो। पिछले दो दशक में संघ को यह बात समझ में आई है कि किसी भी किस्म की हिंसा हिंदुत्व की धारणा के प्रचार-प्रसार के रास्ते में बाधा है। तात्कालिक और राजनीतिक नजरिए से देखें तो ऐसा लगेगा कि गाय के नाम पर या जय श्रीराम के नारे के नाम पर होने वाली लिंचिंग या हिंसा ध्रुवीकरण में मददगार होती है और उसका राजनीतिक फायदा भाजपा को मिलता है। लेकिन यह लंबे समय के संघ के एजेंडे के अनुकूल नहीं है।

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यह एक जाना हुआ तथ्य है कि सांप्रदायिक दंगे अपने आप नहीं होते है, उन्हें कराया जाता है और जो लोग दंगे कराते हैं उनका एक निश्चित राजनीतिक मकसद होता है। लेकिन इसके बड़े खतरे हैं। बड़े सांप्रदायिक दंगों की स्मृतियां लंबी नहीं होती हैं। दंगों के समय लोग परेशान होते हैं और डरते भी हैं लेकिन जल्दी ही इसे भूल जाते हैं। यह लंबे समय के लिए सांप्रदायिक चेतना के विकास में असरदार नहीं है। व्यापक हिंदू समाज में सांप्रदायिक चेतना विकसित करने और हिंदू कॉमन सेंस विकसित करने के लिहाज से बड़े दंगे बहुत सफल नहीं हैं। इनकी बजाय अगर समाज में छोटे-छोटे लेकिन स्थायी तनाव पैदा किए जाएं तो उनसे स्थायी सांप्रदायिक चेतना बनती है, जो राजनीतिक रूप से भी ज्यादा लाभदायक है। इस नजरिए से अगर देखें तो संघ प्रमुख की बात बहुत तार्किक और लंबे समय के एजेंडे की संगत में दिखाई देती है।

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की जमीनी गतिविधियों और पिछले तीन दशक में उसमें आए बदलाव का अध्ययन करने वाले समाजशास्त्री बद्री नारायण ने अपनी किताब ‘रिपब्लिक ऑफ हिंदुत्व’ में लिखा है कि अपने फील्ड रिसर्च के दौरान उत्तर प्रदेश में उनकी संघ के कई पदाधिकारियों और प्रचारकों आदि से मुलाकात हुई। उन्हीं में से एक ने उनसे कहा था कि ‘हम समाज में सांप्रदायिक दंगे नहीं चाहते, यह हमारे संगठन के विकास में बाधक है’। इसकी बजाय समाज में छोटे-छोटे टकराव और तनाव पैदा किए जाते हैं, जो लगभग अदृश्य होते हैं लेकिन लोगों की चेतना पर स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं। समाज में स्थायी रूप से इस विभाजन, टकराव या तनाव का मौजूद होना, लोगों के अंदर सांप्रदायिक चेतना को मजबूत करता है।

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असल में भारत में हर व्यक्ति की एक से ज्यादा अस्मिताएं होती हैं। जिस समय कोई व्यक्ति दंगों में शामिल होता है उस समय उसकी अस्मिता सांप्रदायिक होती है। लेकिन जैसे ही दंगे खत्म होते हैं वह अपनी दूसरी अस्मिता में लौट जाता है, जो बुनियादी रूप से जातीय होती है। हो सकता है कि उसी व्यक्ति की एक अस्मिता कारोबारी की भी हो और उसे लगता हो कि सांप्रदायिक हिंसा उसके कारोबार को नुकसान पहुंचा रही है। ऐसे में उसकी धार्मिक अस्मिता को स्थायी बनाने के लिए जरूरी है कि हिंसा न हो लेकिन तनाव और टकराव की स्थितियां बनी रहें। RSS chief mohan Bhagwat speech : 

इस तनाव को दंगा नहीं कहा जा सकता है लेकिन इसका बहुत गहरा और लंबा असर होता है। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ बरसों से इस विचार पर काम कर रहा है कि जातीय और अन्य अस्मिताओं को कमजोर करके धार्मिक अस्मिता को मजबूत किया जाए। यह काम हिंसा के सहारे नहीं हो सकता है। इसलिए संघ प्रमुख की बात बिल्कुल सही है और संगठन की विचारधारा के अनुकूल है कि मुसलमानों को भगाने की बात करने या गाय के नाम पर दूसरों को मारने वाले हिंदू नहीं हैं। असल में यह ‘फ्रिंज एलिमेंट्स’ का काम है, जो भाजपा के सत्ता में आने के बाद अलग अलग इलाकों में पनपे हैं। इन्हीं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आपराधिक तत्व’ बताया था।

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संघ प्रमुख ने मुसलमानों को भरोसा दिलाते हुए कहा कि ‘वे इस भय चक्र में नहीं फंसे कि भारत में इस्लाम खतरे में है’। यह एक तरह से भ्रम पैदा करने वाला बयान है या कम से कम अधूरा सत्य है। इसका पूरा सत्य यह है कि अगर देश का मुसलमान इस्लाम को खतरे में मान रहा है तो भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा नेतृत्व और पार्टी के आईटी सेल ने हिंदुओं के मन में भी यह भय बैठाया है कि हिंदुत्व खतरे में है और हिंदुत्व की रक्षा तभी संभव है, जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने रहें और उनके बाद अमित शाह या योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री बनें। मुसलमान से ज्यादा भय हिंदुओं के मन में बैठाया गया है कि हिंदुत्व और हिंदू दोनों खतरे में हैं। इसके लिए हजार तरह की झूठी-सच्ची कहानियां गढ़ी गई हैं और हजार किस्म के झूठे-सच्चे आंकड़े दिए जा रहे हैं। मुस्लिम आबादी बढ़ने से लेकर मुसलमानों द्वारा देश पर कब्जा करने की झूठी-सच्ची अनेक रहस्य कथाएं गढ़ी गई हैं। हकीकत यह है कि पश्चिम बंगाल और असम के कुछ इलाकों को छोड़ दें तो बाकी पूरे देश में मुस्लिम आबादी लगभग उसी अनुपात में बढ़ रही है, जिस अनुपात में हिंदू आबादी बढ़ रही है। बंगाल और असम में भी मुस्लिम आबादी बढ़ने का कारण जन्मदर से ज्यादा अवैध घुसपैठ है। इसके बावजूद यह प्रचार किया गया है कि देश के एक सौ करोड़ हिंदू खतरे में हैं। झूठी-सच्ची कहानियों के जरिए हिंदू को भयाकुल बना कर उसका राजनीतिक भयादोहन किया जा रहा है। कायदे से संघ प्रमुख को देश के हिंदुओं को आश्वस्त करना चाहिए कि हिंदुत्व पहले भी खतरे में नहीं था, आज भी नहीं है और आगे भी नहीं होगा! RSS chief mohan Bhagwat speech :

अब रही बात सभी भारतीयों का एक डीएनए होने की तो यह भी संघ प्रमुख मोहन भागवत का पुराना राग है। लेकिन पहले वे इसे दूसरे तरीके से कहते थे। पहले वे कहते थे कि भारत के सभी लोग हिंदू हैं। यही बात सुब्रह्मण्यम स्वामी भी कहते हैं। लेकिन अब संघ प्रमुख ने इस बात को बदल दिया है। अब उन्होंने कहा है कि इस देश में रहने वाले सभी लोग भारतीय हैं और सबका डीएनए एक है। राजनीतिक रूप से यह एक अहानिकारक बयान है। क्योंकि इस देश में रहने वाले हर धर्म, संप्रदाय के लोग अपने को भारतीय मानते हैं। पहले भी इसे लेकर विवाद नहीं था। पहले भी संघ के संस्थापक विचारकों को इस बात पर आपत्ति थी कि मुसलमान अपनी पुण्य भूमि क्यों दूसरे देश को मानते हैं। यानी मातूभूमि या पितृभूमि का विवाद नहीं था, बल्कि विवाद पुण्यभूमि का था। उस बारे में संघ प्रमुख ने कुछ नहीं कहा।

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उन्होंने जो कहा उसके राजनीतिक निहितार्थ के आगे अगर डीएनए पर विचार होगा तो विवाद का पंडोरा बॉक्स खुलेगा क्योंकि भारत के लोगों की लगभग पूरी नस्ल मिश्रित है सबका मिक्स्ड डीएनए है। भारतीय पुरुषों के वाई-डीएनए की जांच से पता चलता है कि पांच से साढ़े तीन हजार साल पहले मध्य एशिया यानी यूरेशिया से बड़ी संख्या में प्रवासी भारत आए थे और लगभग पूरे उत्तर भारत के लोग उनके साथ मिश्रित नस्ल वाले हैं। टोनी जोसेफ ने अपनी किताब ‘अर्ली इंडियंसः द स्टोरी ऑफ ऑवर एनसेस्टर्स एंड व्हेअर वी केम फ्रॉम’ में एक जेनेटिक स्टडी के हवाले से बताया है कि पूर्वोत्तर में ईस्वी पूर्व दो हजार साल पहले यानी अभी से कोई चार हजार साल पहले दक्षिण-पूर्व एशिया से बड़ी संख्या में प्रवासी आए, जिनकी मिश्रित नस्लें आजकल समूचे पूर्वोत्तर में हैं। देश के दो सबसे बड़े आदिवासी समूह मुंडा और खासी के अंदर ऑस्ट्रोएशियाटिक माइग्रेशन से सबसे ज्यादा मिश्रण हुआ है। इस मिश्रित नस्ल में हिंदू भी हैं और मुसलमान भी। सो, डीएनए का मामला विवाद का है इसलिए उसे छोड़ देना चाहिए। RSS chief mohan Bhagwat speech :

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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