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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

‘राम नाम सत्य है’ के बाद वाली लाइन है ‘सत्य बोलो गत है’! भारत में राम से ज्यादा राम के नाम की महत्ता बताई जाती है फिर भी राम का नाम सत्य तभी माना जाता है, जब हिंदू लोग शव लेकर श्मशान जा रहे होते हैं। अपने यहां मुहावरे में कभी भी ‘राम नाम सत्य’ कहने का मतलब सत्यानाश माना जाता है। सो, कह सकते हैं कि अभी देश का राम नाम सत्य हो रहा है और सत्य बोलने में ही गत है। पर मुश्किल यह है कि जो हिंदू राम नाम सत्य है बोलते हुए श्मशान जाते हैं वे लौटते ही राम का नाम भी भूल जाते हैं और सत्य का संधान करना भी भूल जाते हैं। उन्हें यह समझ में नहीं आता है कि सत्य में ही गत है। यानी आत्मा की सद्गति तभी संभव है, जब सत्य का संधान हो!

तभी आज जब देश का राम नाम सत्य हो रहा है तब भी सत्य से ही सद्गति संभव है। सत्य के संधान से ही इस सत्यानाश का मुकाबला हो सकता है। पर अफसोस की बात है कि देश की सरकार, हिंदू धर्म-संस्कृति की रक्षा का सर्वाधिकार रखने वाला राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और स्वंयभू धर्मगुरू सब सत्य स्वीकार करने और उसे बिल्कुल उसी रूप में जनता के सामने प्रस्तुत करने की बजाय सकारात्मकता के प्रचार में जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ी एक कोविड रिस्पांस टीम ने ‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ नाम से एक अभियान शुरू किया है। इसमें सकारात्मकता पर जानी-मानी हस्तियों के प्रवचन होते हैं, जिन्हें दूरदर्शन पर दिखाया जाता है। इन जानी-मानी हस्तियों में कारोबारियों व उद्योगपतियों के साथ-साथ रविशंकर जैसे स्वंयभू धर्मगुरू भी शामिल हैं।

सवाल है कि ये सारे लोग जिस सकारात्मकता की बात कर रहे है उसका क्या मतलब है?

क्या उसका यह मतलब है कि गंगा में बहती लाशों को न देखा जाए? क्या उसका यह मतलब है कि कानपुर से उन्नाव और गाजीपुर-बलिया से बक्सर-चौसा तक गंगा किनारे बिखरी लाशों की बात नहीं की जाए? क्या उसका यह मतलब है कि अस्पतालों के बाहर, सड़कों पर, ऑटोरिक्शा में ऑक्सीजन की कमी से तड़प कर मर रहे लोगों की बात नहीं बताई जाए? क्या इसका मतलब यह है कि असमय हो रही हजारों मौतों, उजड़ते परिवारों, अनाथ होते बच्चों, रोती-बिलखती माओं, बहनों, पत्नियों की बात नहीं लिखी जाए?  क्या इस सकारात्मकता का मतलब यह है कि आप सत्य से आंखें मूंद लें और झूठ का प्रचार करें? आखिर ‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ का क्या मतलब है? क्या असीमित सकारात्मकता इस बात में है कि एक नाकारा सरकार और नाकाम व्यवस्था की जय-जयकार की जाए?

आखिर कोई कैसे ऐसा सोच और कह सकता है? हिंदी के महान और सर्वाधिक अक्खड़ कवियों में से एक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने लिखा था यदि तुम्हारे घर के/एक कमरे में आग लगी हो/तो क्या तुम/दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रही हों/तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो’? जिसमें जरा सी भी संवेदना बची होगी वह ऐसा नहीं कर सकता कि एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों और दूसरे कमरे में वह प्रार्थना करे! फिर कैसे ये कथित धर्म गुरू, कथित हिंदू धर्म रक्षक, कथित लोक कल्याणकारी सरकार, लोकतंत्र का कथित चौथा स्तंभ ऐसी बातें कर रहे हैं? आखिर कैसे किसी में इतनी हिम्मत आ रही है कि वह लोगों को सच देखने और बोलने से मना कर रहा है? सकारात्मकता का यह प्रचार असल में सत्य को छिपाने का एक सुनियोजित अभियान है! यह एक किस्म की हिप्पोक्रेसी है, जो हमें सूट करती है। वैसे सारे लोग जो व्यवस्था का हिस्सा हैं और जिनकी नाकामी से यह स्थिति पैदा हुई है वे चाहते हैं कि उनके नकारेपन की चर्चा न हो और वैसे लोग जो इस आपदा को अवसर बना कर चौतरफा हो रही लूट में शामिल हैं वे भी चाहते हैं कि उनकी इस नीचता पर सकारात्मकता का आवरण चढ़ा दिया जाए!

एक साथी पत्रकार शशि शेखर ने अच्छा याद दिलाया कि ‘सकारात्मकता और कुछ नहीं एक पाखंड है, पलायनवाद है, भोगवाद है’! पिछली सदी के महान दार्शनिकों में से एक ओशो ने दर्शन के रूप में सकारात्मक सोच को खारिज कर दिया था। उन्होंने इसे ‘बुलशिट’ तक कहा था। ओशो ने सकारात्मकता के दर्शन को पाखंड का दर्शन’ माना। उन्होंने कहा कि ‘सकारात्मक सोच के दर्शन का मतलब असत्य है। इसका मतलब बेईमान होना है। इसका मतलब है एक निश्चित चीज को देखना और अभी जो आप देख रहे हैं (सत्य) उससे इनकार करना। इसका मतलब है कि खुद और दूसरों को धोखा देना’। जब तक आप अपने जीवन, समाज और अपने समय में घट रही नकारात्मक चीजों को खुली दृष्टि से देखेंगे नहीं, उसे स्वीकारेंगे नहीं तब तक आप उसके समाधान की ओर बढ़ ही नहीं सकते हैं। अगर आप ‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ का शिकार हो जाते हैं तो फिर आप समस्या को पहचान नहीं पाएंगे, आप एक किस्म के रोमांटिसिज्म के शिकार होंगे, जो अंततः आपको पलायन की ओर ले जाएगी। क्या यह समय पलायन का है? कतई नहीं! यह सच को यानी नकारात्मकता को स्वीकार करने, उसका सामना करने और फिर सकारात्मक रूप से उसके समाधान की ओर बढ़ने का समय है!

ऐसे समय में जो लोग सकारात्मक बने रहने की सलाह दे रहे हैं, वे घातक हैं। वे देश, समाज और पूरी मानवता का बुरा कर रहे हैं। इस समय सकारात्मकता की बात करना, सत्य से आंख चुराने जैसा है, शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन गाड़ लेने जैसा है। ‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ का एक बड़ा खतरा यह है कि लंबे समय में व्यक्ति झूठ को ही सच मानने लगता है और उसमें जीने लगता है। फिर वह कभी वास्तविकता का सामना नहीं कर पाता। सो, सकारात्मकता के जाल में फंसना लंबे समय में बहुत नुकसानदेह साबित होगा। सरकार को हो सकता है कि थोड़े समय के लिए इसका कुछ फायदा हो जाए। अभी हो रही आलोचना कुछ कम हो जाए। महामानव की छवि पर लग रहे दाग कुछ धूमिल हो जाएं लेकिन अंततः यह नुकसानदेह साबित होगा। इस समय समस्या को स्वीकार नहीं करना, अंततः समस्या को बढ़ाएगा। हालांकि इसका कतई यह मतलब नहीं है कि सिर्फ नकारात्मक ही बने रहना है, बल्कि इसका मतलब नकारात्मकता को स्वीकार करते हुए उसका सामना करने के लिए सकारात्मक तरीके से तैयार होना है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों में किसी को नकारा नहीं जा सकता है। इसलिए दोनों में संतुलन बनाने की जरूरत है।

सकारात्मक दिशा में बढ़ने के लिए यह सत्य लोगों के सामने उद्घाटित होना चाहिए कि कोरोना वायरस से वास्तव में कितने लोग बीमार हो रहे हैं, कितने लोग मर रहे हैं, कितने लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा है, कितने लोग दवा और ऑक्सीजन के लिए भाग रहे हैं, कितने लोग अंतिम संस्कार के लिए कतार में खड़े हैं, कितने लोग अपनों का अंतिम संस्कार नहीं कर पाने की पीड़ा झेल रहे हैं, कितने लोगों ने नौकरी और रोजगार गंवा दिए! इस सत्य के उद्घाटित होने और उसे स्वीकार करने के बाद ही इसके समाधान की तरफ बढ़ा जा सकता है।

‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ अभियान से ही जुड़ी दो मिनट की एक वीडियो में देश के जाने-माने उद्योगपति अजीम प्रेमजी ने बहुत कायदे की बात कही। उन्होंने सकारात्मकता पर जोर दिए बिना कहा कि गुड साइंस यानी अच्छा विज्ञान और सत्य’ से ही आप बच सकते हैं। सचमुच इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। संकट के इस समय में विज्ञान और सत्य ही आपकी और पूरी दुनिया की रक्षा कर सकते हैं। सो, विज्ञान और वैज्ञानिक सोच को अपनाएं और हर स्तर पर सत्य का संधान करें। जहां सच दिखाई दे रहा है उसे लोगों के सामने लाएं। लंबी, सफेद दाढ़ी के सहारे लोगों को धोखा दे रहे ढोंगी बाबाओं की फैलाई झूठी सकारात्मकता का शिकार न बनें!

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साभार - ऐसे भी जानें सत्य

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