nayaindia split of opposition parties ऐसा बिखरा विपक्ष कब था?
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ऐसा बिखरा विपक्ष कब था?

आखिरी बार 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके साथ हुए विधानसभा चुनावों में देश की विपक्षी पार्टियां इतनी बिखरी हुई दिखी थीं, जितनी अभी दिख रही हैं। तब किसी को अंदाजा नहीं था कि भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर चुनाव लड़ रहे नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बन जाएंगे तो देश की राजनीति किस तरह से बदलेगी। उस समय सब अपने लिए संभावना देख रहे थे। सभी पार्टियों को लग रहा था कि कांग्रेस के खिलाफ 10 साल की एंटी इनकम्बैंसी है, भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, सरकार के मंत्री रहे नेता गिरफ्तार करके जेल में डाले गए हैं, ऐसे हालात में त्रिशंकु लोकसभा बन सकती है और कोई भी आदमी प्रधानमंत्री बन सकता है। तभी कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए पूरी तरह से बिखरा हुआ था और उसकी ज्यादातर सहयोगी पार्टियां साथ छोड़ कर अलग लड़ रही थीं तो कांग्रेस से अलग हुई पार्टियां और जनता परिवार की पार्टियां भी अपनी-अपनी किस्मत आजमा रही थीं।

उसके बाद के चुनावों में विपक्षी पार्टियों के बीच कमोबेश एक तरह का साझा विकसित हुआ। नरेंद्र मोदी ब्रांड की राजनीति के आगे सबने खतरा बूझा और भाजपा को रोकने के लिए साथ मिल कर लड़ने की जरूरत समझी। हालांकि ऐसा नहीं है कि इससे कोई बहुत मजबूत गठबंधन बन गया या हर जगह चुनाव भाजपा बनाम अन्य हुआ। लेकिन यह जरूर था कि पार्टियों को जब अपने अस्तित्व पर खतरा दिखा तो उन्होंने अपने अपने हित छोड़ कर चुनाव पूर्व या चुनाव बाद गठबंधन बनाया। इसमें कुछ प्रयोग सफल हुए तो कुछ विफल भी हुए। जैसे बिहार में राजद, जदयू और कांग्रेस का साझा सफल रहा तो उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस और सपा-बसपा दोनों का गठबंधन सफल नही हो सका। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट का गठबंधन भी नाकाम रहा लेकिन झारखंड में कांग्रेस और जेएमएम का गठबंधन सफल रहा। चुनाव बाद के गठबंधन का साझा प्रयोग महाराष्ट्र और कर्नाटक में हुआ। महाराष्ट्र में अब भी यह सफलतापूर्वक काम कर रहा है। सो, कह सकते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद विपक्षी पार्टियों ने जमीनी हालात को समझते हुए एकजुट होकर लड़ने की जरूरत समझी थी। लेकिन इस बार फिर ऐसा लग रहा है कि सारी पार्टियां 2014 जैसे हालात बूझ रही हैं और सब अपने अपने नेताओं की महत्वाकांक्षा में अकेले ताल ठोक रही हैं।

चुनाव वाले पांच राज्यों में सबसे अहम उत्तर प्रदेश है, जहां पिछले दो चुनावों से गठबंधन की राजनीति हुई है। यह अलग बात है कि उसमें कामयाबी नहीं मिल पाई। इसके बावजूद भाजपा से निर्णायक लड़ाई और उसे प्रभावी चुनौती देने का एकमात्र तरीका विपक्ष की एकजुटता ही है। लेकिन एकजुटता बनाने की बजाय इस बार विपक्षी पार्टियां ज्यादा बिखरी हुई हैं। चुनावी राजनीति में हाशिए पर पहुंच गई कांग्रेस पूरी ताकत से ताल ठोक रही है तो बहुजन समाज पार्टी अपने कोर वोट बैंक के भरोसे अकेले लड़ने की राजनीति कर रही है। सपा ने जरूर कुछ छोटी छोटी पार्टियों से तालमेल किया है लेकिन उसने भी विपक्ष की एकजुटता बनाने का प्रयास नहीं किया। सो, हर हाल में भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच चारकोणीय मुकाबला तय दिख रहा है। आम आदमी पार्टी भी कुछ सीटों पर चुनाव लड़ेगी। अब तक बहुकोणीय मुकाबले का फायदा भाजपा को मिलता रहा है। बहस के लिए कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में भी बहुकोणीय मुकाबला था तब भी तृणमूल कांग्रेस जीती। यह सही है, लेकिन भाजपा के तीन से 77 विधायकों तक पहुंचने और लोकसभा चुनाव में मिले 38 फीसदी वोट को बचाए रख लेने को फायदा नहीं मानने वालों की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है।

पंजाब में पिछले चुनाव से पहले तक कांग्रेस और अकाली दल गठबंधन के बीच आमने-सामने का मुकाबला होता रहा था। पिछली बार आम आदमी पार्टी ने मुकाबले को त्रिकोणात्मक बनाया था। इस बार चारकोणीय मुकाबला हो रहा है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अकाली दल-बसपा और भाजपा-पंजाब लोक कांग्रेस गठबंधन के बीच चारकोणीय मुकाबला हो रहा है। इसी तरह गोवा में कांग्रेस, भाजपा और दो प्रादेशिक पार्टियों- महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के अलावा तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों ताल ठोक रहे हैं। कांग्रेस और एनसीपी के बीच भी अभी तालमेल नहीं हुआ है और कांग्रेस ने महाराष्ट्र की सहयोगी शिव सेना को भी अभी दूर ही रखा है। वहां भी इस बार चारकोणीय मुकाबला होगा। जब उत्तर प्रदेश में पार्टियों के बीच तालमेल नहीं हुआ तो उत्तराखंड में भी इसकी संभावना अपने आप खत्म हो जाती है। वहां भी कांग्रेस और भाजपा के अलावा सपा, बसपा और आम आदमी पार्टी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है लेकिन बाकी तीन पार्टियां कई जगह नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में होंगी। उधर मणिपुर में भाजपा, कांग्रेस, नगा पीपुल्स फ्रंट, नेशनल पीपुल्स पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच पांचकोणीय मुकाबला होगा। पिछले चुनाव में इन पांचों पार्टियों के विधायक जीते थे और इस बार तृणमूल कांग्रेस ज्यादा ताकत के साथ लड़ रही है।

सोचें, जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं उनमें से एक पंजाब को छोड़ कर बाकी चार राज्यों में भाजपा की सरकार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिसे डबल इंजन की सरकार कहते हैं उनके खिलाफ साझा एंटी इनकम्बैंसी है लेकिन उसका फायदा उठाने की बजाय पार्टियां आपस में एक-दूसरे को निपटाने की लड़ाई लड़ रही हैं। सबको दिख रहा है कि किस तरह से चुनाव से ऐन पहले विपक्षी पार्टियों के नेताओं और उनके करीबी कारोबारियों के यहां केंद्रीय एजेंसियां छापे मार रही हैं, किस तरह से संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल चुनावी फायदे के लिए किया जा रहा है, कैसे राजनीतिक फायदे के लिए नीतियां और कानून बनाए या वापस किए जा रहे हैं, किस तरह से भारी-भरकम दलगत व्यवस्था और अथाह पैसे के दम पर भाजपा चुनाव लड़ रही है फिर भी विपक्षी पार्टियों की आंखें नहीं खुल रही हैं। वे पहले आपस का हिसाब चुकता करने की लड़ाई में लग गई हैं। कांग्रेस अपने आप को मुख्य विपक्ष बनाए रखने की जद्दोजहद में लगी है तो दूसरी विपक्षी पार्टियां भाजपा को हराने की बजाय कांग्रेस को हरा कर उसको मुख्य विपक्ष की जगह से हटाने की राजनीति को प्राथमिकता दे रही हैं। यह राजनीति समूचे विपक्ष के लिए आत्मघाती हो सकती है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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