Stop trying people India लोगों को आजमाना बंद करें!
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लोगों को आजमाना बंद करें!

Stop trying people India

दुनिया भर के सभ्य और आधुनिक लोकतंत्र में सरकारें आम नागरिकों के लिए काम करती हैं, लेकिन भारत में इसका उलटा है। भारत में नागरिक सरकारों के लिए काम करते हैं और सरकारें सिर्फ चुनाव जीतने की तिकड़मों में लगी रहती हैं। लोकतंत्र को जनता के लिए, जनता का और जनता द्वारा शासन कहा गया है लेकिन भारत में जनता सिर्फ शासित होने के लिए है। जो सेवक चुने जाते हैं वे जनता की सेवा नहीं करते हैं, बल्कि जनता के ऊपर शासन करते हैं। भारत में देश की हर समस्या के लिए जनता को जिम्मेदार माना जाता है और उम्मीद की जाती है कि वह उस समस्या को दूर करने के लिए कुर्बानी दे। उसको अपने अधिकारों से ज्यादा कर्तव्यों की याद दिलाई जाती है। Stop trying people India

यह विडंबना है कि भारत में सरकारें डंडे की ताकत से नागरिकों के अधिकार छीनती हैं और डंडे के जोर से ही कर्तव्यों का पालन कराती हैं। भाषणों के जरिए उसे अधिकतम आजादी का भ्रम दिया जाता है लेकिन वास्तव में न्यूनतम आजादी दी जाती है। इस तरह से लोकतंत्र और लोक कल्याणकारी सरकार की पूरी अवधारणा को सिर के बल खड़ा कर दिया गया है।

अपने आसपास देखें और सोचें कि कहां कहां सरकारें विफल हो गई हैं और सरकारों की विफलता के लिए आपको जिम्मेदार बताया जा रहा है, फिर आपको लोकतंत्र की हकीकत का अंदाजा होगा। भारत में सरकारें कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने में विफल रहीं। इस वायरस की सूचना मिलने के कई महीनों बाद तक सरकारों ने कुछ नहीं किया और जब संक्रमण फैला तो नागरिकों की लापरवाही को उसके लिए जिम्मेदार ठहरा दिया गया। सरकारों की लापरवाही, विफलता और नीतिगत अक्षमता से लाखों लोग मर गए और देश को लाखों करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, लेकिन कोई सरकार जिम्मेदार नहीं ठहराई गई। उलटे कभी तबलीगी जमात तो कभी प्रवासी मजदूर तो कभी त्योहार मनाने और बाजारों में जाकर खरीदारी करने वाली भीड़ को जिम्मेदार ठहराया गया। क्या किसी ने पूछा कि तबलीगी जमात को इकट्ठा होने की मंजूरी किसने दी थी या किसकी वजह से प्रवासी मजदूर पलायन कर रहे थे और किसने बाजार खोल कर लोगों की भीड़ जुटने रास्ता बनाया? गलती सरकारों की है और जिम्मेदारी जनता की है। सड़क पर आप बिना मास्क के निकल जाएं तो पुलिस पकड़ कर डंडे भी मारती है और सौ रुपए से लेकर दो हजार रुपए तक जुर्माना भी वसूलती है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इन दिनों वायु प्रदूषण का मुद्दा छाया हुआ है। दिल्ली में केंद्र और राज्य दोनों की सरकार है और दोनों सरकारें पिछले सात साल से पूर्ण बहुमत से काम कर रही हैं। लेकिन इन सात सालों में किसी सरकार ने प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिए एक काम नहीं किया। उलटे दिवाली पर पटाखे चलाने वाले और पंजाब, हरियाणा में पराली जलाने वालों को जिम्मेदार ठहरा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। दिल्ली सरकार ने सिर्फ एक स्मॉग टावर लगाया, जिसके प्रचार पर संभवतः उसकी कीमत से ज्यादा खर्च किया गया। सोचें, सरकारें विफल रही हैं लेकिन प्रदूषण फैलाने के लिए पराली जलाने वाले किसानों पर मुकदमे हो रहे हैं और जुर्माना वसूला जा रहा है। इसी तरह दिल्ली में डेंगू का कहर फैला है और छह हजार से ज्यादा मामले मिले हैं। सरकार फॉगिंग करा कर मच्छर नहीं खत्म कर सकी और न अस्पतालों में अच्छे इलाज की व्यवस्था हुई लेकिन नगर निगम की टीम घर घर घूम रही है और आपके गमले, पानी की टंकी, बाथरुम में कहीं भी डेंगू का मच्छर मिल रहा है तो आपके ऊपर जुर्माना लगा रही है। बिहार में सरकार की नाक के नीचे, पुलिस की मिलीभगत से शराब की तस्करी हो रही है या नकली शराब बन रही है पर उसे रोकने की बजाय पुलिस शराब पीने वालों को पकड़ कर जेल में डाल रही है या भारी भरकम वसूली कर रही है।

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सोचें, राजधानी दिल्ली में साफ-सफाई रखने और फॉगिंग करा कर मच्छर मारने में सरकार विफल रही लेकिन डेंगू का मच्छर मिला तो जुर्माना आपको भरना है। प्रदूषण खत्म करने के रत्ती भर उपाय सरकारों ने नहीं किए लेकिन पराली जलाने या कचरा जलाने या पटाखे चलाने के लिए मुकदमे आपको झेलने हैं और जुर्माना आपको भरना है। शराब की तस्करी पुलिस और प्रशासन की आंख के सामने हो रही है लेकिन शराब पीने के जुर्म में जेल आपको जाना है। कोरोना फैलने से रोकने और मरीजों को सही इलाज देने में विफल सरकारें रही हैं लेकिन मास्क नहीं पहनने के लिए जुर्माना आपको चुकाना है। कोरोना रोकने में विफल रही सरकार ने क्या आपसे पूछ कर लॉकडाउन लगाया था? नहीं! अपनी अक्षमता छिपाने के लिए सरकारों ने लॉकडाउन लगाए या हजार किस्म की पाबंदियां लगाईं, जिनसे आपकी नौकरी गई, काम धंधा बंद हुआ, भारी कीमत आपने चुकाई और ऊपर से लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करने के लिए जुर्माना भी आपने ही भरा। इन सारे मुद्दों मतलब- शराबबंदी, डेंगू से लड़ाई, प्रदूषण से मुकाबला और कोरोना से लड़ाई में सरकारों ने क्या किया, सिर्फ विज्ञापन!

आपकी जवाबदेही या आपका जुर्माना यहीं खत्म नहीं होता है। सरकार आपसे और भी उम्मीद रखती हैं। तभी देखें कि आपके जीवन में सरकार ने कितनी चीजों को अनिवार्य बना दिया। वैक्सीन लगवाना अनिवार्य कर दिया गया है तो आधार कार्ड भी लगभग अनिवार्य ही है क्योंकि वैक्सीनेशन, पैन और आयकर रिटर्न सब कुछ उससे जुड़ना है। अगर आपके पास गाड़ी है तो आपके ही टैक्स के पैसे से बनी सड़कों पर चलने के लिए आपको पैसा देना है और उसके लिए सरकार ने फास्टटैग अनिवार्य कर दिया है। अगर आपकी गाड़ी पर फास्टटैग नहीं लगा है तो हाईवे पर आपको जुर्माने की शक्ल में कई गुना ज्यादा शुल्क देना होगा। अब केंद्र सरकार सारी गाड़ियों में जीपीएस अनिवार्य कर रही है, जिसे गाड़ी मालिक के खाते से जोड़ा जाएगा और हाईवे पर थोड़ी देर चलने का भी पैसा सीधे खाते से कटेगा। गाड़ियों के लिए सरकार ने हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट अनिवार्य कर दिया है और हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट नहीं होने पर जुर्माना वसूला जा रहा है। हालांकि हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट के बाद भी आपकी गाड़ी की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है। स्मार्ट मीटर के नाम पर सरकार बिजली के सारे कनेक्शन प्रीपेड कर रही है ताकि आप एक यूनिट बिजली भी मुफ्त तो छोड़िए उधार में भी नहीं जला सकें। इधर आपका जमा किया पैसा खत्म हुआ और उधर बिजली कटी! बैंक खातों में न्यूनतम जमा की ऐसी अनिवार्यता है कि स्टेट बैंक ने जन धन खातों से भी 165 करोड़ रुपए काट लिए।

सोचें, सरकार ने पैसे वसूलने वाली सारी चीजें अनिवार्य कर दी हैं लेकिन क्या ऐसी कोई चीज सरकार ने अनिवार्य की है, जो आपके जीवन की बुनियादी जरूरत यानी रोटी, कपड़ा और मकान से जुड़ी हो? क्या सरकार ने कहा कि हर नागरिक का तीन समय, पोषण से भरपूर भोजन करना अनिवार्य है और अगर किसी को यह उपलब्ध नहीं है तो सरकार उपलब्ध कराएगी? क्या सरकार ने कहा कि हर बीमारी का इलाज अनिवार्य है और अगर कोई सक्षम नहीं है तो उसका इलाज सरकार कराएगी? क्या भोजन और बीमारी को आधार नंबर से जोड़ना अनिवार्य किया गया ताकि अगर कोई आदमी भूखा या बीमार हो तो उसे सरकार भोजन और दवा पहुंचाए? क्या सरकार ने नौकरी, रोजगार को आधार या पैन कार्ड से जोड़ा है ताकि किसी की नौकरी जाए या रोजगार बंद हो तो उसे तत्काल अपनी जरूरत के लायक पैसा मिलना शुरू हो? ऐसी एक चीज अनिवार्य नहीं की गई है, जो नागरिक की जरूरत है। सिर्फ वहीं चीजें अनिवार्य हुई हैं, जिनसे जनता का खून चूस कर सरकारों की कमाई होनी है।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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