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राजनीति में क्लोन बनने की होड़

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भारत के नेताओं और राजनीतिक दलों में किन किन चीजों की कमी है, अगर यह पूछा जाए तो कई चीजें बताई जा सकती हैं। जैसे भारत की राजनीति में मौलिकता और कल्पनाशीलता की हमेशा बड़ी कमी रही है। विचारधारात्मक प्रतिबद्धता भी एक चीज है, जिसका भारतीय राजनीति में घनघोर अभाव रहा है। अब ऐसा लग रहा है कि इन चीजों का बिल्कुल ही अकाल पड़ गया है। भारतीय राजनीति भेड़चाल का शिकार हो गई है। एक नेता अगर किसी एक मुद्दे को उठा कर सफल हो जा रहा है तो सब उसके पीछे पागलों की तरह भागने लग रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि किसी के पास अपना कोई एजेंडा, मुद्दा या विचारधारा नहीं है। सब एक दूसरे की नकल कर रहे हैं और एक दूसरे का क्लोन बन रहे हैं। यह राजनीति देश को कहां पहुंचाएगी? गर्त में ले जाएगी!

विचारधारा एकमात्र चीज है, जो व्यक्ति, पार्टियों और अंततः देश को बचाएगी। लेकिन राजनीतिक दलों को इससे कोई मतलब नहीं है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाली भाजपा हर राज्य में जातीय समीकरण फिट करने में लगी है। ऐसा पहली बार हुआ कि प्रधानमंत्री खुल कर बोले कि उनकी सरकार में सबसे ज्यादा पिछड़े और दलितों को मंत्री बनाया गया है। जाति का समीकरण बैठाने में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वाली पार्टी ने मंडल की राजनीति से निकली पार्टियों को पीछे छोड़ दिया। उसका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अब हिंदू-मुस्लिम और हिंदुओं में भी अगड़े-पिछड़े-दलित का समीकरण बैठाने में बदल गया है। उसकी राजनीति में देश की संस्कृति और राष्ट्रवाद लेशमात्र बचे हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और गांधीवादी समाजवाद से चल कर भाजपा अब मंडल की राजनीति तक पहुंची है और मंडलवादी पार्टियों का बड़ा क्लोन बन रही है। वह सिर्फ मंडल राजनीति के पीछे नहीं जा रही है, बल्कि इन दिनों फैशन बन गए मुफ्त की चीजें बाटने की राजनीति में भी सबको पीछे छोड़ रही है। वह एक-एक किलो के पैकेट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की फोटो छाप कर नमक, सोयाबीन तेल और दाल बांट रही है। उसने मतदाताओं को भिखारियों की श्रेणी में ला दिया है।

भाजपा ने भले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को छोड़ दिया लेकिन उसकी देखा-देखी अब कांग्रेस पार्टी इसकी राजनीति करने लगी है, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। अगर राहुल गांधी हिंदू और हिंदुत्ववाद का फर्क समझा रहे हैं तो उसका एकमात्र मकसद खुद को नरेंद्र मोदी से ज्यादा हिंदू साबित करना है। यह बात कांग्रेस के नेता कह नहीं रहे हैं लेकिन वे अब ज्यादा जोर से राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति कर रहे हैं। अपनी जाति बताने, धर्म और गोत्र बताने और मंदिर-मंदिर माथा टेकने के बाद अब राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा दोनों उस राजनीति में उलझे हैं, जिसे पीछे छोड़ कर भाजपा एक कदम आगे बढ़ गई है। कांग्रेस के नेता उस लकीर को पीट रहे हैं, जिससे कुछ हासिल नहीं होने वाला है। कांग्रेस की अपनी एक विचारधारा रही है और 136 साल की ऐतिहासिक विरासत है, जिसे छोड़ कर वह भाजपा का क्लोन बनने की राजनीति कर रही है।

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‘पोस्ट आइडियोलॉजी’ राजनीति का सबसे बड़ा खिलाड़ी आम अरविंद केजरीवाल को माना जा सकता है। उनकी आम आदमी पार्टी किसी विचारधारा पर आधारित नहीं है। उसने गवर्नेंस के एजेंडे को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। लेकिन उसके लिए भी अब गवर्नेंस की शास्त्रीय परिभाषा का कोई मतलब नहीं है। गवर्नेंस का मतलब अब यह रह गया है कि बुनियादी अवसरंचना की परियोजनाओं को रद्द कर या स्थगित कर लोगों को मुफ्त में कुछ चीजें उपलब्ध कराना। दिल्ली में सरकार बनने के बाद केजरीवाल ने दो सौ यूनिट बिजली मुफ्त कर दी, हर महीने 21 हजार लीटर पानी फ्री कर दिया, मुफ्त वाई-फाई शुरू करा दी और अब यहीं मॉडल लेकर वे पंजाब, गोवा, उत्तराखंड में घूम रहे हैं। वहां वे एक कदम आगे बढ़ गए और बिजली, पानी फ्री करने के साथ साथ हर महिला को एक हजार रुपए महीना देने का ऐलान कर दिया। उन्होंने बुजुर्गों को मुफ्त में तीर्थयात्रा भी शुरू करा दी है। कैसी भेड़चाल है कि केजरीवाल ने बुजुर्गों को ट्रेन में बैठा कर अयोध्या भेजा तो उसके एक हफ्ते बाद ही भाजपा ने महिलाओं को ट्रेन में बैठा कर दिल्ली से अयोध्या रवाना किया।

बिना विचारधारा की राजनीति करने वाली दूसरी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को लगा कि मुफ्त चीजें देने की घोषणा में वह कैसे पीछे रहे तो उसने भी ऐलान कर दिया कि गोवा में उसकी सरकार बनी तो वह हर परिवार की महिलाओं के लिए पांच हजार रुपया महीना देगी। उधर केंद्र सरकार 10 करोड़ किसानों को हर महीने पांच सौ रुपए दे रही है। इसके जवाब में कांग्रेस ने नया सोचा, कल्पनाशीलता दिखाई तो न्याय योजना ले आई और कहा कि उसकी सरकार बनी तो किसानों को हर महीने छह हजार रुपए दिए जाएंगे। यह नकल की अंधी होड़ का नतीजा है। नेताओं की सारी कल्पनाशीलता इसमें खत्म हो रही है कि क्या क्या मुफ्त में देने की घोषणा की जा सकती है। जैसे तमिलनाडु की पार्टियों ने वाशिंग मशीन, सिलाई मशीन, मिक्सर-ग्राइंडर और मंगलसूत्र आदि मुफ्त में देना शुरू किया था उसी तरह उत्तर भारत की पार्टियां अब साइकिल, स्कूल ड्रेस, लैपटॉप, स्मार्ट फोन और स्कूटी बांट रही हैं या बांटने की घोषणा कर रही हैं। दक्षिण भारत में अब नेता एक कदम आगे बढ़ गए हैं और अपने चुनाव चिन्ह वाले लिफाफे में नकद डाल कर लोगों तक पैसे पहुंचा रहे हैं। तेलंगाना में यह मामला इतना चर्चित हुआ कि मतदाताओं ने आंदोलन छेड़ दिया कि उन्हें पैसे मिलेंगे तभी वे वोट डालने जाएंगे। सोचें, कैसा पतन है राजनीति का!

कुल मिला कर देश की राजनीति यही हो गई है कि एक नेता दो चीजें मुफ्त देने की बात कहे तो दूसरे को चार चीजें मुफ्त में देनी चाहिए। एक नेता एक हजार रुपए दे रहा है तो दूसरा पांच हजार या छह हजार देने की घोषणा करे। एक नेता जय श्रीराम का नारा लगाए तो दूसरे को हर हर महादेव, तीसरे को जय बजरंगबली और चौथे को जय मां काली का नारा लगाना चाहिए। एक नेता राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करे और पाकिस्तान को गालियां दे तो दूसरे को आगे बढ़ कर पाकिस्तान के साथ साथ चीन को भी गाली देनी चाहिए। एक राष्ट्रवादी है तो दूसरे को ज्यादा उग्र राष्ट्रवादी दिखना चाहिए। एक हिंदुवादी है तो दूसरे को ज्यादा उग्र हिंदुवादी बन जाना चाहिए। एक खैरात बांट रहा है तो दूसरे को उससे ज्यादा खैरात बांटनी चाहिए। किसी को न तो कल्पनाशीलता दिखाने की जरूरत है और न विचारधारात्मक प्रतिबद्धता की कोई जरूरत है। इसका अंत नतीजा यह हुआ है कि पार्टियों के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया है। सब एक दूसरे के क्लोन की तरह दिख रहे हैं। यह भारतीय राजनीति, भारत महान, 140 करोड़ लोग और लोकतंत्र सबके लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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