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आर्थिक बदहाली असली मुद्दा

बिल क्लिंटन ने 1992 के राष्ट्रपति चुनाव में यह जुमला बोला था- इट्स द इकोनॉमी स्टूपिड! उस समय अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही थी। लोगों की आर्थिक स्थिति खराब थी और रोजगार का बड़ा संकट था। तब क्लिंटन ने अर्थव्यवस्था को चुनाव का मुद्दा बनाया था। यह जोखिम भरा फैसला था क्योंकि तब के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने पहला खाड़ी युद्ध छेड़ कर किसी भी ‘नेशनल पॉपुलिस्ट’ की तरह अपनी जीत की गारंटी बनवाई थी। उन्होंने 1991 में कुवैत पर हमला किया था और उसके बाद अमेरिकी नागरिकों का 91 फीसदी समर्थन उनके साथ था। एक ही साल बाद 1992 में अमेरिका की अर्थव्यवस्था की बदहाली ने पासा पलट दिया। लेकिन उसके लिए बिल क्लिंटन और उनकी प्रचार टीम को इसे बड़ा मुद्दा बनाना पड़ा। उन्होंने जोखिम लेकर रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं के संकट को मुद्दा बनाया। एक भावनात्मक मुद्दे के ऊपर जीवन से जुड़े रोजमर्रा के संकट को चुनाव की थीम बनाया था।

क्या आज भारत में हालात आर्थिक मंदी वाले नहीं हैं? क्या आज लोगों के सामने रोजगार का संकट नहीं है? क्या आज समाज के हर वर्ग के सामने महंगाई की समस्या नहीं है? क्या आज हर नागरिक की प्राथमिक चिंता बेहतर स्वास्थ्य सेवा की नहीं है? लेकिन अफसोस की बात है कि कोई भी विपक्षी पार्टी इनको चुनावी मुद्दा नहीं बना रही है। भारतीय जनता पार्टी विपक्षी पार्टी के तौर पर पंजाब में चुनाव लड़ रही है लेकिन वह भी प्रधानमंत्री की जान को खतरा, गुरु गोविंद सिंह के साहिबजादों की शहादत और राष्ट्रीय सुरक्षा को मुद्दा बना रही है। इसी तरह बाकी चार राज्यों में कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां भाजपा के खिलाफ लड़ रही हैं पर वे भाजपा की ओर से बनाए जा रहे सांप्रदायिक नैरेटिव के जाल में फंसी हैं। अन्यथा कोई कारण नहीं था कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी चुनाव की घोषणा के बाद कहते कि ‘यह नफरत को हराने का मौका है’। निःसंदेह समाज में फैलाई जा रही नफरत को भी हराना है लेकिन जो नफरत फैला रहे हैं और जिनके खिलाफ नफरत फैलाई जा रही है, दोनों के जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला मुद्दा तो अर्थव्यवस्था का है!

नरेंद्र मोदी 2014 में मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों को चुनावी लाभ के मुद्दों के तौर पर इस्तेमाल कर चुके हैं। ‘बहुत हुई महंगाई की मार अबकी बार मोदी सरकार’ या ‘बहुत हुई पेट्रोल-डीजल की मार अबकी बार मोदी सरकार’ या ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ जैसे नारे प्रत्यक्ष रूप से लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के वादे से जुड़े हुए थे। मोदी के हिंदू हृदय सम्राट वाली छवि उस समय एक अंतरधारा की तरह बह रही थी और ऊपर से गुजरात मॉडल के जरिए विकास की गंगा बहाने का वादा किया जा रहा था। यह भले एक छलावा साबित हुआ लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि विकास का भ्रमजाल रचने वाले लोक लुभावन नारों ने लोगों को आकर्षित किया था और तभी मनमोहन सिंह से उम्मीद लगाने वाला मध्य वर्ग पूरी तरह से भाजपा के साथ चला गया और निम्न मध्य वर्ग व गरीबों को भी मोदी में ज्यादा संभावना दिखी।

इसके बावजूद अफसोस की बात है कि विपक्षी पार्टियां उसके बाद किसी भी चुनाव में महंगाई, बेरोजगारी, विकास दर, मुद्रा की कीमत जैसी आर्थिक वास्तविकताओं को मुद्दा नहीं बना पाईं। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले सात साल की तुलना अगर मनमोहन सिंह के पहले सात साल से करें तो फर्क अपने आप दिखेगा। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के पहले सात साल में औसत विकास दर 8.4 फीसदी रही थी, जबकि मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के पहले सात साल में औसत विकास दर 4.8 फीसदी रही है। पिछले दो साल की विकास दर का कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि ये दो साल तो अर्थव्यवस्था के ग्राफ में से ही गायब हो गए हैं। चालू वित्त वर्ष में विकास दर 9.2 फीसदी रहने का अनुमान है। अगर ऐसा होता भी है तब चालू वित्त वर्ष के आखिरी दिन यानी 31 मार्च 2022 को देश की अर्थव्यवस्था का आकार उतना ही बड़ा रहेगा, जितना बड़ा 31 मार्च 2019 को था।

सोचें, दो साल से देश अपनी जगह पर खड़ा-खड़ा कदमताल कर रहा है और इस बीच देश के अरबपतियों की संपत्ति 313 अरब डॉलर से बढ़ कर 596 अरब डॉलर यानी लगभग दोगुनी हो गई। अरबपतियों की संख्या के मामले में भारत दुनिया का तीसरा देश बन गया। मुकेश अंबानी की दौलत 93 अरब डॉलर हो गई तो गौतम अडानी की संपत्ति 77 अरब डॉलर हो गई और वे एशिया के दूसरे सबसे अमीर आदमी बन गए। यह चमत्कार कैसे हुआ? देश की जीडीपी दो साल पहले की स्थिति में अटकी है, आम आदमी की आमदनी घट रही है, बेरोजगारी 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है, थोक महंगाई का आंकड़ा 14 फीसदी से ऊपर के रिकार्ड स्तर पर है, 23 करोड़ के करीब लोग गरीबी रेखा के नीचे पहुंच गए, आर्थिक विषमता किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा हो गई, मुद्रा की कीमत 75 रुपए की रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंच गई, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत उस वादे से ढाई गुना ज्यादा हो गई है, जो 2014 में किया गया था, मेक इन इंडिया के वादे के बावजूद आयात बढ़ रहा है, चीन पर निर्भरता बढ़ रही है, व्यापार संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है, लोगों की बचत कम हो रही है, बैंक दिवालिया हो रहे हैं इसके बावजूद चुनिंदा उद्योगपतियों की संपत्ति बढ़ रही है!

देश में आज भी सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला सेक्टर कृषि है। देश की 60 फीसदी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है लेकिन सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इसका हिस्सा घट कर 15 फीसदी हो गया है। सोचें, 1967 में जीडीपी में कृषि का हिस्सा 43 फीसदी था और तब 80 फीसदी लोग इस पर निर्भर थे। अब कृषि पर निर्भर आबादी में 20 फीसदी की कमी आई है और जीडीपी में कृषि का हिस्सा एक-तिहाई रह गया है। किसानों की आय दोगुनी करने का जुमला अब बंद कर दिया गया है क्योंकि देश के किसानों को पांच सौ रुपए महीने की ‘सम्मान राशि’ दी जाने लगी है। देश को पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की जुमलेबाजी भी अब नहीं हो रही है क्योंकि देश अब विकास के रास्ते से उतर ‘न्यू वेलफेयरिज्म’ के रास्ते पर चल पड़ा है। ‘न्यू वेलफेयरिज्म’ का जुमला अरविंद सुब्रह्मण्यम ने गढ़ा था, जो नरेंद्र मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। अब यहीं जुमला चुनाव जीतने का मूलमंत्र बन गया है और किसी पार्टी में साहस नहीं है कि वह इससे अलग हट कर सोचे और जोखिम लेकर जनता के सामने असली मुद्दे उठाए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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