nayaindia up assembly election 2022 अखिलेश क्यों आत्मघात कर रहे हैं?
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अखिलेश क्यों आत्मघात कर रहे हैं?

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समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भगवान परशुराम का फरसा उठा रहे हैं और भगवान श्रीकृष्ण रोज उनके सपने में आ रहे हैं! परशुराम और कृष्ण दोनों को साधने की अखिलेश की यह राजनीति उनको कहां पहुंचाएंगी? क्या वे इससे धर्म की राजनीति में भाजपा को मात दे देंगे? क्या उनको लग रहा है कि भगवान परशुराम का फरसा उठा कर वे ब्राह्मण या सवर्ण वोट हासिल कर लेंगे? इस तरह की गलतफहमी हर नेता को होती है, पता नहीं कैसे होती है! लेकिन भारतीय जनता पार्टी को ऐसी कोई गलतफहमी नहीं है। उसको पता है कि मुस्लिम और यादव उसको वोट नहीं देंगे तो उसके नेता खुलेआम कह रहे हैं कि हमको इनके वोट नहीं चाहिए। उलटे उनको भड़काने और अपने से दूर करने की राजनीति कर रहे हैं ताकि दूसरे जातीय समूहों के वोट एकजुट कर सकें। लोकतंत्र में इसे कोई अच्छी राजनीति नहीं कह सकते हैं और न किसी भी तर्क से इसे सही ठहरा सकते हैं लेकिन यह चुनाव जीतने का भाजपा का फॉर्मूला है। इसके जवाब में भाजपा को चुनौती दे रही पार्टी के नेता अगर फरसा उठाने और कृष्ण भगवान के सपने में आने की बात कर रहे हैं तो फिर भगवान ही मालिक है! up assembly election 2022

अखिलेश यादव ने नए साल के पहले चार दिन में परशुराम और कृष्ण की जो राजनीति की है पहले उसका संदर्भ समझना जरूरी है। उत्तर प्रदेश में यह धारणा बनी है कि ब्राह्मण समाज योगी आदित्यनाथ से नाराज है क्योंकि उनके पांच साल के राज में ब्राह्मणों पर जुल्म हुए हैं। सैकड़ों की संख्या में ब्राह्मण मारे गए हैं और शासन-प्रशासन में ब्राह्मणों का महत्व घटा है। यह भी धारणा है कि मुख्यमंत्री ने हिंदू धर्म की बजाय राजपूत जाति को बढ़ावा देने की राजनीति की। लेकिन क्या इस धारणा की वजह से आम ब्राह्मण भाजपा से दूर होकर समाजवादी पार्टी के साथ चला जाएगा? ब्राह्मण मतदाताओं के नाराज होने की धारणा का भाजपा को पता है और इसलिए वह ब्राह्मणों को मनाने के प्रयास में लगी है। इसी से अखिलेश यादव और उनके चुनाव रणनीतिकारों को एक मौका दिखा और उनको लगा कि वे ब्राह्मणों को अपने साथ लाने का प्रयास करें। सो, उन्होंने भगवान परशुराम का फरसा उठा लिया।

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इसी तरह भाजपा ने मथुरा पर जिस तरह से फोकस किया है उससे अखिलेश को अपने यादव वोट की चिंता सताने लगी है। उनको लगा कि कहीं भाजपा ने मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर की मुक्तिका अभियान छेड़ा और अयोध्या, काशी के बाद सचमुच मथुरा की बारी आ गई तो इससे श्रीकृष्ण के वंशज यानी यादव समाज के मतदाता भी डोल सकते हैं और एक हिस्सा भाजपा के साथ जाने की सोच सकता है। संभवतः इस चिंता में अखिलेश ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण रोज उनके सपने में आते हैं और कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की ही सरकार बनेगी। कायदे से अखिलेश को यादव वोट की चिंता नहीं करनी चाहिए। यह वोट उनको छोड़ कर कहीं नहीं जा रहा है लेकिन इसकी चिंता करके वे अपनी कमजोरी जाहिर कर रहे हैं।

इस तरह की राजनीति करके समाजवादी पार्टी किसी कीमत पर भाजपा को नहीं हरा सकती है क्योंकि यह सपा की बुनियादी राजनीतिक रणनीति के विरूद्ध है और भाजपा की राजनीतिक रणनीति के अनुकूल है। भाजपा इस राजनीति की माहिर खिलाड़ी है। उसको इस राजनीति के सारे दांव-पेंच मालूम हैं। अयोध्या से लेकर काशी तक उसने जैसी राजनीति की है वह सपा के वश की बात नहीं है। हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कराने के लिए भाजपा के नेता जिस तरह के बयान देते हैं और सरकार के स्तर पर जिस तरह के नीतिगत काम हो रहे हैं, उनका जवाब भी सपा के पास नहीं है। बहस के लिए कह सकते हैं कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने भी चंडीपाठ किया था। लेकिन वह तर्क उत्तर प्रदेश में लागू नहीं होता हैं। बंगाल की संस्कृति और जनमानस में चंडीपाठ शामिल है इसलिए जय श्रीराम के नारे लगा रही भाजपा के खिलाफ ममता ने उसका इस्तेमाल कर लिया। उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं है। वहां अखिलेश परशुराम या श्रीकृष्ण की बात करके कोई कंट्रास्ट नहीं बना रहे हैं, बल्कि भाजपा की ही राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं और खुद को भाजपा के नकली उत्पाद के रूप में पेश कर रहे हैं। 

अब सवाल है कि अखिलेश या उनकी पार्टी का मजबूत पक्ष क्या है, जिसकी राजनीति करके वे भाजपा को चुनौती दे सकते हैं? वह मजबूत पक्ष है सामाजिक समीकरण और सरकार की विफलता। ध्यान रहे मुलायम सिंह पिछड़े पावें सौ में साठवाली राजनीति से आगे बढ़े हैं। उस राजनीति में हमेशा धर्म की बजाय जाति को प्रमुखता दी गई है। मंडल की राजनीति ने जब पिछड़ी जातियों को एकजुट करना शुरू किया था तभी भाजपा ने मंदिर का आंदोलन छेड़ा था। आज भी भाजपा जाति की राजनीति को लेकर बैकफुट पर है। अखिलेश के पास जातीय जनगणना का एक अचूक दांव है। फरसा लहराने और श्रीकृष्ण को याद करने की बजाय अगर वे इस बात पर अड़े रहें कि उनकी सरकार बनी तो जाति आधारित जनगणना कराएंगे और पिछड़ों को उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण देंगे तो यह दांव उनके लिए बहुत कारगर साबित हो सकता है। आबादी के अनुपात में आरक्षण बढ़ाने की बात, गैर यादव पिछड़ी जातियों के वोट को अपने साथ करने की भाजपा की रणनीति पर चोट करेगी। हो सकता है कि इससे सवर्ण मतदाता भाजपा के पक्ष में एकजुट हों लेकिन वैसे भी उसका बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से भाजपा के साथ ही रहता है।

अखिलेश का दूसरा मजबूत दांव डबल इंजन की सरकार की विफलता का हो सकता है। बिहार में लालू प्रसाद की गैरहाजिरी में चुनाव लड़े तेजस्वी यादव ने इसी को मुद्दा बनाया था। वे रोजगार के मुद्दे पर अड़े रहे थे। मंदिरों में घंटी बजाने नहीं गए और न परशुराम का फरसा उठाया। वे अपनी हर सभा में रोजगार की बात करते रहे। उन्होंने आर्थिक बदहाली का मुद्दा उठाया और नौजवानों को भरोसा दिलाया कि उनकी सरकार आई तो वे सबको रोजगार देंगे। अखिलेश ने जिस तरह छोटी-छोटी पार्टियों से तालमेल किया है उसी तरह तेजस्वी ने भी बिहार में किया था और जातीय समीकरण ठीक रखते हुए रोजगार के मुद्दे पर डटे रहे थे। इसी वजह से वे केंद्र और राज्य की बड़ी ताकत और समूचे तंत्र से सफलतापूर्वक लड़ते रहे और राजद को सबसे बड़ी पार्टी बनाए रखने में सफल हुए। अखिलेश को उसी तरह की राजनीति करनी चाहिए। आज भी रोजगार और आर्थिक बदहाली आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता है। इसलिए भाजपा के पाले में जाकर उसी के दांव-पेंच से लड़ने की बजाय उनको भाजपा को खींच कर आपने पाले में लाने की कोशिश करनी चाहिए। तभी वे उससे लड़ भी पाएंगे और जीतने की संभावना भी बनाए रख पाएंगे। up assembly election 2022

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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