up election BSP vote बसपा का वोट निर्णायक होगा
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बसपा का वोट निर्णायक होगा

up election BSP vote

उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी इकलौती पार्टी है, जिसने अभी तक ऐलान किया है कि वह प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर अकेले लड़ेगी। बाकी पार्टियां गठबंधन कर रही हैं, कर चुकी हैं या गठबंधन के लिए पार्टियों की तलाश कर रही हैं। बसपा ने चुनावी तैयारी भी बाकी पार्टियों से पहले शुरू की। ब्राह्मण सम्मेलन पहले उसने किया उसके बाद भाजपा ने शुरू किया। इसके बावजूद माना जा रहा है कि इस बार के मुकाबले में बसपा बाहर है और इस बार मायावती के वोट शेयरों में भारी गिरावट होगी। पिछले कई चुनावों से उनका वोट शेयर 20 फीसदी के आसपास रहता है। लेकिन इस बार इसके आधा रह जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भी बसपा के बहुत खराब प्रदर्शन का अनुमान लगाया जा रहा है।

तभी सारी पार्टियों की नजर बसपा के वोट पर है। पर बड़ा सवाल यह है कि बसपा का वोट किसके साथ जाएगा? यह यक्ष प्रश्न है और उत्तर प्रदेश चुनाव में यह फैक्टर सबसे निर्णायक होगा कि बसपा का वोट किसके साथ जाता है। भाजपा अपने 40 फीसदी वोट के आधार को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। लेकिन इस बार किसान आंदोलन की वजह से जाटों की नाराजगी और ब्राह्मण मतदाताओं की दूरी या तटस्थता ने भाजपा की मुश्किल बढ़ाई है। इसलिए भाजपा का प्रयास मायावती के वोट में सेंध लगाने का है। उसकी कोशिश है कि जाट, ब्राह्मण और महंगाई के कारण मध्यवर्ग के वोटों का जो नुकसान होगा उसकी भरपाई दलित खास कर जाटव वोट से की जाए। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी का प्रयास अपने यादव-मुस्लिम समीकरण में अति पिछड़ी और दलित जातियों को जोड़ने का है।

सपा नेता अखिलेश यादव दलित और अति पिछड़ी जातियों के नेताओं को जोड़ रहे हैं। छोटी-छोटी जितनी पार्टियों से उन्होंने तालमेल किया है वो सारी पार्टियां ऐसी ही हैं। ओमप्रकाश राजभर, संजय चौहान, केशव देव मौर्य और कृष्णा पटेल ऐसे ही जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके साथ सपा ने तालमेल किया है। धारणा बनाने या चुनाव से पहले अपनी मजबूती का मैसेज देने के लिए यह अच्छी रणनीति है। राजभर मतदाताओं के बीच ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का अच्छा आधार है और पूर्वी उत्तर प्रदेश की 20 सीटों पर वे प्रभावी हो सकते हैं। इसी तरह मध्य उत्तर प्रदेश में कई क्षेत्रों में कुर्मी मतदाताओं के बीच कृष्णा पटेल के प्रति सद्भाव है। केशव देव मौर्य भी सीमित ही सही लेकिन कोईरी मतदाताओं में असर रखते हैं। संजय चौहान का नोनिया मतदाताओं में ठीक-ठाक असर है। बसपा से आए दलित-पिछड़े नेताओं को अखिलेश यादव ने महत्व भी दिया है और उनके सहारे बसपा के वोट में सेंध लगाने का प्रयास कर रहे हैं। 

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लेकिन पारंपरिक रूप से कमजोर व वंचित तबके का वोट सपा के साथ नहीं जाता है। इसे और बारीकी से देखें तो सपा और बसपा का कोर वोट एक-दूसरे के प्रति अविश्वास रखता है। तभी पिछले लोकसभा चुनाव में साथ लड़ कर भी दोनों पार्टियां कोई चमत्कार नहीं कर सकीं क्योंकि दोनों का वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर नहीं हुआ। तीन दशक पहले जब मुलायम सिंह और मायावती साथ आए थे तब भी विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां दो सौ सीट के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाई थीं। जबकि बिहार में राजद और जदयू साथ आए तो उन्हें छप्पर फाड़ बहुमत मिला। बहरहाल, बसपा और सपा दोनों के मतदाताओं के बीच इस अविश्वास की वजह से बसपा के कोर वोट के एकमुश्त सपा की ओर जाने की संभावना कम दिख रही है।

इस लिहाज से फिलहाल भाजपा के लिए बेहतर संभावना दिखती है। बसपा के कोर वोट का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जा सकता है। इसके कई कारणों में से एक कारण यह भी है कि मायावती के बारे में यह धारणा बनी है कि वे भाजपा के प्रति नरम रुख रखे हुए हैं। यह धारणा भाजपा को फायदा पहुंचाएगी। दूसरे, समाज की सबसे वंचित और कमजोर जातियां कभी भी दबंग जातियों के प्रतिनिधित्व वाली प्रादेशिक पार्टियों के साथ नहीं जाती हैं। उत्तर भारत में यह स्थिति लगभग सभी राज्यों में देखी जा सकती है।

बिहार में दलित का वोट आमतौर पर राजद के साथ नहीं जाता है या हरियाणा में दलित वोट इंडियन नेशनल लोकदल के साथ नहीं जाता है। उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी सबसे कमजोर व वंचित जातियों का वोट सपा के साथ नहीं जाता है। तभी अगर बसपा का वोट टूटता है और उसको लड़ाई से बाहर मान कर उसका कोर वोटर नया विकल्प देखता है तो संभव है कि उसकी नजर में सपा से बेहतर भाजपा दिखे।

ऊपर से भारतीय जनता पार्टी मायावती के वोट और उनकी पूरी पार्टी पर पहले से नजर गड़ाए बैठी है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि जितनी भी प्रादेशिक पार्टियां ऐसी हैं, जिनका नेतृत्व परिवार के अंदर ट्रांसफर नहीं हुआ है या जहां मौजूदा नेता के परिवार में विरासत संभालने वाला कोई मजबूत चेहरा नहीं है उन पार्टियों पर भाजपा की नजर है। बसपा उन्हीं में से एक पार्टी है। बिहार में जदयू, ओड़िशा में बीजू जनता दल और तमिलनाडु में अन्ना डीएमके भी ऐसी ही पार्टियां हैं। बहरहाल, भाजपा की उत्तर प्रदेश चुनाव की पूरी रणनीति में दलित वोट का खासा महत्व है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में वह मायावती के कोर वोट को अपने साथ लाने का प्रयास कर रही है। भाजपा को पता है कि किसानों की नाराजगी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसको नुकसान पहुंचा सकती है। इसकी भरपाई के लिए वह दलित और खास कर जाटव वोट को आकर्षित करने की राजनीति कर रही है। इसके लिए उसने उत्तराखंड की राज्यपाल रहीं बेबी रानी मौर्य को राजभवन से निकाला, उनको पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया और उनका चेहरा आगे करके नया जाटव नेतृत्व उभरने का मैसेज दे रही है।

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यहां कांग्रेस की भूमिका बन सकती थी लेकिन कांग्रेस जमीनी स्तर पर बहुत कमजोर है। प्रियंका गांधी वाड्रा के दौरे, रैलियों और कुछ नाटकीय प्रभाव पैदा करने वाले घटनाक्रमों से झाग पैदा करने के अलावा कांग्रेस कुछ खास नहीं कर पाई है। कांग्रेस न ब्राह्मण मतदाताओं में यह भरोसा पैदा कर पाई है कि वह भाजपा का विकल्प है और न दलित व मुस्लिम मतदाताओं में ऐसा कोई मैसेज बना है। यह जरूर है कि उसकी चर्चा होने लगी है और प्रियंका के आकर्षण से कुछ नए लोग पार्टी के साथ जुड़े हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कांग्रेस चौथी या  पांचवीं पोजिशन से ऊपर आ जाएगी। अगर कांग्रेस ने पहले से मेहनत की होती और कम से कम जिला स्तर तक भी अपना संगठन मजबूत किया होता तो वह बसपा के कमजोर होने का फायदा उठा सकती थी। लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया है। कांग्रेस के पास संगठन नहीं है, चुनाव लड़ने और वोट कराने वाली मशीनरी नहीं है और प्रदेश के मजबूत नेता पार्टी छोड़ कर चले गए हैं या जा रहे हैं। सो, कांग्रेस की कमजोरी और सपा से पारंपरिक दूरी से भाजपा के लिए मौका है कि वह बसपा का वोट अपनी ओर करे। यह नहीं कहा जा सकता है कि वह कितनी कामयाब होगी लेकिन यह तय है कि बसपा का वोट टूट कर जिसकी ओर जाएगा वहीं चुनाव जीतेगा।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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