Women's Reservation Priyanka Gandhi महिला आरक्षण या प्रियंका का फॉर्मूला?
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महिला आरक्षण या प्रियंका का फॉर्मूला?

Women's Reservation Priyanka Gandhi

आखिरी बार महिला आरक्षण बिल की चर्चा पिछले महीने सुनाई दी थी, जब महिला आरक्षण बिल के लोकसभा में पेश होने के 25 साल पूरे हुए थे। सितंबर 1996 में एचडी देवगौड़ा की सरकार ने यह बिल लोकसभा में पेश किया था, जिसमें संसद और राज्यों की विधायिका में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव किया गया था। संयुक्त संसदीय समिति को विचार के लिए भेजे जाने से पहले जब इस बिल पर चर्चा शुरू हुई थी तब कहा गया था कि ‘यह भारत के इतिहास का बेहद खास दिन है’…! निश्चित रूप से वह बेहद खास दिन था लेकिन दुर्भाग्य से वह दिन नहीं आया, जब यह बिल भारतीय संसद से पास हो। यह दुनिया के संसदीय इतिहास का सबसे अनोखा मामला होगा, जिसमें पिछले ढाई दशक से सत्तारूढ़ पार्टियां कहती रही हैं कि बिल पास हो, मुख्य विपक्षी पार्टियां कहती रही हैं कि बिल पास हो, संसद की तीसरी, चौथी सबसे बड़ी पार्टियां भी कहती रही हैं कि बिल पास हो, लेकिन बिस पास नहीं होता है! Women’s Reservation Priyanka Gandhi

जाहिर है जो पार्टियां चाहती हैं उनका चाहना भी दिखावटी है अन्यथा कोई कारण नहीं है कि जब कांग्रेस, भाजपा, लेफ्ट जैसी पार्टियां चाहतीं हों और बिल पास नहीं हो। सो, इसे पार्टियों की हिप्पोक्रेसी या दोहरा रवैया कह सकते हैं, जिसकी वजह से बिल पास नहीं हो रहा है। लेकिन समय के साथ और महिला सशक्तिकरण के छोटे-छोटे उपायों की वजह से महिलाएं राजनीति में अपना स्पेस बना रही हैं। एक स्वतंत्र मतदाता समूह के रूप में उनका उभार राजनीतिक क्षितिज पर स्पष्ट दिख रहा है। एक कांस्टीट्यूएंसी के रूप में महिला मतदाताओं का उभार बिहार से लेकर ओड़िशा और पश्चिम बंगाल में हाल में हुए विधानसभा चुनावों में दिखा है। महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले डेढ़ से चार फीसदी तक ज्यादा मतदान किया है। इसलिए पार्टियों की मजबूरी हो गई है कि वे इस स्वतंत्र मतदाता समूह का ध्यान रखें। जिस तरह जातियों और धार्मिक समूहों की संख्या के आधार पर राजनीति में भागीदारी बनती रही है उसी तरह महिलाओं की भागीदारी बनने लगी है।

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देश में आर्थिक बदलावों की तरह इस बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की शुरुआत भी पीवी नरसिंह राव की सरकार ने ही थी। नरसिंह राव सरकार ने 1993 में संविधान संशोधन का एक बिल पास किया था, जिसके तहत पंचायत चुनावों में 33 फीसदी ग्राम पंचायत महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। इसके तहत रैंडम सेलेक्शन के जरिए 33 फीसदी पंचायत महिला घोषित करने की व्यवस्था हुई। बाद में कई राज्य सरकारों ने इसे अपने यहां अलग अलग तरीके से लागू किया। बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने स्थानीय निकायों में 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कीं। बिहार विधानसभा का 2010 का चुनाव इस लिहाज से मील का पत्थर माना जा सकता है। उसी चुनाव में पहली बार बिहार में महिलाओं ने स्वतंत्र मतदाता समूह के रूप में मतदान किया और तीन-चौथाई से ज्यादा बड़े बहुमत से नीतीश कुमार की सत्ता में वापसी सुनिश्चित की। हालांकि यह अलग बात है कि नीतीश कुमार ने कभी भी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में महिलाओं को उनकी आबादी के अनुपात में टिकट देने का प्रयत्न नहीं किया।

लेकिन अब राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका है। पिछले लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 19 पर महिलाओं को उतारा। ओड़िशा में भी नवीन पटनायक ने बिना किसी कानूनी या संवैधानिक बाध्यता के 33 फीसदी टिकट महिलाओं को दी और अब कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महिलाओं को 40 फीसदी टिकट देने का ऐलान किया है। स्थानीय निकाय चुनावों में महिलाओं को कानूनी बाध्यता की वजह से आरक्षण मिलता रहा है लेकिन विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टियों ने उन्हें बिना किसी कानूनी बाध्यता के 33 फीसदी या उससे ज्यादा सीटें देने की शुरुआत की है तो यह इस बात का संकेत है कि महिला मतदाता समूह का महत्व उनको समझ में आ गया है।

एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के तौर पर अभी इसे रेखांकित नहीं किया जा रहा है या यह ज्यादा बड़े विमर्श का विषय नहीं बना है लेकिन असलियत यह है कि महिला कांस्टीट्यूएंसी का इमरजेंस भारतीय राजनीति की बहुत बड़ी परिघटना है। इससे पूरी राजनीति बदलने वाली है। जो नेता यह कहते हुए महिला आरक्षण का विरोध करते थे कि अगर 33 फीसदी आरक्षण का कानून बना तो परकटी महिलाएं संसद और विधानसभाओं में पहुंचेंगी उनकी अपनी बेटियां या बहुएं चुनाव लड़ कर जीत-हार रही हैं। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण दिए जाने का इस आधार पर विरोध हो रहा था कि इससे महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं हो रहा है क्योंकि उनकी जगह घर के पुरुष ही कामकाज संभालते हैं। बिहार और दूसरे कई राज्यों में भी मुखिया पति और सरपंच पति की कहानियां खूब प्रचलित हुईं। लेकिन वह कोई नई बात नहीं थी। जब भी किसी पिछड़े या वंचित समूह को एफरमेटिव एक्शन के जरिए मुख्यधारा में लाने का प्रयास होता है तो शुरुआत में ऐसा ही होता है। अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी पहले ज्यादातर डमी उम्मीदवार ही जीतते थे। इलाके के मजबूत नेता अपने खास लोगों को टिकट दिला कर उन्हें संसद और विधानसभाओं में भेजते थे। लेकिन अब इन समूहों के सशक्तिकरण से स्वाभाविक रूप से उनका अपना नेतृत्व विकसित हुआ है। इसी तरह समय के साथ महिलाओं का भी नेतृत्व विकसित हो रहा है।

जब भी महिला आरक्षण की बात होती है या उसे संसद में पास कराने पर चर्चा होती है तो एक तर्क यह दिया जाता है कि अगर पार्टियां चाहें तो इस कानून की जरूरत ही नहीं पड़ेगी क्योंकि टिकटों का फैसला अंततः पार्टियां करती हैं। इससे भी पार्टियों की हिप्पोक्रेसी पहले से जाहिर होती रही है। कांग्रेस और भाजपा दोनों महिला आरक्षण बिल का समर्थन करते रहे हैं लेकिन अपनी प्रेरणा से कभी उन्होंने महिलाओं को 33 फीसदी टिकट नहीं दी। अगर वे चाहते तो बिल पास हुए बगैर भी महिलाओं को 33 फीसदी या उससे ज्यादा टिकट दे सकते थे। अब देर से ही सही लेकिन पार्टियों न इसकी शुरुआत कर दी है। उन्होंने महिलाओं को 33 फीसदी की आरक्षण की सीमा से ज्यादा भागीदारी देनी शुरू की है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि इससे आरक्षण की जरूरत खत्म हो गई है। ममता बनर्जी ने लोकसभा में 40 फीसदी टिकट महिलाओं को दी लेकिन विधानसभा चुनाव में यह अनुपात घट कर 20 फीसदी पर आ गया। आज भी संसद में महिलाओं की भागीदारी के लिहाज से दुनिया के 193 देशों की सूची में भारत में 148वें स्थान पर है। अगर आरक्षण लागू होता है तो यह स्थिति एक झटके में बदल जाएगी और अगर आरक्षण नहीं लागू होता है तो महिलाएं अपने संघर्ष से अपना मुकाम हासिल करेंगी। एक स्वतंत्र मतदाता समूह के रूप में उनका उभार पार्टियों को मजबूर करेगा कि वे उन्हें बराबर भागीदारी दें। लेकिन अगर आरक्षण की व्यवस्था के साथ साथ पार्टियां भी प्रगतिशील हो जाएं तो दो बड़े बदलाव हो सकते हैं। वे बिना कानून के महिलाओं की भागीदारी बढ़ा सकती हैं और आपराधिक तत्वों की भागीदारी कम कर सकती हैं।

सकी शुरुआत कर दी है। उन्होंने महिलाओं को 33 फीसदी की आरक्षण की सीमा से ज्यादा भागीदारी देनी शुरू की है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि इससे आरक्षण की जरूरत खत्म हो गई है। ममता बनर्जी ने लोकसभा में 40 फीसदी टिकट महिलाओं को दी लेकिन विधानसभा चुनाव में यह अनुपात घट कर 20 फीसदी पर आ गया। आज भी संसद में महिलाओं की भागीदारी के लिहाज से दुनिया के 193 देशों की सूची में भारत में 148वें स्थान पर है। अगर आरक्षण लागू होता है तो यह स्थिति एक झटके में बदल जाएगी और अगर आरक्षण नहीं लागू होता है तो महिलाएं अपने संघर्ष से अपना मुकाम हासिल करेंगी। एक स्वतंत्र मतदाता समूह के रूप में उनका उभार पार्टियों को मजबूर करेगा कि वे उन्हें बराबर भागीदारी दें। लेकिन अगर आरक्षण की व्यवस्था के साथ साथ पार्टियां भी प्रगतिशील हो जाएं तो दो बड़े बदलाव हो सकते हैं। वे बिना कानून के महिलाओं की भागीदारी बढ़ा सकती हैं और आपराधिक तत्वों की भागीदारी कम कर सकती हैं।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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