अमेरिका की एक और ऐतिहासिक भूल | afghanistan taliban takeover
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अमेरिका की एक और ऐतिहासिक भूल!

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afghanistan taliban takeover : अमेरिका एक बार फिर ऐतिहासिक भूल कर रहा है या ऐसे कह सकते हैं कि वह कूटनीति और सामरिक नीति में अपनी ऐतिहासिक भूलों को दोहरा रहा है। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों का जल्दबाजी में वापस लौटना और लौटने से पहले दुनिया भर में आतंकवाद फैलाने वाली नर्सरी यानी तालिबान से वार्ता करके उसे वैधता देना ऐसी गलती है, जिसका खामियाजा अमेरिका या दक्षिण एशिया के देशों को ही नहीं भुगतना होगा, बल्कि सारी दुनिया भुगतेगी।

इससे पहले अमेरिका ने वैश्विक सामरिक नीति और कूटनीति में जो गलतियां की हैं, उनका खामियाज एक-दो देशों को भुगतना पड़ा है। जैसे वियतनाम से अमेरिका के लौटने पर वहां के निरकुंश शासन की बर्बरता का शिकार होकर कोई 80 हजार लोग मारे गए थे या कंबोडिया में चीन समर्थक खमेर रूज को सत्ता सौंपने से वहां के स्थानीय लोगों को बर्बरता और क्रूरता का शिकार होना पड़ा था। लेकिन अफगानिस्तान छोड़ने और तालिबान को वैधता दिलाने का खामियाजा पूरी दुनिया भुगतेगी। अमेरिका खुद इससे अछूता नहीं रहेगा। afghanistan taliban takeover

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यह सही है कि अमेरिकी फौजें हमेशा के लिए अफगानिस्तान में रहने नहीं आई थीं। लेकिन यह भी सही है कि अमेरिका ने 20 साल पहले तालिबान के शासन वाले अफगानिस्तान पर हमला किया था तो उसका मकसद तालिबान को खत्म करना था। उसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई थी लेकिन यह अमेरिका का संकल्प था कि उसे तालिबान को खत्म करना है। फिर वह तालिबान को खत्म करने की बजाय उसे बातचीत के जरिए वैधता दिला कर और अफगानिस्तान की सत्ता में हिस्सेदारी दिलाने का प्रयास करके क्यों वापस लौट रहा है? क्या अमेरिका को अभी यह नहीं दिख रहा है कि तालिबान के लड़ाके किस मंशा से काबुल पर काबिज होना चाहते हैं?

अमेरिका का आखिरी सैनिक अभी अफगानिस्तान से नहीं लौटा है लेकिन यह हकीकत है कि उसने लड़ाई बंद कर दी है। एक जुलाई को जिस दिन अमेरिकी सेना ने बगराम एयरबेस अफगानिस्तान को सौंपा उसी दिन से उसकी लड़ाई बंद हो गई और उसी दिन से तालिबान फौजों के पूरी ताकत से काबुल की ओर बढ़ने का सिलसिला भी शुरू हो गया। यह तथ्य है कि तालिबान के लड़ाके अफगानिस्तान के एक चौथाई हिस्से पर कब्जा कर चुके हैं। हालांकि उनका दावा आधे से ज्यादा हिस्से पर कब्जा कर लेने का है। वे काबुल के बाद अफगानिस्तान के दूसरे सबसे बड़े शहर कंधार के काफी करीब पहुंच गए हैं तभी भारत सरकार को कंधार के वाणिज्य दूतावास से अपने राजनयिकों को वापस बुलाना पड़ा। कंधार और मजार ए शरीफ से भारत के राजनयिक और सुरक्षाकर्मी वापस लौट चुके हैं। अगर तालिबान की बढ़त ऐसे ही कायम रही तो इस साल के अंत तक या अगले साल के शुरू में काबुल पर उनका कब्जा होगा।

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तभी सवाल है कि अगर तालिबान का अफगानिस्तान के शासन पर कब्जा हो जाता है और जैसा कि उन्होंने ऐलान किया है, वे शरीयत कानून लागू कर देते हैं और उनकी आतंकवाद की नर्सरी फलने-फूलने लगती है तो अमेरिका को 20 साल की लड़ाई में क्या हासिल होगा? अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपना अभियान तालिबान को खत्म करने के लिए शुरू किया था और अब तालिबान को ज्यादा मजबूत बना कर उसकी फौजें लौट रही हैं। यह अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन की बहुत बड़ी गलती साबित होगी। यह राष्ट्रपति बाइडेन की गलती इसलिए है क्योंकि अमेरिका के ज्यादातर सैन्य जनरल इस समय अफगानिस्तान से वापसी के पक्ष में नहीं थे।

उन सबकी राय को और यहां तक कि आंकड़ों को भी दरकिनार कर बाइडेन ने यह फैसला किया है। वे बार बार सवाल उठा रहे हैं कि कब तक अमेरिकी जानों को जोखिम में डाला जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिकी जान का जोखिम अब लगभग खत्म हो गया है। पिछले साढ़े सात में सिर्फ 99 अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में मरे हैं, जबकि पिछले डेढ़ साल में किसी की जान नहीं गई है। अफगानिस्तान में 20 साल के अभियान में अमेरिका ने अपने करीब ढाई हजार जवान गंवाएं हैं, जबकि अफगानिस्तान के 28 हजार से ज्यादा सैनिक तालिबान से लड़ते हुए मारे गए हैं। बाइडेन ने फैसला करने से पहले वियतनाम की लड़ाई के आंकड़े भी नहीं देखे। वियतनाम में अमेरिका इससे कम समय तक लड़ा था लेकिन वहां 58 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए थे।

बाइडेन प्रशासन ने न सिर्फ इन तथ्यों की अनदेखी की है, बल्कि भविष्य के खतरे का आकलन करने में भी विफल रहा है। अमेरिका को तालिबान का इतिहास पता है और तालिबान लड़ाकों ने अपनी मंशा का स्पष्ट संकेत भी दे दिया है। वे दूर-दराज के इलाकों में स्थानीय लड़ाकों को इकट्ठा कर रहे हैं और अफगान फौजों पर हमला कर रहे हैं। उनके हथियार छीन रहे हैं और हथियार लहराते हुए काबुल की ओर बढ़ रहे हैं। वे ताकत के दम पर काबुल पर कब्जा करना चाहते हैं। यह अपने आप में इस बात का सबूत है कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी संगठन से हार कर वापस लौट रही है। इससे तालिबान के साथ साथ दुनिया के दूसरे आतंकवादी संगठनों का भी हौसला बढ़ेगा। एक तरह से अमेरिका पूरी दुनिया को असुरक्षित बना कर अफगानिस्तान से लौट रहा है।

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राष्ट्रपति बनने के बाद से बाइडेन ने पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कई फैसले पलटे हैं। इसलिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी कि वे तालिबान और ट्रंप प्रशासन के बीच पिछले साल फरवरी में हुए समझौते को पलट देते। उन्होंने ऐसा नहीं किया इसका मतलब है कि वे भी इस बात से सहमत थे कि अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से लौटना चाहिए। ट्रंप ऐसे मामलों में मनमाने फैसले करते थे लेकिन बाइडेन से ऐसे फैसले की उम्मीद नहीं थी, जिसमें अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति, उसके भू-राजनीतिक महत्व और सामरिक स्थिति की अनदेखी करके उसे तालिबान के हवाले छोड़ दिया जाए। क्या बाइडेन प्रशासन को इस बात का अंदाजा नहीं है कि तालिबान को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने खड़ा किया है और अब भी रावलपिंडी से तालिबान को भरपूर मदद मिल रही है? क्या बाइडेन प्रशासन को यह पता नहीं है कि पाकिस्तान पूरी तरह से चीन की कॉलोनी बन गया है और अफगानिस्तान की सामरिक स्थिति का फायदा चीन उठा सकता है? चीन, पाकिस्तान और रूस तीनों द्वारा तालिबान को स्वीकृति और समर्थन देना दुनिया के लिए कैसा खतरा पैदा कर सकता है क्या इसका अंदाजा बाइडेन प्रशासन को नहीं है?

इन तमाम तथ्यों के बावजूद अमेरिका के वापस लौटने का एक कारण उसका यह भरोसा है कि उसने आतंकवाद से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तैयार किया है और इसलिए तालिबान से डरने की जरूरत नहीं है। लेकिन मुश्किल यह है कि अगर तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया और सांस्थायिक तरीके से आतंकवाद को पनाह मिलने लगी तो अमेरिका का आंतकवाद विरोधी नेटवर्क ज्यादा काम नहीं कर पाएगा। इसका सबसे बड़ा खतरा भारत के लिए पैदा होगा। दुनिया ने देखा है कि कैसे 1996 में नजीबुल्ला की हत्या और तालिबान के काबुल की सत्ता पर काबिज होने के बाद पाकिस्तान को भारत के खिलाफ छद्म युद्ध चलाने में मदद मिली थी। पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों को प्रशिक्षित करने का काम अफगानिस्तान में किया गया और भाड़े के अफगान लड़ाकों को कश्मीर घाटी में आतंकवाद फैलाने के लिए भेजा गया। सो, कह सकते हैं कि एक बार फिर नब्बे के दशक के आतंकवाद के दिनों की वापसी हो रही है, जिसने अमेरिका को सबसे गहरा घाव दिया था तो भारत को भी बुरी तरह से घायल किया था। afghanistan taliban takeover afghanistan taliban takeover afghanistan taliban takeover 

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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