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टीम को बिखरा छोड़ गए कोहली!

Virat Kohli Test captain

कोहली और शास्त्री की कमान ने भारतीय टीम को ऐसे मुकाम पर छोड़ा है, जहां सब कुछ बिखरा हुआ है। कप्तान कौन होगा, सलामी जोड़ी किन दो खिलाड़ियों की होगी, स्थायी ऑलराउंडर कौन है, तेज और स्पिन दोनों गेंदबाजी का धारदार अटैक किन खिलाड़ियों से बनेगा, यह सब नए कप्तान को और नए कोच राहुल द्रविड को तय करना Virat Kohli Test captain

विराट कोहली की बतौर कप्तान इससे बेहतर विदाई होनी चाहिए थी। लेकिन क्या कीजिएगा इस देश में चाहे कोई भी खेल हो, उसके कप्तान या खिलाड़ी की विदाई शायद ही कभी सम्मानजनक हुई होगी। सुनील गावस्कर जैसे एकाध अपवाद हैं, जिन्होंने खेल को अलविदा कहा तो लोग पूछ रहे थे कि अभी क्यों! अन्यथा बाकी खिलाड़ियों से तो यही पूछा जाता है कि अभी तक क्यों नहीं! कपिलदेव से लेकर सचिन तेंदुलकर तक कोई इसका अपवाद नहीं है। कप्तान के रूप में विराट कोहली की विदाई भी इसका अपवाद नहीं है। कप्तान की जिम्मेदारी उनके लिए बोझ बन गई थी, वे बतौर कप्तान भी नया कुछ नहीं कर पा रहे थे और इसका असर उनके खेल पर भी पड़ रहा था। दो साल से उनके टेस्ट शतक का इंतजार किया जा रहा है। इस दौरान उनके जैसी प्रतिभा वाले समकालीन खिलाड़ियों, जो रूट और बाबर आजम ने कई कई शतक लगाए।

सो, कह सकते हैं कि अच्छा हुआ, जो उन्होंने कप्तानी छोड़ दी। दक्षिण अफ्रीका जाने से पहले चयनकर्ताओं ने उनको एकदिवसीय क्रिकेट की कप्तानी से हटा दिया था और उससे पहले टी-20 के विश्व कप से ठीक पहले उन्होंने खुद क्रिकेट के सबसे छोटे फॉर्मेट की कप्तानी छोड़ दी थी। इस तरह करीब एक दशक बाद वे कप्तानी की जिम्मेदारी से पूरी तरह से मुक्त हो गए हैं। हो सकता है कि आने वाले दिनों में वे टी-20 क्रिकेट से भी संन्यास लें और टेस्ट व एकदिवसीय यानी पांरपरिक व शास्त्रीय क्रिकेट पर ध्यान केंद्रित करें। तभी अब उम्मीद की जा सकती है कि बतौर बल्लेबाज विराट कोहली का सर्वश्रेष्ठ देखने को मिलेगा। एक समय उम्मीद की जा रही थी कि वे सचिन तेंदुलकर के तमाम क्रिकेटिंग रिकार्ड तोड़ देंगे। सचिन ने एक सौ अंतरराष्ट्रीय शतक बनाए हैं, जबकि कोहली के 70 अंतरराष्ट्रीय शतक हैं। अंतर इतना है कि 70 अंतरराष्ट्रीय शतक तक पहुंचने में कोहली ने सचिन से कम पारियां खेली हैं। अभी उनके अंदर इतना क्रिकेट बचा है और उनकी फिटनेस ऐसी है कि वे अगले पांच साल खेल सकते हैं और तब टेस्ट क्रिकेट का बेहतरीन औसत का डॉन ब्रेडमैन के रिकार्ड के अलावा शायद ही कोई रिकार्ड होगा, जो कोहली के नाम नहीं होगा। इसलिए महान बल्लेबाज कोहली के कप्तानी छोड़ने का जश्न मनाया जाना चाहिए।

इसके साथ ही बतौर कप्तान उनके योगदान का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण होना चाहिए। आंकड़ों के हिसाब से वे भारत के सबसे सफल कप्तान हैं। उन्होंने 68 मैचों में भारत की कप्तानी की, जिसमें से भारत 40 मैचों में जीता, 17 में भारतीय टीम हारी और 11 मैच बराबरी पर खत्म हुए। इस तरह उनकी जीत का औसत 58.82 यानी करीब 59 फीसदी का है। पचास से ज्यादा मैचों में कप्तान रहे दुनिया के सिर्फ दो ही खिलाड़ियों का रिकार्ड इससे बेहतर है। दोनों ऑस्ट्रेलिया के हैं- स्टीव वॉ और रिकी पोंटिंग। इन दोनों की टेस्ट कप्तानी में सफलता का औसत 60 से ऊपर है। इन तीन खिलाड़ियों के अलावा चार ही खिलाड़ी और हैं, जिन्होंने 50 से ज्यादा मैचों में कप्तानी की और जीत का औसत 50 फीसदी या उससे ऊपर रहा। कोहली, वॉ और पोंटिंग के अलावा ग्रीम स्मिथ, हैंसी क्रोनिए, माइकल वॉन, विवियन रिचर्ड्स और मार्क टेलर।

सो, विश्व क्रिकेट में सात कप्तान हुए, जिन्होंने 50 से ज्यादा टेस्ट मैचों में कप्तानी की और जिनकी जीत का औसत 50 फीसदी या उससे ऊपर रहा। इस सूची में विराट कोहली तीसरे स्थान पर है। कोहली के अलावा बाकी छह कप्तानों में एक बात कॉमन थी कि सब बेहद शांत और ठंडे दिमाग के खिलाड़ी थी। क्रिकेट के मैदान पर इनमें से किसी खिलाड़ी ने शायद ही कभी अपनी भावनाओं का इजहार किया। इनके खेल और कप्तानी का तरीका जरूर आक्रामक था, लेकिन अपना निजी व्यवहार कभी आक्रामक नहीं रहा। ऑस्ट्रेलिया के तीन कप्तान इस सूची में हैं, जिनकी टीम ऑनफील्ड बदतमीजी में सबसे माहिर रही है लेकिन कभी इन तीनों कप्तानों का आक्रामक व्यवहार खेल के मैदान में नहीं दिखा। यह एक बड़ा फर्क है। बाकी छह से अलग विराट हमेशा आक्रामक रहे और मैदान में भी अपनी भावनाओं का इजहार खुल कर करते रहे। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता है कि वे इसी वजह से कप्तान के रूप में सफल हुए। हां, उनकी आक्रामकता और मैदान में भावनाओं के इजहार से वे और टीम कई बार मुश्किल में फंसे। बतौर कप्तान दक्षिण अफ्रीका का उनका आखिरी दौरा भी इसका अपवाद नहीं रहा।

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अजहरूद्दीन ने एक बार कहा था कि कोई भी कप्तान उतना ही अच्छा होता है, जितनी अच्छी टीम होती है। इस लिहाज से विराट कोहली सौभाग्यशाली रहे कि उनको बहुत शानदार टीम मिली। उनसे पहले महेंद्र सिंह धोनी का भी सौभाग्य था, जो सौरव गांगुली ने एक बेहतरीन टीम तैयार करके उनके लिए छोड़ी। एक तरह से गांगुली ने जो टीम बनाई और भारतीय टीम के अंदर जीत का जो जज्बा पैदा किया, जैसी मानसिकता बनाई, उस पूंजी पर धोनी और कोहली सफल कप्तान बने। लेकिन क्या कोहली अपने पीछे वैसी टीम बना कर गए हैं? आंकड़े चाहे उनकी सफलता की जैसी कहानी बताएं पर यह हकीकत है कि वे अपने पीछे एक बिखरी हुई टीम छोड़ कर गए हैं। यह उनकी और रवि शास्त्री दोनों की साझा विफलता है। दोनों ने हनुमा विहारी, चेतेश्वर पुजारा और अजिंक्य रहाणे को लेकर जो प्रयोग किए वो विफल रहे। रविचंद्र अश्विन बनाम कुलदीप यादव का विवाद भारतीय क्रिकेट टीम के लिए बड़ा सेटबैक था।

यह सही है कि कोहली अपनी बल्लेबाजी प्रतिभा के साथ टीम के लिए ऊर्जा और फिटनेस लेकर आए थे, इसके बावजूद टीम फिटनेस के मोर्चे पर कई बरसों से जूझ रही है। रविंद्र जडेजा संभवतः इकलौता प्रयोग हैं, जो सफल रहा है। फिटनेस में भी वे विराट की तरह रहे। लेकिन बाकी कोई खिलाड़ी विराट कोहली की तरह न फिट रहा और उस ऊर्जा के साथ खेलता रहा। इस लिहाज से कह सकते हैं कि पारंपरिक भारतीय टीम में कोहली ऊर्जा और फिटनेस के एक अपवाद की तरह रहे हैं। भारत के पास बहुत मजबूत बेंचस्ट्रेंग्थ है और अनेक बेहतरीन खिलाड़ी फेंस पर बैठ कर मौके का इंतजार कर रहे हैं पर इसमें कोहली या उनके पूर्ववर्ती कप्तान धोनी का कोई योगदान नहीं है। कोहली और शास्त्री की कमान ने भारतीय टीम को ऐसे मुकाम पर छोड़ा है, जहां सब कुछ बिखरा हुआ है। कप्तान कौन होगा, सलामी जोड़ी किन दो खिलाड़ियों की होगी, स्थायी ऑलराउंडर कौन है, तेज और स्पिन दोनों गेंदबाजी का धारदार अटैक किन खिलाड़ियों से बनेगा, यह सब नए कप्तान को और नए कोच राहुल द्रविड को तय करना है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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