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प्रशांत किशोर की बातों के भरोसे भाजपा!

भारतीय जनता पार्टी की आईटी सेल ने चाय की प्याली में तूफान उठाया हुआ है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की कुछ पत्रकारों के साथ एक सोशल मीडिया साइट पर हुई बातचीत के कुछ ऑडियो क्लिप जारी करके आईटी सेल ने दावा किया है कि तृणमूल कांग्रेस ने हार मान ली है। अभी तक भाजपा के छोटे-छोटे नेता इस ऑडियो क्लिप के आधार पर भाजपा की जीत और तृणमूल की हार का दावा कर रहे हैं, लेकिन बड़े और ‘महान’ नेताओं द्वारा भी इसे दोहराया जाना महज वक्त की बात है। चुनाव के मध्य में इस तरह की बातों के आधार पर कोई दूसरी पार्टी जीत का दावा करती तो उसे डेस्पेरेट अटेंम्प्ट’ यानी घबराहट में किया जाने वाला प्रयास बताया जाता, डूबते को तिनके का सहारा कहा जाता, लेकिन चूंकि यह बात भाजपा कह रही है इसलिए यह मास्टर स्ट्रोक माना जाएगा।

लेकिन असलियत यह है कि प्रशांत किशोर ने इस बातचीत में कोई नई या अनोखी बात नहीं कही है। जो लोग इस बातचीत के आधार पर जीत का निष्कर्ष निकाल रहे हैं उन्होंने भी अगर दो हफ्ते पहले अंग्रेजी के अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के एक्सप्रेस अड्डा कार्यक्रम में प्रशांत किशोर का इंटरव्यू देखा-पढ़ा होता तो उनको पता होता कि इस ऑडियो क्लिप में कही गई, ज्यादातर बातें उन्होंने उस इंटरव्यू में भी  कही थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की बात हो या दलित समुदाय के भाजपा के पक्ष में मतदान करने की बात हो या ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एंटी इंन्कंबैंसी होने की बात हो, ये सारी बातें प्रशांत किशोर ने एक्सप्रेस अड्डा कार्यक्रम के अपने इंटरव्यू में कही थी। उस समय किसी ने इस बात को नोटिस ही नहीं किया क्योंकि वह एक खुला इंटरव्यू था। लेकिन वहीं बातें अब एक सोशल मीडिया साइट पर कही गईं तो उसे एक स्कूप के तौर पर, एक खुलासे या एक स्वीकारोक्ति के तौर पर सनसनी बना कर पेश किया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि सोशल मीडिया में कथित तौर पर कही गई प्रशांत किशोर की बातों पर तो भाजपा भरोसा है लेकिन वहीं प्रशांत किशोर जब कहते हैं कि भाजपा को एक सौ सीट नहीं मिलेगी, तो भाजपा इसे नहीं स्वीकार करती है।

बहरहाल, सब अपने अपने तरीके से प्रशांत किशोर की बातों की व्याख्या कर रहे हैं। जैसे भाजपा के प्रति सहानुभूति रखने वाले एक सैफोलॉजिस्ट ने ट्विट करके कहा कि वे प्रशांत किशोर का सम्मान करने लगे हैं क्योंकि उन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण को लेकर वह बात कही है, जो वे 20 साल पहले कहते थे। अब सोचें, पश्चिम बंगाल में या पूरे देश में ही भाजपा विरोधी पार्टियों द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण किए जाने और इस वजह से सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण होने की बात कौन सी नई बात है, जो प्रशांत किशोर ने कही है! क्या 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बुरी तरह से हारने के बाद यही बात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने नहीं कही थी? चुनाव के बाद एंटनी कमेटी बनी थी और उस कमेटी ने विधिवत रिपोर्ट तैयार करके कांग्रेस अध्यक्ष को दी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि पूरे देश में कांग्रेस की छवि मुस्लिमपरस्त पार्टी की बन गई है, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है।

एके एंटनी का कहना प्रशांत किशोर के मुकाबले ज्यादा स्पष्ट था और उसके बाद से ही देश में कांग्रेस सहित कई पार्टियों के नेताओं का सार्वजनिक व्यवहार बदला है, जिनमें ममता बनर्जी भी शामिल हैं। प्रशांत किशोर ने एक्सप्रेस अड्डा के अपने इंटरव्यू में यह बात कही थी कि बंगाल में भाजपा के प्रयासों से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ है। लेकिन खुद ही सवालिया लहजे में कहा कि क्या यह ध्रुवीकरण इतना है कि भाजपा को चुनाव जीता सके? बंगाल में भाजपा के तमाम प्रयासों और आठ चरण के चुनाव में चोटीवाले, दाढ़ीवाले करने या बांग्लादेश-पाकिस्तान का जिक्र लाने या एंटी रोमियो स्क्वॉयड बनाने के वादों के बावजूद ध्रुवीकरण इतना नहीं है कि भाजपा स्पष्ट बहुमत पाती हुई दिखे। अब अगर भाजपा यह उम्मीद कर रही है कि प्रशांत किशोर की बात पूरे बंगाल में जंगल की आग की तरह फैल जाएगी और सारे लोग एकजुट होकर भाजपा को वोट दे देंगे तो यह उसकी गलतफहमी साबित होगी। क्योंकि प्रशांत किशोर बंगाल चुनाव में अहम नहीं हैं और न उनके नाम पर चुनाव लड़ा जा रहा है। वहां अहमियत सिर्फ ममता बनर्जी की है!

‘नरेंद्र मोदी बहुत लोकप्रिय हैं और अनेक लोग उनमें भगवान की छवि देखते हैं’, प्रशांत किशोर की इस बात में भी क्या नया है? पिछले ही दिनों उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कहा कि जिस तरह से लोग भगवान राम की पूजा करते हैं उसी तरह से कुछ दिन के बाद नरेंद्र मोदी की भी करने लगेंगे। भाजपा के अनेक नेताओं ने इस तरह की भावना प्रकट की है। नागरिकों का भी एक समूह है, जो मोदी में अपना रक्षक या मसीहा देखता है। इसके साथ ही यह भी हकीकत है कि मोदी की यह लोकप्रियता उनको लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटें दिला देती है पर राज्यों में यह लोकप्रियता काम नहीं आती है। वहां मतदान अलग मुद्दों पर और अलग चेहरों पर होता है। कई राज्यों के अनुभव से यह बात प्रमाणित है। मई 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद ही महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और दिल्ली के चुनावों में यह बात प्रमाणित हुई है कि मोदी की लोकप्रियता राज्यों में भाजपा को जीत नहीं दिला सकती है।

प्रशांत किशोर ने मोदी को लोकप्रिय बताने वाली जो बात कही है, वह पूरा वाक्य इस तरह है- बंगाल में मोदी भी ममता बनर्जी की तरह लोकप्रिय हैं। यानी ममता बनर्जी तो लोकप्रिय है हीं, मोदी भी उन्हीं की तरह लोकप्रिय हैं। अब सवाल है कि बंगाल का चुनाव क्या नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा जा रहा है या नरेंद्र मोदी को चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनना है? जब उनको नहीं बनना है और ममता बनर्जी भी उन्हीं की तरह लोकप्रिय हैं तो लोग ममता बनर्जी को वोट क्यों नहीं देंगे? प्रशांत किशोर की कही लोकप्रियता वाली इस बात का जो स्वाभाविक मतलब निकलता है वह निकालने की बजाय भाजपा के नेता दो में दो जमा करके छत्तीस नतीजा निकाल रहे हैं।

जहां तक एंटी इन्कंबैंसी की बात है तो 10 साल के राज के बाद हर सत्तारूढ़ दल के खिलाफ होती है। पांच साल राज करने के बाद 2016 में ममता बनर्जी को प्रो इन्कंबैंसी का वोट मिला था। लोगों ने दिल खोल कर उनको वोट दिए थे, जिसकी वजह से उनकी सीटें 2011 के 194 के मुकाबले बढ़ कर 211 हो गई थीं। नरेंद्र मोदी तब केंद्र में प्रधानमंत्री बन गए थे और तब भी बहुत लोकप्रिय थे, लेकिन उनकी पार्टी सिर्फ तीन सीट जीत पाई थी। अब ममता बनर्जी को 10 साल हो गए हैं तो एक निश्चित मात्रा में एंटी इन्कंबैंसी होगी, जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता है। सवाल है कि क्या प्रशांत किशोर ने इस कथित बातचीत में यह कहा है कि ममता के खिलाफ इतनी एंटी इन्कंबैंसी है कि वे चुनाव हार जाएंगी? उन्होंने ऐसा नहीं कहा है। इसी एंटी इन्कंबैंसी को दूर करने के लिए उन्होंने अनेक किस्म की रणनीति अपनाई है। ममता को दीदी से बेटी बनाने का नारा भी इस रणनीति के तहत दिया गया। भाजपा ने खुद ही तृणमूल के दर्जनों विधायकों को टिकट देकर तृणमूल सरकार के खिलाफ एंटी इन्कंबैंसी को काफी हद तक कम कर दिया है।

भाजपा ने जो कथित बातचीत लीक की है, उसमें प्रशांत किशोर ने एक बहुत मार्के की बात कही है। उन्होंने कहा है कि चूंकि बंगाल के लोगों ने भाजपा का राज नहीं देखा है इसलिए एक अनदेखे राज के लिए उनके मन में आकर्षण है। पिछले सात साल में यह चीज कई राज्यों में देखने को मिली है। जहां भाजपा का शासन था वहां पार्टी को चुनावों में नुकसान हुआ लेकिन जिन राज्यों में भाजपा का शासन नहीं था वहां लोगों ने अनदेखे राज के आकर्षण में उसे वोट दिया। असम और हरियाणा में यह देखने को मिला। लेकिन अनेक दूसरे राज्यों में ऐसा नहीं हुआ। इसलिए यह कहना गलत होगा कि बंगाल में भाजपा के अनदेखे राज के प्रति ऐसा अदम्य आकर्षण है कि लोग उसकी सरकार लाकर दम लेंगे।

जहां तक दलित मतदाताओं के भाजपा का समर्थन करने की बात है तो यह भी छिपी हुई बात नहीं है। भाजपा ने मतुआ समाज के शांतनु ठाकुर को लोकसभा की टिकट दी थी और उनको सांसद बनाया था। पिछले दिनों बांग्लादेश दौरे में भी प्रधानमंत्री मोदी मतुआ समाज के पारंपरिक मंदिर में गए थे। इसलिए मतुआ, नामशुद्र या राजबंशी समुदाय का बहुसंख्यक वोट भाजपा की ओर जा रहा है, यह कोई नई बात नहीं है। हिंदी भाषी लोगों का समर्थन भाजपा को मिलने की बात भी नई बात नहीं है। सो, जो बातें अलग अलग तरह से पहले से कही जा रही हैं या एक हकीकत के रूप में स्थापित हैं और खुद प्रशांत किशोर ने भी कही हैं, उन बातों की सनसनी बनाना कोई बहुत समझदारी की बात नहीं कही जाएगी। सो, भले भाजपा के नेता और बुद्धिनिरपेक्ष प्रतिबद्ध मीडिया के लोग इसे ‘मास्टर स्ट्रोक’ कहे लेकिन यह एक ‘डेस्पेरेट अटेम्प्ट’ से ज्यादा कुछ नहीं है।

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