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ज्यादा बड़ी लड़ाई बंगाल की है!

सब लोग पूछ रहे हैं कि प्रधानमंत्री कोरोना वायरस से लड़ाई पर ध्यान क्यों नहीं दे रहे हैं? क्यों वे पश्चिम बंगाल की चुनावी लड़ाई को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं? क्यों वे तमाम आलोचनाओं से बेपरवाह पश्चिम बंगाल में रैलियां कर रहे हैं? पिछली बार यानी कोरोना वायरस की पहली लहर के समय प्रधानमंत्री ने खुद कमर कसी थी और कोरोना के खिलाफ जंग की कमान संभाली थी। उन्होंने कई बार टेलीविजन पर आकर देश को संबोधित किया। लोगों को ढाढस बंधाई। ताली-थाली बजवाए और दीये भी जलवाए। जैसा भी हो एक आर्थिक पैकेज भी घोषित कराया। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। इस बार प्रधानमंत्री मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार कर रहे हैं और उससे फुरसत मिलने पर कभी कभार अधिकारियों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के साथ बैठक कर ले रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री, जिन्होंने पहली लहर में कोरोना संक्रमित होने के बावजूद वायरस के खिलाफ जंग में सक्रिय भूमिका निभाई थी और अस्पतालों तक का दौरा किया था, वे भी इस बार चुनाव प्रचार में ही बिजी हैं।

सवाल है कि क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह यह नहीं समझ रहे हैं कि देश के सामने कोरोना वायरस का बहुत बड़ा संकट आया हुआ है और इससे करोड़ों लोगों की जान और उनका जहान दोनों खतरे में हैं? क्या वे यह नहीं समझ रहे हैं कि देश और दुनिया उनको देख रही है कि कैसे वे कोरोना के खिलाफ लड़ाई को स्थगित करके बंगाल के चुनाव में अपने को झोंके हुए हैं? क्या वे दोनों इस बात को नहीं समझ रहे हैं कि उन्होंने जितनी ताकत, जितने संसाधन और जितनी बुद्धि पश्चिम बंगाल के चुनाव में लगाई है उतनी अगर कोरोना से लड़ने में लगाई होती तो इस समय देश के हालात अलग होते? ये सारी बातें दोनों समझ रहे हैं पर इसके साथ ही उनको यह भी भरोसा है कि जब चुनावी राजनीति की बात होगी तो उस समय यह नहीं देखा जाएगा कि उनकी सरकार ने कोरोना को कैसे हैंडल किया, बल्कि यह देखा जाएगा कि उन दोनों ने अपनी पार्टी को कितने चुनाव जिताए।

असल में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने अपने बारे में ऐसी धारणा बनवा दी है, जिसमें उनके हार्डकोर समर्थक हमेशा उन्हें जीतते हुए देखना चाहते हैं। अगर कहीं इन दोनों की जोड़ी चुनाव हारी भी है तो सोशल मीडिया में यह प्रचार हुआ है कि ये हार रणनीतिक है। जहां हार को रणनीतिक नहीं प्रचारित किया गया है वहां तोड़-फोड़ करके वापस भाजपा की सरकार बनाई गई है। तभी इन दोनों को पता है कि इनका चुनाव हार जाना इनके कोर समर्थकों के लिए सदमे की तरह होगा। उसमें भी पश्चिम बंगाल का मामला विशेष है। सो, एक बार कोरोना की लड़ाई भले हारी जा सकती है पर बंगाल की लड़ाई हारना नरेंद्र मोदी और अमित शाह अफोर्ड नहीं कर सकते हैं।

कोरोना की लड़ाई में देश के लोगों को और सिस्टम को भगवान भरोसे छोड़ कर पश्चिम बंगाल के चुनाव में खुद को झोंकने का पहला कारण खुद की बनवाई यह धारणा है कि मोदी और शाह चुनाव नहीं हार सकते हैं। उन्होंने अगर कमर कस ली है और खुद को झोंक दिया है तो जीत निश्चित होगी। दूसरा कारण पश्चिम बंगाल की विशिष्टता है। पश्चिम बंगाल दूसरे राज्यों से अलग है। वह देश का तीसरा मुस्लिम बहुल राज्य है, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी के करीब है। सो, यह नई प्रयोगशाला है, जहां ध्रुवीकरण की राजनीति का प्रयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है। इसकी दूसरी विशिष्टता यह है कि यह सेकुलर राजनीति के एकाध बचे-खुचे गढ़ में से एक है, जिसे ध्वस्त कर देने का वास्तविक मौका इस बार मोदी और शाह को दिख रहा है। तीसरी विशिष्टता यह है कि पूर्वी भारत में अब तक कमजोर या हाशिए की पार्टी रही भाजपा को बंगाल की जीत के जरिए इस क्षेत्र में राजनीतिक रूप से स्थापित किया जा सकता है। यहां से समूचे पूर्वोत्तर, ओड़िशा, बिहार और झारखंड की राजनीति को नियंत्रित किया जा सकता है।

इस चुनाव की चौथी विशिष्टता यह है कि सर्वाधिक मुस्लिम बहुल आबादी वाले पहले दो राज्यों में भाजपा ऐन-केन प्रकारेण शासन कर चुकी है। सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले जम्मू कश्मीर में पहले उसने पीडीपी के साथ सरकार बनाई और अब उसका विशेष राज्य का दर्जा खत्म करके उप राज्यपाल के जरिए शासन अपने हाथ में ले रखा है। दूसरे सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले राज्य असम में भाजपा पांच साल तक सरकार चला चुकी है और इस बार भी सत्ता हासिल करने के पूरे भरोसे में है। हालांकि चुनाव की जमीनी रिपोर्ट कुछ और इशारा कर रही है।

बहरहाल, सोचें अगर जम्मू कश्मीर, असम और पश्चिम बंगाल तीनों राज्यों में भाजपा का शासन होता है तो भाजपा ब्रांड पोलिटिक्स का पूरे देश में क्या असर बनेगा! लेकिन अगर बंगाल हार गए तो क्या होगा? इससे यह मैसेज नहीं बनेगा कि मुस्लिम मतदाताओं ने एकजुट होकर भाजपा को हरा दिया, बल्कि यह मैसेज होगा कि बहुसंख्यक हिंदुओं ने एकजुट होकर भाजपा को वोट नहीं दिया और भाजपा या मोदी-शाह ब्रांड की राजनीति को खारिज कर दिया। ध्यान रहे पिछले सात साल में सोशल मीडिया के जरिए यह धारणा बनाई गई है कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के डर से हिंदू सरस्वती पूजा नहीं कर पाते हैं या उनको दुर्गापूजा करने से रोका जाता है, सरकारें मुस्लिमपरस्ती करती हैं आदि आदि। चुनाव प्रचार में भाजपा के नेता खुल कर इन बातों का जिक्र कर रहे हैं। इसके बावजूद अगर बंगाल नहीं जीते तो मुसलमानों की वजह से हिंदुत्व के खतरे में होने की जो विनिर्मित धारणा है उस पर सवाल खड़े होंगे। इस धारणा को बाकी सभी राज्यों में चुनौती मिलेगी और फिर हिंदुत्व की रक्षा के लिए किसी 56 इंची छाती वाले मर्द हिंदुवादी नेता की जरूरत खत्म होनी शुरू हो जाएगी। फिर आम नागरिकों का फोकस गवर्नेंस, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधा, रक्षा नीति, कूटनीति आदि पर बनेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री इस बात को समझ रहे हैं कि कोरोना संक्रमण की महामारी को ठीक तरीके से हैंडल नहीं करने की वजह से उनकी आलोचना हो रही है। उनको यह भी पता है कि सरकार के शीर्ष स्तर की लापरवाही से करोड़ों लोगों का जीवन संकट में पड़ा है। वे यह भी जानते हैं कि समय रहते संकट का प्रबंधन नहीं हुआ तो यह महामारी भयावह रूप लेगी। लेकिन इसके साथ ही उनको यह भी पता है कि अगर बंगाल नहीं जीत सके तो उनके लिए बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा होगा। इसलिए कोरोना की जंग जीत कर करोड़ों लोगों का जीवन बचाने की बजाय बंगाल जीत कर अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने को उन्होंने प्राथमिकता दी है। वे जानते हैं कि कोरोना पर विफलता उतनी बड़ी नहीं होगी, जितनी बंगाल की विफलता होगी। अगर बंगाल नहीं जीते तो उनके हार्डकोर और काफी हद तक जड़बुद्धि समर्थकों पर बड़ा बुरा असर होगा। उनके अजेय, अपराजेय नेता होने की धारणा टूटेगी।

तर्क के लिए कहा जा सकता है कि मोदी-शाह की कमान में भाजपा कई राज्यों में हारी भी है। लेकिन इस तर्क में कोई दम नहीं है क्योंकि अव्वल तो बाकी राज्यों की स्थिति पश्चिम बंगाल से अलग है और दूसरे, जहां भाजपा हारी वहां क्या हुआ यह भी देखने की जरूरत है। हारने के बावजूद मध्य प्रदेश, गोवा, मणिपुर, कर्नाटक आदि राज्यों में भाजपा ने दलबदल करा कर अपनी सरकार बना ली। राजस्थान में उसकी सरकार बनते बनते रह गई। दिल्ली में उप राज्यपाल के जरिए शासन अपने हाथ में ले लिया और बिहार में गठबंधन तुड़वा कर नीतीश के साथ अपनी सरकार बना ली। जम्मू कश्मीर में भी उप राज्यपाल के जरिए शासन भाजपा ने अपने हाथ में ले रखा है। सो, मोदी और शाह कोरोना से लड़ने को तरजीह क्यों नहीं दे रहे हैं और क्यों बंगाल पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, इसका जवाब यही है कि बंगाल जैसे राज्य की एक हार बरसों के बनाए उनके राजनीतिक किले में ऐसी दरार बना सकती है, जिससे किले का गिरना सुनिश्चित हो जाएगा। इसलिए बंगाल जीतने के लिए कुछ भी करना है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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